"इज़हार"
ज़िंदगी तेरे सिवा सोचूँ क़यामत है मुझे
हासिल-ए-कुन की क़सम तेरी ही चाहत है मुझे
साथ इक उम्र गुज़ारी है मगर तू ही बता
जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे
तेरे साए में मेरी जान रहा करते हैं
तब कहीं जा के यहाँ फूल खिला करते हैं
तू जो अँगड़ाई भी ले ले तो फ़ज़ा बहके है
तेरी पलकों पे ये महताब हुआ करते हैं
गर नज़र भर के तुझे देख ले दुनिया वाले
जान-ए-मन तेरी ही यादों में जिया करते हैं
तेरा ही नाम लिए जाने की आदत है मुझे
जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे
तेरे ज़ुल्फ़ों की हँसी छाँव तले बैठा हूँ
तेरी ख़ुशबू से मैं तस्वीर बना लेता हूँ
तेरी पायल की खनक क़िस्मतों की चाबी है
मेरी क़िस्मत तेरे साए में जिया करता हूँ
तू अगर साथ रहे दामन-ए-गुलशन के लिए
होंठ शबनम से लगा कर मैं पिला सकता हूँ
तू गुमाँ कर ले जो वो बात हक़ीक़त है मुझे
जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे
वक़्त फूलों का निगहबान बना बैठा था
मैं भी गुलशन से हवाओं की तरह गुज़रा था
तेरी मुस्कान के सदक़े ही मेरी दुनिया थी
तेरे होंटों पे दुआ बन के रहा करता था
तेरे गेसू तेरे रुख़्सार का क़ैदी था मैं
उम्र भर हाथ तेरा थाम के मैं ज़िंदा था
क्या तुझे दिल से लगाने की सहूलत है मुझे
जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे
ज़िंदगी तेरे तआक़ुब की कहानी है मेरी
तेरी धड़कन से ही ग़ज़लों में रवानी है मेरी
तेरा काजल तेरी पायल तेरी चूड़ी तेरा नथ
उम्र-ए-आख़िर में सजी ऐन-जवानी है मेरी
ये किताबों सा बदन आँख की स्याही से लिखूँ
या कहूँ तुझ को मोहब्बत ही बढ़ानी है मेरी
कुछ भी तुझ से न तेरे हुस्न से वहशत है मुझे
जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे















