किसे ख़्वाब-ए-मुसलसल की फ़ज़ा-बंदी में जीना है
किसे नींदों से हट कर
आँसुओं से हिज्र को आसान करना है
किसे ख़ामोश रहना है
किसे एलान करना है
Read Fullकिसे नींदों से हट कर
आँसुओं से हिज्र को आसान करना है
किसे ख़ामोश रहना है
किसे एलान करना है
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मुंजमिद होने के डर से
मुझे आने वाले मेहमानों का इंतिज़ार ज़ियादा करना होगा
मेरी हलावत मेरी रगों में मचल रही है
एक मिठास भरी घुलावट
जो हलक़ पर लज़्ज़त की दस्तक देती है
मैं फ्रीज में पड़ी
अपनी करवटों में इतरा रही हूँ
जिस के नुक़ूश बिलोरीं बोतल पर रक़्स करते हैं
आने वालों का इंतिज़ार लम्बा हो रहा है
मेरी रगों में बुरूदत जम रही है
ख़ाली होने का शौक़ बड़ा ज़ालिम होता है
मगर ये क्या
ये आवाज़ कैसी
आज मेहमान नहीं आ रहे
क्या मेरी मुराद और मेरा शे'र बाक़ी रहेगा
Read Fullमुझे आने वाले मेहमानों का इंतिज़ार ज़ियादा करना होगा
मेरी हलावत मेरी रगों में मचल रही है
एक मिठास भरी घुलावट
जो हलक़ पर लज़्ज़त की दस्तक देती है
मैं फ्रीज में पड़ी
अपनी करवटों में इतरा रही हूँ
जिस के नुक़ूश बिलोरीं बोतल पर रक़्स करते हैं
आने वालों का इंतिज़ार लम्बा हो रहा है
मेरी रगों में बुरूदत जम रही है
ख़ाली होने का शौक़ बड़ा ज़ालिम होता है
मगर ये क्या
ये आवाज़ कैसी
आज मेहमान नहीं आ रहे
क्या मेरी मुराद और मेरा शे'र बाक़ी रहेगा
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बहुत से लोग होते हैं
जिन्हें कहना जिन्हें सुनना नहीं आता
जिन्हें कहना जिन्हें सुनना नहीं आता
सदाएँ अपने पहलू को झटक कर
कान में आवाज़ भरती हैं
सदाओं के कटहरे से कई बाग़ी हमेशा
भाग जाते हैं
मैं अपने वक़्त की बाग़ी सदा हूँ
और मेरा नाम उज़मा है
मुझे 'नक़वी' भी कहते हैं
मुझे हर्फ़-ए-ज़िया पर जुगनुओं से दाद मिलती है
मिरा अदबी नसब-नामा ज़ियाई है
मगर दुनिया मुझे
इक आफ़्ताबी शहर कहती है
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पहले चुप को चुप के साथ अदावत थी
अब ये मौसम ख़ुद से झड़ने वाला है
एक मोहब्बत से भी दिल घबराता है
अब तो ये सन्नाटा बोलने वाला है
ख़ुशबू की आज़ादी क़ादिर खुलता है
कौन हवा का दामन खोलने वाला है
आने वाली रात पे ही मौक़ूफ़ नहीं
एक दिया तो हाथ पे जलने वाला है
दिल की धड़कन में आसेब-पसंदी है
कोई अपने आप से डरने वाला है
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किस ने मोहब्बतों को अदावत में रख दिया
दिल की बुझारतों को सफ़ारत में रख दिया
दिल की बुझारतों को सफ़ारत में रख दिया
चेहरे के सब नुक़ूश ज़माने के साथ थे
इक दिल था सो तुम्हारी इबादत में रख दिया
अपना वजूद खो के तुम्हें पा लिया तो फिर
क्यूँ अपनी चाहतों को नदामत में रख दिया
आँखें गँवा के पूरी तरह मुतमइन न थी
इक सर बचा था वो भी मोहब्बत में रख दिया
ये सर्द आग मेरा बदन चाटती रहे
मैं ने तो इश्क़ दिल की हरारत में रख दिया
रोने का ये हुनर भी न तेरे लिए किया
तलवार को भी तेरी हिमायत में रख दिया
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मैं सदा-परवर कहीं मिटने लगी हूँ शोर से
ज़िंदगी अब रोक ले बटने लगी हूँ शोर से
ज़िंदगी अब रोक ले बटने लगी हूँ शोर से
कैसे कह दूँ ख़ामुशी से और ऊँचा कर मुझे
मैं मोहब्बत की पतंग कटने लगी हूँ शोर से
पहले तो आवाज़ का आसेब खुलता ही न था
अब खुला है ये तो मैं लड़ने लगी हूँ शोर से
ख़ामुशी फिर से दुआ दे मेरी क़ामत के लिए
ख़ामुशी अब मान ले घुटने लगी हूँ शोर से
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बुझती मोहब्बतों का धुआँ फैलने लगा
आँखों में आ के अब्र कोई सोचने लगा
आँखों में आ के अब्र कोई सोचने लगा
जब ख़ामुशी का ज़हर भी उस ने उड़ा लिया
ख़्वाबों में आ के नाग कोई बोलने लगा
अब के ग़म-ए-हयात का नक़्शा अजीब है
आँखों में अश्क आ के मुझे तोलने लगा
ये किस की आँख मुझ पे बराबर लगी रही
ये कौन आईने में मुझे सोचने लगा
लिखा था लौह-ए-दिल पे किसी बे-वफ़ा का नाम
कतबा बना के कोई मुझे तोड़ने लगा
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तेरे नाम से वहशत है बे-ज़ारी है
न मिलने की अपने आप से बारी है
न मिलने की अपने आप से बारी है
हार सिंघार की शर्तें पूरी कर डालीं
आईना के रोने की तय्यारी है
गिर्या गिर्या सब तस्वीरें मेरी हैं
क़र्या क़र्या रोने में सरशारी है
सफ़र की सारी धूल अमानत है उस की
ख़ाक और हिजरत में उस की दिलदारी है
हम ने अपना इश्क़-ए-नशेमन फूँक दिया
शाख़ पे अब ये कैसी आह-ओ-ज़ारी है
क़ातिल और मक़्तूल से मेरा रिश्ता है
इस मातम में थोड़ी सी दुश्वारी है
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