जो अश्क टहल रहे थे आँखों के किनारे पर
फिसल गए पलकों से तेरा ज़िक्र आने पर
कभी तुम आ जाते थे ख़याल से भी पहले
अब आते नहीं नाम ले कर बुलाने पर
हम ने सोचा था आसान होगा मोहब्बत का सफ़र
गिर पड़े हैं मगर तेरा पहला ही नाज़ उठाने पर
बस ये देख कर मैं डूबा नहीं कभी इश्क़ में
आदमी हल्का हो जाता है पानी में डूब जाने पर
इस कदर अँधेरा घर कर गया है मुझ
में
अब रौशनी होगी तो बस ख़ुद को जलाने पर
निकालकर सौंप देना बनाने वाले के हाथों में
रूह जो मिलेगी इस घर का मलबा हटाने पर
— Rajnish















