Darshan Singh

Darshan Singh

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Darshan Singh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Darshan Singh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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तमाम नूर-ए-तजल्ली तमाम रंग-ए-चमन
ये तेरा चाँद सा चेहरा ये तेरा गुल सा बदन

न डगमगाए क़दम गरचे राह-ए-उल्फ़त में
कहीं थे दश्त-ओ-बयाबान कहीं थे दार-ओ-रसन

हज़ार आए ज़माने में इंक़लाब मगर
मिज़ाज हुस्न का बदला न 'इश्क़ ही का चलन

सबात-ओ-सब्र ज़रूरी है आदमी के लिए
शिकन जबीं पे न आए ब-वक़्त-ए-रंज-ओ-मेहन

ये बात और है नाक़िद रहे ज़माना मगर
जहाँ से मिट नहीं सकते नुक़ूश-ए-तेशा-फ़न

मिरा दयार है मेहर-ओ-वफ़ा का गहवारा
अदू-ए-मेहर-ओ-मोहब्बत का है मगर मदफ़न

हक़ीक़तों से ब-हर-हाल जो गुरेज़ करे
वो शाइ'री है न हिकमत न वो हुनर है न फ़न

हर इक को जान ज़माने में अपनी प्यारी है
अज़ीज़-तर है मगर हम को जान से भी वतन

बहुत ही शोर था रंगीनी-ए-जहाँ का मगर
मिला न हम को यहाँ कुछ सिवा-ए-रंज-ओ-मेहन

वो जान-ए-हुस्न-ओ-लताफ़त ही बन के आया है
बहार ग़ुंचा-ब-ग़ुंचा सबा चमन-ब-चमन

हज़ार बार हुआ इम्तिहान-ए-इश्क़ मगर
न जाने हुस्न है क्यूँँ मुझ से बद-गुमाँ 'दर्शन'
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Darshan Singh
राज़-ए-निहाँ थी ज़िंदगी राज़-ए-निहाँ है आज भी
वहम-ओ-गुमाँ में थी वहम-ओ-गुमाँ है आज भी

कल भी नवा-ए-आगही क़ीमत-ए-संग-ओ-ख़िश्त थी
नग़्मा-ए-अम्न-ओ-आश्ती जिंस-ए-गिराँ है आज भी

दिल से तो रोज़-ओ-शब हुई लाख तरह की गुफ़्तुगू
तिश्ना-ए-गुफ़्तुगू मगर अपनी ज़बाँ है आज भी

ख़ाक में जज़्ब हो गया तेरे शहीद का लहू
मतला-ए-काएनात पर सुर्ख़ धुआँ है आज भी
'इश्क़ को नींद आ गई वक़्त पे ओस पड़ गई
अपने जुनूँ के दश्त में धूप जवाँ है आज भी

वक़्त की दस्तरस नहीं बज़्म-ए-गह-ए-ख़याल तक
रुख़ पे ग़ुबार ही सही याद जवाँ है आज भी

कल भी रुख़-ए-हयात पर रंग-ए-शगुफ़्तगी न था
सुब्ह-ए-बहार-ए-ज़िंदगी शाम-ए-ख़िज़ाँ है आज भी

कल भी ज़बान-ओ-नुत्क़ को ख़ौफ़-ए-सिनान-ओ-सैफ था
नक़्द-ओ-नज़र को दहशत-ए-तीर-ओ-कमाँ है आज भी

'दर्शन'-ए-तिश्ना-काम पर एक निगाह साक़िया
शो'ला-बयाँ ये कल भी था शो'ला-बयाँ है आज भी
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Darshan Singh
गुलों पे ख़ाक-ए-मेहन के सिवा कुछ और नहीं
चमन में याद-ए-चमन के सिवा कुछ और नहीं

कहाँ की मंज़िल-ए-रंगीं सहर तो होने दो
हमारे ख़्वाब थकन के सिवा कुछ और नहीं

ये शाम-ए-ग़ुर्बत-ए-दिल है यहाँ चराग़ कहाँ
ख़याल-ए-सुब्ह-ए-वतन के सिवा कुछ और नहीं

निगाह-ए-शौक़-ए-मुसलसल उसी को छेड़े जा
जबीं पे जिस की शिकन के सिवा कुछ और नहीं

दयार-ए-इश्क़ में तुम क्यूँँ खड़े हो अहल-ए-हवस
यहाँ तो दार-ओ-रसन के सिवा कुछ और नहीं

सवाद-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है तो हो हमें क्या ग़म
नज़र में सुब्ह-ए-चमन के सिवा कुछ और नहीं

करे तलाश जुनूँ ज़ुल्मत-ए-ख़िरदस कहो
जुनूँ किरन है किरन के सिवा कुछ और नहीं

हमारी नग़्मा-सराई के वास्ते 'दर्शन'
हवा-ए-गंग-ओ-जमन के सिवा कुछ और नहीं
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Darshan Singh
ग़म-ए-हयात पे ख़ंदाँ हैं तेरे दीवाने
अजीब साहब-ए-इरफ़ाँ हैं तेरे दीवाने

हर एक ज़र्रा-ए-सहरा है आईना-ख़ाना
हुजूम-ए-जल्वा से हैराँ हैं तेरे दीवाने दीवाने

न अपने होश की पर्वा न अपने दर्द का फ़िक्र
ग़म-ए-ज़मीं से परेशाँ हैं तेरे दीवाने

कहाँ ये होश कि औरों की ज़िंदगी पे हँसें
ख़ुद अपने हाल पे ख़ंदाँ हैं तेरे दीवाने

हुजूम-ए-अश्क में छलका रहे हैं पैमाना
हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ हैं तेरे दीवाने

बहार आते ही क्या जाने उन पे क्या गुज़री
कि ख़ुदस दस्त-ओ-गरेबाँ हैं तेरे दीवाने

कभी तो इक निगह-ए-जाँ-नवाज़ हो जाए
हनूज़ कुश्ता-ए-अरमाँ हैं तेरे दीवाने

निशात-ओ-दर्द में देखा है मैं ने 'दर्शन' को
हर एक हाल में शादाँ हैं तेरे दीवाने
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Darshan Singh
चश्म-ए-बीना हो तो क़ैद-ए-हरम-ओ-तूर नहीं
देखने वाली निगाहों से वो मस्तूर नहीं

कौन सा घर है जवाँ जल्वों से पुर-नूर नहीं
इक मिरे दिल की ही दुनिया है जो मा'मूर नहीं

अपनी हिम्मत ही से पहुँचूँगा सर-ए-मंज़िल-ए-शौक़
लूँ सहारा मैं किसी का मुझे मंज़ूर नहीं

ग़म-ए-जानाँ को भुला दूँ न करूँँ दोस्त को याद
इतना मैं ऐ ग़म-ए-दौराँ अभी मजबूर नहीं

ये मोहब्बत की है क़ीमत ये मोहब्बत का सिला
कि हमारे ही लिए 'इश्क़ का दस्तूर नहीं

दोनों आलम को डुबो दे जो मय-ओ-मीना में
चश्म-ए-साक़ी के सिवा और का मक़्दूर नहीं

मुस्कुरा दो तो मिरा ग़ुंचा-दिल खिल जाए
दिल कभी खिल न सके ऐसा भी रंजूर नहीं

तुम नहीं पास मगर साथ है यादों का हुजूम
मैं अकेला नहीं बेकस नहीं महजूर नहीं

आज कुछ शाम से तारीक है दिल की महफ़िल
तुम नहीं हो तो वो रौनक़ नहीं वो नूर नहीं

मुझ में हिम्मत है कि मैं राज़ को इफ़्शा न करूँँ
ये मिरा ज़र्फ़ है ये शेवा-ए-मंसूर नहीं

कर सकेगा न जुदा फ़ासला-ए-वक़्त-ओ-मकाँ
दूर नज़रों से सही दिल से मगर दूर नहीं

मेरी तक़दीर में 'दर्शन' हैं किसी के जल्वे
शुक्र सद शुक्र कि दुनिया मिरी बे-नूर नहीं
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Darshan Singh
बहुत मुश्किल है तर्क-ए-आरज़ू रब्त-आश्ना हो कर
गुज़र जा वादी-ए-पुर-ख़ार से बाद-ए-सबा हो कर

लगा दोगे तमन्ना के सफ़ीने को किनारे से
मआ'ज़-अल्लाह दावा-ए-ख़ुदाई ना-ख़ुदा हो कर

हर इक हो सिलसिला रंगीं गुनाहों के सलासिल का
नहीं आसान दुनिया से गुज़रना पारसा हो कर

मिरी पिन्हाई-ए-इल्म-ओ-ख़बर की इंतिहा ये है
कि इक क़तरे से ना-वाक़िफ़ हूँ दरिया-आश्ना हो कर

कहाँ ताब-ए-जुदाई अब तो ये महसूस होता है
कि मैं ख़ुदस जुदा हो जाऊँगा तुम से जुदा हो कर

तिरा दर छोड़ दूँ लेकिन तिरे दर के सिवा साक़ी
कहाँ जाऊँ किधर जाऊँ ज़माने से ख़फ़ा हो कर

जो शिकवा उन से करना था वो उन के रू-ब-रू 'दर्शन'
ज़बाँ तक आते आते रह गया हर्फ़-ए-दुआ हो कर
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Darshan Singh
मोहब्बत की मता-ए-जावेदानी ले के आया हूँ
तिरे क़दमों में अपनी ज़िंदगानी ले के आया हूँ

कहाँ सीम-ओ-गुहर जिन को लुटाऊँ तेरे क़दमों पर
बरा-ए-नज़्र अश्कों की रवानी ले के आया हूँ

तुझे जो पूछना हो पूछ ले ऐ दावर-ए-महशर
मैं अपने साथ अपनी बे-ज़बानी ले के आया हूँ

ज़मीन-ओ-मुल्क के बदले दिलों पर है नज़र मेरी
अछूता इक तरीक़-ए-हुक्मरानी ले के आया हूँ

मिरे ज़ख़्म-ए-तमन्ना देख कर पहचान लो मुझ को
तुम्हारी ही अता-कर्दा निशानी ले के आया हूँ

मिरे अशआ'र में मुज़्मर हैं लाखों धड़कनें दिल की
मैं इक दुनिया का ग़म दिल की ज़बानी ले के आया हूँ

मोहब्बत नाम है बेताबी-ए-दिल के तसलसुल का
मोहब्बत की मैं 'दर्शन' ये निशानी ले के आया हूँ
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Darshan Singh
जब आदमी मुद्दआ-ए-हक़ है तो क्या कहें मुद्दआ' कहाँ है
ख़ुदा है ख़ुद जिस के दिल में पिन्हाँ वो ढूँढता है ख़ुदा कहाँ है

ये बज़्म-ए-यारान-ए-ख़ुद-नुमा है न कर ख़ुलूस-ए-वफ़ा की बातें
सभी तो हैं मुद्दई' वफ़ा के यहाँ कोई बेवफ़ा कहाँ है

तमाम परतव हैं अक्स-ए-परतव तमाम जल्वे हैं अक्स-ए-जल्वा
कहाँ से लाऊँ मिसाल-ए-सूरत कि आप सा दूसरा कहाँ है

निहाँ हैं तकमील-ए-ख़ुद-शनासी में जल्वा-हा-ए-ख़ुदा-शनासी
जो अपनी हस्ती से बे-ख़बर है वो आप से आश्ना कहाँ है

पड़ी है सुनसान दिल की वादी अकेला महव-ए-तलाश हूँ मैं
कि 'इश्क़ के राह-रौ किधर हैं वफ़ाओं का क़ाफ़िला कहाँ है

जिन्हें वसाएल पे है भरोसा ये बात उन को बता दे कोई
बचा ले कश्ती को जो भँवर से ख़ुदा है वो नाख़ुदा कहाँ है

पड़ा ही रहने दो सर-ब-सज्दा न छूटने दो ये आस्ताना
कि 'दर्शन'-ए-ख़स्ता का ठिकाना तुम्हारे दर के सिवा कहाँ है
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Darshan Singh
तुझे क्या ख़बर मिरे हम-सफ़र मिरा मरहला कोई और है
मुझे मंज़िलों से गुरेज़ है मेरा रास्ता कोई और है

मेरी चाहतों को न पूछिए जो मिला तलब से सिवा मिला
मिरी दास्ताँ ही अजीब है मिरा मसअला कोई और है

ये हवस के बंदे हैं नासेहा न समझ सके मिरा मुद्दआ'
मुझे प्यार है किसी और से मिरा दिल-रुबा कोई और है

मिरा ज़ौक़-ए-सज्दा है ज़ाहिरी कि है कश्मकश मिरी ज़िंदगी
ये गुमान दिल में रहा सदा मिरा मुद्दआ' कोई और है

वो रहीम है वो करीम है वो नहीं कि ज़ुल्म करे सदा
है यक़ीं ज़माने को देख कर कि यहाँ ख़ुदा कोई और है

मैं चला कहाँ से ख़बर नहीं कि सफ़र में है मिरी ज़िंदगी
मिरी इब्तिदा कहीं और है मिरी इंतिहा कोई और है

मिरा नाम 'दर्शन'-ए-ख़स्ता-तन मिरे दिल में कोई है ज़ौ-फ़गन
मैं हूँ गुम किसी की तलाश में मुझे ढूँढता कोई और है
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Darshan Singh
रक़्स करती है फ़ज़ा वज्द में जाम आया है
फिर कोई ले के बहारों का पयाम आया है

बादा-ख़्वारान-ए-फ़ना बढ़ के क़दम लो उस के
ले के साग़र में जो सहबा-ए-दवाम आया है

मैं ने सीखा है ज़माने से मोहब्बत करना
तेरा पैग़ाम-ए-मोहब्बत मिरे काम आया है

रहबर-ए-जादा-ए-हक़ नूर-ए-ख़ुदा हादी दें
ले के ख़ालिक़ का ज़माने में पयाम आया है

तेरी मंज़िल है बुलंद इतनी कि हर शाम-ओ-सहर
चाँद-सूरज से तिरे दर को सलाम आया है

हो गया तेरी मोहब्बत में गिरफ़्तार तो फिर
ताएर-ए-रूह भला कब तह-ए-दाम आया है

ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गई पेशानी-ए-अर्बाब-ए-ख़ुदी 'इश्क़ की राह में ऐसा भी मक़ाम आया है

आसियो शुक्र की जा है कि ब-फ़ैज़-ए-ख़ालिक़
हम गुनहगारों की बख़्शिश का पयाम आया है

हरम-ओ-दैर के लोगों की ख़ुशी क्या कहना
बंदा-ए-ख़ालिक़-ओ-दिल-दादा-ए-राम आया है

तिश्ना-कामान-ए-नज़ारा को ये मुज़्दा दे दो
बे-नक़ाब आज कोई फिर सर-ए-बाम आया है

हो मुबारक तुम्हें रिंदो कि ब-ताईद-ए-ख़ुदा
कोई छलकाता हुआ शीशा-ओ-जाम आया है

जब कभी गर्दिश-ए-दौराँ ने सताया है बहुत
तेरे रिंदों की ज़बाँ पर तिरा नाम आया है

अहल-ए-मग़रिब को पिला कर मय-ए-इरफ़ाँ 'दर्शन'
फिर से मशरिक़ की तरफ़ अर्श-मक़ाम आया है
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Darshan Singh
कहीं जमाल-ए-अज़ल हम को रूनुमा न मिला
मिले तो हुस्न मगर हुस्न आप सा न मिला

रही तलाश मगर दर्द आश्ना न मिला
हमारे बा'द उन्हें हम सा बा-वफ़ा न मिला

गए हैं दैर-ओ-हरम में भी बारहा लेकिन
वो आसरा जो दिया तू ने साक़िया न मिला

जो दूर थे तो बहुत पारसा थे ये ज़ाहिद
जो पास आए तो कोई भी पारसा न मिला

मुक़ाबले की जो ताक़त थी वो उभर तो सकी
ख़ुदा का शुक्र है कश्ती को नाख़ुदा न मिला

जवाब-ए-जन्नत-ए-रंगीं सही तिरी दुनिया
मगर हमें तो यहाँ लुत्फ़ ऐ ख़ुदा न मिला

हवा-ओ-हिर्स के लाखों शिकार पाए मगर
कोई भी दर्द मोहब्बत में मुब्तला न मिला

जो चश्म-ए-मस्त से छलका के दे अलस्त की मय
तिरे सिवा कोई दुनिया में साक़िया न मिला

मुझी को बख़्श दिए कुल जहान के आलाम
ग़म-ए-जहाँ के लिए कोई दूसरा न मिला

कहूँ तो किस से कहूँ दिल की बात ऐ 'दर्शन'
सुने जो दर्द-ए-बशर ऐसा हम-नवा न मिला
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Darshan Singh
क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से अहल-ए-जहाँ मफ़र नहीं
ऐसी मिली है शाम-ए-ग़म जिस की कोई सहर नहीं

है वो सफ़र जो 'इश्क़ को जानिब दोस्त ले चले
वर्ना सफ़र के वास्ते कौन सी रहगुज़र नहीं

अहल-ए-ख़िरद को चाहिए दिल के नगर में आ बसें
दिल सा हसीन-ओ-ख़ुश-नुमा और कोई नगर नहीं

तेरे करम पे है यक़ीं गरचे ये जानता हूँ मैं
नाला है मेरा ना-रसा आह में कुछ असर नहीं

हसरत-ए-इंतिज़ार की बात न हम से पूछिए
है ये तवील दास्ताँ क़िस्सा-ए-मुख़्तसर नहीं

लुट तो गए हैं दिल मगर मिल भी गई हैं मंज़िलें
रहगुज़र-ए-हयात में 'इश्क़ सा राहबर नहीं

अपना रहा न होश जब राज़-ए-हयात पा लिया
नेअमत-ए-बे-खु़दी समझ होश का ये समर नहीं
'इश्क़ मता-ए-ला-मकाँ 'इश्क़ मता-ए-जावेदाँ
शो'ला-ए-दाएमी है ये मंज़र-ए-यक-शरर नहीं

'दर्शन'-ए-मस्त से मिलें खोलेगा राज़-ए-आगही
गरचे वहाँ है जिस जगह अपनी उसे ख़बर नहीं
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Darshan Singh
हँसी गुलों में सितारों में रौशनी न मिली
मिले न तुम तो कहीं भी हमें ख़ुशी न मिली

न चाँद में न शफ़क़ में न लाला-ओ-गुल में
जो आप में है कहीं भी वो दिलकशी न मिली

निगाह लुत्फ़ की है मुंतज़िर मिरी शब-ए-ग़म
सितारे डूब चले और रौशनी न मिली

हमीं को सौंप दिए कुल जहाँ के रंज-ओ-अलम
किसी में और हमारी सी दिल-दही न मिली

निगाह-ए-दोस्त ने बख़्शी जो दिल को मद-होशी
शराब-ओ-जाम से हम को वो बे-ख़ुदी न मिली

हर इक नशात में पिन्हाँ मिला नशात का ग़म
जो ऐश से हो बसर ऐसी ज़िंदगी न मिली

मिरे ख़याल में हैं ये तजल्लियाँ किस की
अँधेरी रात में भी मुझ को तीरगी न मिली

वही फ़ज़ा वही गुलशन वही हवा है मगर
मिली जो गुल को वो ख़ारों को ज़िंदगी न मिली

गिला करेंगे न अब मेरे बा'द के रहरव
कि उन को राह-ए-मोहब्बत में रौशनी न मिली

हज़ार बार हुआ ख़ून-ए-आरज़ू लेकिन
कभी किसी को मिरी आँख में नमी न मिली

जो छेड़ती मिरे बेताब दिल के तारों को
किसी भी साज़ में दर्शन वो नग़्मगी न मिली
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Darshan Singh
वो सलीक़ा हमें जीने का सिखा दे साक़ी
जो ग़म-ए-दहरस बेगाना बना दे साक़ी

जाम-ओ-मीना मिरी नज़रों से हटा दे साक़ी
ये जो आँखों में छलकती है पिला दे साक़ी

शो'ला-ए-इश्क़ से छलका दे मिरे शीशे को
और बेताब को बेताब बना दे साक़ी

हरम-ओ-दैर में बट जाते हैं रिन्दान-ए-वफ़ा
हरम-ओ-दैर की तफ़रीक़ मिटा दे साक़ी

सुन रहा हूँ कि मुयस्सर ही नहीं दुनिया में
इक निगह राज़-ए-दो-आलम जो बता दे साक़ी

ख़ुश्क है मौसम-ए-एहसास फ़ज़ा प्यासी है
ख़ुम के ख़ुम सीना-ए-गेती पे लुंढा दे साक़ी

फिर कभी होश न आए तो कोई बात नहीं
आज हम जितनी पिएँ उतनी पिला दे साक़ी

जोश-ए-मस्ती में बग़ल-गीर हूँ बिछड़े हुए दिल
आज इंसान को इंसान बना दे साक़ी

ज़िंदगी ख़्वाब-ए-मुसलसल के सिवा कुछ न सही
उस की ता'बीर तो 'दर्शन' को बता दे साक़ी
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Darshan Singh
दौलत मिली जहान की नाम-ओ-निशाँ मिले
सब कुछ मिला हमें न मगर मेहरबाँ मिले

पहले भी जैसे देख चुके हों उन्हें कहीं
अंजान वादियों में कुछ ऐसे निशाँ मिले

बढ़ता गया मैं मंज़िल-ए-महबूब की तरफ़
हाइल अगरचे राह में संग-ए-गराँ मिले

रोना पड़ा नसीब के हाथों हज़ार बार
इक बार मुस्कुरा के जो तुम मेहरबाँ मिले

हम को ख़ुशी मिली भी तो बस 'आरज़ी मिली
लेकिन जो ग़म मिले वो ग़म-ए-जावेदाँ मिले

बाक़ी रहेगी हश्र तक उन के करम की याद
मुझ को रह-ए-हयात में जो मेहरबाँ मिले

फिर क्यूँँ करे तलाश कोई और आस्ताँ
वो ख़ुश-नसीब जिस को तिरा आस्ताँ मिले

अहल-ए-सितम की दिल-शिकनी का सबब हुआ
दिल का ये हौसला कि ग़म बे-कराँ मिले

साक़ी की इक निगाह से काया पलट गई
ज़ाहिद जो मय-कदे में मिले नौजवाँ मिले

दैर-ओ-हरम के लोग भी दरमाँ न कर सके
वो भी असीर-ए-कश्मकश-ए-ईन-ओ-आँ मिले

नज़रें तलाश करती रहीं जिन को उम्र-भर
'दर्शन' को वो सुकून के लम्हे कहाँ मिले
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Darshan Singh

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