आँख इक पल न मेरी लगी रात भर

याद आती रही आप की रात भर

शाम खाई क़सम उम्र भर की मगर
क्या निभाई गई दोस्ती रात भर

दिन गुज़रता है जब मुस्कुराते हुए
छाई रहती है क्यूँ बे-दिली रात भर

क्यूँ न आए मुझे नींद दिन में भला
मैं जो लिखता रहा शा'इरी रात भर

आप आए नहीं वा'दा कर के सनम
दिल जलाती रही तिश्नगी रात भर

मैं ने जब जब तरन्नुम में ग़ज़लें पढ़ीं
रुसवा होती रही नग़्मगी रात भर

— Raaz Gurjar

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