तो क्या हुआ जो तमाशाई हो गया हूँ मैं
तिरे ही हक़ में तो सब झूट बोलता हूँ मैं
तिरे ही हक़ में तो सब झूट बोलता हूँ मैं
नहीं ये दुख तो किसी और के सबब है सब
तुम्हें तो दिल से रिहाई भी दे चुका हूँ मैं
डरूँ न क्यूँ मैं भला तेरी ग़म-गुसारी से
कि इस के बा'द के सब मोड़ जानता हूँ मैं
ये पूछना था कि मेरी भी कुछ जगह है कहीं
तुम्हारे दर पे खड़ा सर्द पड़ रहा हूँ मैं
मुझे पता है कि रोने से कुछ नहीं होता
नया सा दुख है तो थोड़ा छलक गया हूँ मैं
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बे-ज़बाँ अल्फ़ाज़ काग़ज़ पर यहाँ
गूँगी यादों को ज़बाँ देते हुए
हो गए ग़र्क़ाब उस की आँख में
ख़्वाहिशों को हम मकाँ देते हुए
फिर उभर आया तिरी यादों का चाँद
उजला उजला सा धुआँ देते हुए
लुत्फ़ जलने का अलग है हिज्र में
ज़ख़्म मेरे इम्तिहाँ देते हुए
ला रहे हैं नींद के आग़ोश में
अश्क मुझ को थपकियाँ देते हुए
रो पड़ा था जाने क्यूँ वो डाकिया
आज मुझ को चिट्ठियाँ देते हुए
इक बला का शोर था आँखों में पर
कह न पाया कुछ वो जाँ देते हुए
फ़ासला इतना न रखना था ख़ुदा
इस ज़मीं को आसमाँ देते हुए
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ख़ाक हो कर भी कब मिटूंगा मैं
फूल बन कर यहीं खिलूँगा मैं
फूल बन कर यहीं खिलूँगा मैं
तुझ को आवाज़ भी मैं क्यूँ दूँगा
तेरा रस्ता भी क्यूँ तकूँगा मैं
इक पुराने से ज़ख़्म पर अब के
कोई मरहम नया रखूँगा मैं
घेर लेंगी ये तितलियाँ मुझ को
ख़ुशबुएँ जि
यूँ रिहा करूँगा मैं
ख़ुद से बाहर तो कम निकलता हूँ
जी में आया तो फिर मिलूँगा मैं
वर्ना जीना मुहाल कर देगा
दर्द को अब ग़ज़ल करूँगा मैं
धुकधुकी सी लगी है क्यूँ जी को
इतनी जल्दी कहाँ मरूँगा मैं
साँसें देती रहीं जो चिंगारी
एक जंगल सा जल उठूँगा मैं
थक गया हूँ मैं इस जज़ीरे पर
फिर समुंदर का रुख़ करूँगा मैं
रूह का ये लिबास बदलूँगा
भेस दूजा कोई धरूँगा मैं
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उसे तो ख़ैर इतना भी नहीं अब याद
कि पहला जाल उस ने किस पे फेंका था
अजब सुख था किसी का दुख बटाने में
मैं अपनी मौत भी ज़ाहिर न करता था
हम ऐसों की जगह बनती ही कितनी है
हम ऐसों का ठहरना क्या बिछड़ना क्या
मुझे दरकार है फिर भीगी सी आँखें
वगर्ना अगली रुत में सूख जाऊँगा
यही इक दुख तो सीने में सभी के है
कोई सच-मुच में अपने साथ था भी या
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उस तरफ़ भी वही सियाह ग़ुबार
हम ने देखा है जा के नींद के पार
हम ने देखा है जा के नींद के पार
कितना कुछ बोलना पड़ा तुम को
एक छोटा सा लफ़्ज़ था इनकार
ख़ुश्क आँखों की चुप डराने लगी
दिल मदद कर मिरी किसी को पुकार
तुझ को ऐ शख़्स कुछ ख़बर भी है
किस ख़राबे में है तिरा बीमार
फिर ये दुख भी तो आसमानी है
क्या ख़फ़ा होना इस ज़मीन से यार
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बुझे लबों पे तबस्सुम के गुल सजाता हुआ
महक उठा हूँ मैं तुझ को ग़ज़ल में लाता हुआ
महक उठा हूँ मैं तुझ को ग़ज़ल में लाता हुआ
उजाड़ दश्त से ये कौन आज गुज़रा है
गई रुतों की वही ख़ुशबुएँ लुटाता हुआ
तुम्हारे हाथों से छुट कर न जाने कब से मैं
भटक रहा हूँ ख़लाओं में टिमटिमाता हुआ
निगल न जाए कहीं बे-रुख़ी मुझे तेरी
कि रो पड़ा हूँ मैं अब के तुझे हँसाता हुआ
तू शाहज़ादी महकते हुए उजालों की
मैं एक ख़्वाब अँधेरों की चोट खाता हुआ
मिरा बदन ये किसी बर्फ़ के बदन सा है
पिघल न जाऊँ मैं तुझ को गले लगाता हुआ
तुम्हारी आँखों का पानी कहीं न बन जाऊँ
मैं डर रहा हूँ बहुत दास्ताँ सुनाता हुआ
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मेरे ही आस-पास हो तुम भी
इन दिनों कुछ उदास हो तुम भी
इन दिनों कुछ उदास हो तुम भी
बारहा बात जीने मरने की
एक बिखरी सी आस हो तुम भी
सैल-ए-नग़्मा पे इतनी हैरत क्यूँ
इस नमी से शनास हो तुम भी
मैं भी डूबा हूँ आसमानों में
ख़्वाब में महव-ए-यास हो तुम भी
मैं हूँ टूटा सा पैमाना
एक ख़ाली गिलास हो तुम भी
गर मैं दुख से सजा हुआ हूँ तो
रंज से ख़ुश-लिबास हो तुम भी
अपनी फ़ितरत का मैं भी मारा हूँ
अपनी आदत के दास हो तुम भी
मेरी मिट्टी भी रेत की सी है
और सहरा की प्यास हो तुम भी
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साल ये कौन सा नया है मुझे
वो ही गुज़रा गुज़ारना है मुझे
वो ही गुज़रा गुज़ारना है मुझे
चौक उठता हूँ आँख लगते ही
कोई साया पुकारता है मुझे
क्यूँ बताता नहीं कोई कुछ भी
आख़िर ऐसा भी क्या हुआ है मुझे
तब भी रौशन था लम्स से तेरे
वर्ना कब इश्क़ ने छुआ है मुझे
आदतन ही उदास रहता हूँ
वर्ना किस बात का गिला है मुझे
अब के अंदर के घुप अँधेरों में
एक सूरज उजालना है मुझे
मुस्तक़िल चुप से आसमाँ की तरह
एक दिन ख़ुद पे टूटना है मुझे
मेरी तुर्बत पे फूल रख कर अब
वो हक़ीक़त बता रहा है मुझे
क्या ज़रूरत है मुझ को चेहरे की
कौन चेहरे से जानता है मुझे
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इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे
याद आता भी नहीं ख़्वाब वो बिखरा कैसे
याद आता भी नहीं ख़्वाब वो बिखरा कैसे
कितने सायों से भरी है ये हवेली दिल की
ऐसी भगदड़ में कोई शख़्स ठहरता कैसे
फूल ज़ख़्मों के यहाँ और भी चुन लूँ लेकिन
अपना दामन मैं करूँ और कुशादा कैसे
दुख के सैलाब में डूबा था वो ख़ुद ही इतना
मेरी आँखों तुम्हें देता वो दिलासा कैसे
काँच के ज़ार से बस देखता रहता था तुम्हें
बंद शीशों से मैं आवाज़ लगाता कैसे
इस का फन मैं ने बहुत देर तलक कुचला था
रह गया साँप तिरे दर्द का ज़िंदा कैसे
अब तो आँखों में सियाही सी भरी रहती है
ऐसे आलम में कोई ख़्वाब हो उजला कैसे
दाग़ ही दाग़ उभर आए मिरे चेहरे पर
रंग मेरा ऐ मुसव्विर हुआ भद्दा कैसे
ख़ुश्क मिट्टी में पड़ा था मिरे दिल का पौधा
इस की शाख़ों पे कोई फूल भी आता कैसे
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जाने किस बात से दुखा है बहुत
दिल कई रोज़ से ख़फ़ा है बहुत
दिल कई रोज़ से ख़फ़ा है बहुत
सब सितारे दिलासा देते हैं
चाँद रातों को चीख़ता है बहुत
फिर वही रात मुझ में ठहरी है
फिर समा'अत में शोर सा है बहुत
तुम ज़माने की बात करते हो
मेरा मुझ से भी फ़ासला है बहुत
उस की दुखती नसें न फट जाएँ
दिल मुसलसल ये सोचता है बहुत
वास्ता कुछ ज़रूर है तुम से
तुम को वो शख़्स पूछता है बहुत
तुम से बिछड़ा तो टूट जाएगा
उस की आँखों में हौसला है बहुत
चख के देखो इसे कभी तुम भी
इस उदासी में ज़ाइक़ा है बहुत
इन की साँसें गिनी-चुनी हैं बस
ख़ून लम्हों का बह गया है बहुत
दश्त को कर लिया था घर मैं ने
अब मुझे घर ये काटता है बहुत
इस से बाहर निकल न पाओगे
दश्त माज़ी का ये घना है बहुत
मेरा सुख दुख समझती हैं ग़ज़लें
ज़िंदगी को ये आसरा है बहुत
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