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यूँ देखने में तो बस ख़ाक-ए-मुख़्तसर हूँ मैं  - Ahmad Musharraf Khawar

यूँ देखने में तो बस ख़ाक-ए-मुख़्तसर हूँ मैं
मुझे कुरेद कभी ख़ुद में बहर-ओ-बर हूँ मैं

अज़ल से ता-ब-अबद फैली हैं जड़ें मेरी
कभी न आई ख़िज़ाँ जिस पे वो शजर हूँ मैं

है बा'द-ए-ख़ुल्द-बदर इक अज़ाब-ए-दर-बदरी
जिसे तलाश है मंज़िल की वो ख़िज़र हूँ मैं

कभी निगाहों में होता है आलम-ए-बाला
कभी वजूद से ही अपने बे-ख़बर हूँ मैं

है ज़ात मेरी कभी तो सभी दुखों का इलाज
कभी लगे है कि तिरयाक़-ए-बे-असर हूँ मैं

मिरे वजूद पे है मुनहसिर तिरी तादाद
अगरचे तेरी नज़र में बस इक सिफ़र हूँ मैं

समझ के हर्फ़-ए-मुकर्रर जो लौह-ए-हस्ती पर
ज़माना गरचे है मुनकिर मिरा मगर हूँ मैं

नहीं है बज़्म-ए-ख़िरद में जो मेरी क़द्र तो क्या
निगाह-ए-अहल-ए-जुनूँ में तो मो'तबर हूँ मैं

मिरी ज़बान-ए-सदाक़त का जुर्म है 'ख़ावर'
ज़माना मुझ को समझता है ख़ीरा-सर हूँ मैं

- Ahmad Musharraf Khawar

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