अगर सर को झुकाया ही नहीं जाता
कोई भी तीर ज़ाया' ही नहीं जाता
गुनाहों पर टिका है ये जहाँ मौला
अगर वो सेब खाया ही नहीं जाता?
ज़रा सोचो कि क्या होता जहन्नम का
अगर मुझ को बनाया ही नहीं जाता
मियाँ मैं बज़्म में वो काम करता हूँ
मुझे फिर से बुलाया ही नहीं जाता
लिखा होता अगर सब कुछ लकीरों में
दुआ करना सिखाया ही नहीं जाता।
— Safar















