ये क्या सितम तिरे होते हुए ख़ला हूँ मैं
मैं अब भी ज़िन्दा हूँ तुझ में या मर चुका हूँ मैं
किसे ख़बर के यहाँ कोई आता जाता नहीं
किसे ख़बर के दिलों दिल मरा हुआ हूँ मैं
जो पासबाँ तिरी आँखों की बन गई ज़ुल्फें
नज़र नज़र से मिले कैसे सोचता हूँ मैं
जहाँ पे मैं ने कभी ज़िन्दगी को छोड़ा था
लो आज फिर उसी रस्ते पे आ गया हूँ मैं
मैं चाहता था जिसे क़ैद से रिहा करना
उसी की राह का काँटा बना हुआ हूँ मैं
ऐ शहर-ए-इल्म बता कब तलक करूँँ बरदाश्त
अब उस की याद में पैवस्त हो गया हूँ मैं
तेरे लिबास-ए-उरूसी से क्या ग़रज़ मुझ को
तेरे लिबास-ए-उरूसी पे थूकता हूँ मैं
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