0

वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना  - Dr. Chandrashekhar Pandey Shams

वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना
तुझ से मिल कर तिरे बंदे का ख़ुदा हो जाना

शम्अ' से मिल के ज़रा देख तो परवाने का रंग
कितना मुश्किल है कोई फ़र्क़ ज़रा हो जाना

हम तो परछाई हैं बस इश्क़ की ऐ तेग़-ए-वक़्त
हम को काटे से भला इश्क़ का क्या हो जाना

ज़िंदगी को तो समझते हैं हम इक चाल तेरी
मौत है इस का जवाब उस पे फ़िदा हो जाना

मुश्तरी ज़ोहरा ज़ुहल शम्स-ओ-हिलाल-ओ-मिर्रीख़
तेरे कूचे को है यूँ राह-ए-वफ़ा हो जाना

Dr. Chandrashekhar Pandey Shams
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dr. Chandrashekhar Pandey Shams

As you were reading Shayari by Dr. Chandrashekhar Pandey Shams

Similar Writers

our suggestion based on Dr. Chandrashekhar Pandey Shams

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari