Ahmad Ata

Top 10 of Ahmad Ata

    कल ख़्वाब में इक परी मिली थी
    इक बोसे के ब'अद उड़ गई थी

    मैं उस के लिए धनक बना था
    वो और ही रंग ढूँढती थी

    देवी थी जिसे मैं पूजता था
    वो और किसी को सोचती थी

    मैं राह-ए-गुनाह पर चला था
    इस राह में कैसी तीरगी थी

    छे रास्ते वाँ निकल रहे थे
    इक सम्त ज़रा सी रौशनी थी

    आख़िर मैं दुआ में ढल चुका था
    दुनिया मुझे आ के देखती थी
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    Ahmad Ata
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    हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं
    कि दिल जो रोए तो कम-बख़्त हँसने लगती हैं

    तुम्हारे शहर से चलिए कि तंग-दस्ती ने
    तुम्हारे शहर की गलियाँ भी तंग कर दी हैं

    ये हम हैं बे-हुनराँ देखिए हुनर-मंदी
    जो कोई काम करें हम तो पोरें जलती हैं

    न इस का वस्ल मिला और न रोज़गार यहाँ
    सो पहले हिज्र-ज़दा थे और अब के हिज्रती हैं

    तो शाह-ज़ादी को लाएँ वो महव-ए-ख़्वाब है क्या
    हमें यक़ीं नहीं परियाँ भी झूट बोलती हैं
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    Ahmad Ata
    9
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    ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे
    वो समय ऐसा था मरने में सुहूलत थी मुझे

    एक बे-बर्ग शजर धुँद में लिपटा हुआ था
    शाख़ पर बैठी दु'आओं की ज़रूरत थी मुझे

    रात मस्जिद में अँधेरा तो बहुत था लेकिन
    याद भूली सी कोई राह-ए-इबादत थी मुझे

    ऐ मिरी जाँ वही 'ग़ालिब' की सी हालत थी मिरी
    तेरे जाने की घड़ी थी कि क़यामत थी मुझे

    दास्ताँ-गो ने दिखा दी थी मुझे शहज़ादी
    और फिर ख़्वाब में चलने की भी आदत थी मुझे
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    Ahmad Ata
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    ये मिरा वहम तो कुछ और सुना जाता है
    इक गुमाँ है कि तिरा अक्स दिखा जाता है

    एक तस्वीर दिल-ए-हिज्र-ज़दा में है तिरी
    एक तस्वीर कोई और बना जाता है

    तेरी मिन्नत भी मिरी जाँ बड़ी की जाती है
    ज़ेर-ए-लब एक वज़ीफ़ा भी पढ़ा जाता है

    चाँद ने मुझ पे कमाँ एक तनी होती है
    तीर लगता नहीं किस ओर चला जाता है

    तू जो आता है महकता हूँ गुलाबों की तरह
    और तिरा ख़्वाब जब आता है रुला जाता है

    जानता हूँ न तअ'ल्लुक़ न ज़रूरत है तुझे
    तुझ को ये कौन मिरे पास बिठा जाता है

    इक जवाँ उस की गली में जो गया मारा गया
    ये फ़साना है मगर किस से सुना जाता है
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    Ahmad Ata
    7
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    हमारा इश्क़ सलामत है या'नी हम अभी हैं
    वही शदीद अज़िय्यत है या'नी हम अभी हैं

    उसी पुरानी कहानी में साँस लेते हैं
    वही पुरानी मोहब्बत है या'नी हम अभी हैं

    न जाने कब से दर-ए-दास्ताँ पे बैठे हैं
    और इंतिज़ार की हिम्मत है या'नी हम अभी हैं

    तलब के कर्ब में इक मर्ग के दुआ-गो थे
    तलब में वैसी ही शिद्दत है या'नी हम अभी हैं

    कसी के नाम पे हम दोस्ती निभाते थे
    और अब भी वैसी ही शोहरत है या'नी हम अभी हैं

    तलब बढ़ाती चली जा रही है अपनी हवस
    सो क़द्रे ख़ाम क़नाअ'त है या'नी हम अभी हैं

    कलाम-ए-'मीर' के सदक़े में शे'र होते हैं
    जो बैत है सो क़यामत है या'नी हम अभी हैं

    अजब ये शे'र हैं अपने कि जिन में हम भी नहीं
    बस एक ग़म की शरारत है या'नी हम अभी हैं

    ये इश्क़ पेशगी दार-ओ-रसन के हंगा
    में
    ये रंग ज़िंदा सलामत है या'नी हम अभी हैं

    अमीर-ए-शहर है बेचैन शैख़ ख़ौफ़-ज़दा
    अभी तलक ये अदावत है या'नी हम अभी हैं

    न पूरी है न अधूरी ये दास्तान-ए-अलम
    कोई सुनी सी हिकायत है या'नी हम अभी हैं
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    Ahmad Ata
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    हुई ग़ज़ल ही न कुछ बात बन सकी हम से
    ये सरगुज़िश्त-ए-जुनूँ कब बयाँ हुई हम से

    सड़क पे बैठ गए देखते हुए दुनिया
    और ऐसे तर्क हुई एक ख़ुद-कुशी हम से

    हम आ गए थे घने बरगदों के साए में
    सौ बात करने चली आई रौशनी हम से

    वो ख़्वाब क्या था कि जो भूलने लगा दम-ए-सुब्ह
    वो रात कैसी थी जो रूठने लगी हम से

    बुझा के अपने अलाव पड़ा हमें छुपना
    तो यूँ कहानी फ़रामोश हो गई हम से

    हम आज फिर बड़ी ताब-ओ-तवाँ से जुलते हैं
    फिर आज सहम तो जाएगी तीरगी हम से

    हम आज भी उसी दरवाज़े की बने थे दर्ज़
    वो बे-नियाज़ उसी तरह फिर मिली हम से
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    Ahmad Ata
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    हमें न देखिए हम ग़म के मारे जैसे हैं
    कि हम तो वैसे हैं उस के इशारे जैसे हैं

    ये वस्ल, वस्ल की मद में ग़लत शुमार किया
    कि उस के साथ भी यूँही किनारे जैसे हैं

    तिलिस्म-ए-चश्म सलामत रहे कि जिस के सबब
    कहीं हैं फूल कहीं हम सितारे जैसे हैं

    वो जानता है जभी दूर भागता है बहुत
    वो जानता है हम उस को ख़सारे जैसे हैं

    हम आज हँसते हुए कुछ अलग दिखाई दिए
    ब-वक़्त-ए-गिर्या हम ऐसे थे, सारे जैसे हैं

    उसे कहो कि सितारे शुमार तो न करे
    कहो क़दम धरे, छोड़े उतारे जैसे हैं

    ये ग़म के फूल हैं या शे'र देखिए और बस
    हमें पता है कि हम ने निखारे जैसे हैं
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    Ahmad Ata
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    ऐ मियाँ कौन ये कहता है मोहब्बत की है
    बात ये है कि यहाँ बात ज़रूरत की है

    फिर कोई चाक गरेबान लिए फिरता है
    हज़रत-ए-इश्क़ ने फिर कोई शरारत की है

    बस यूँही एक हयूला सा नज़र आया था
    और फिर दिल ने धड़कने की जो शिद्दत की है

    वो मिरी चाह का वैसे भी तलबगार न था
    फिर मिरे दिल ने सँभलने में भी उजलत की है

    हम बहुत दूर चले आए हैं बसने को 'अता'
    इस से पहले भी बहुत दूर से हिजरत की है
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    Ahmad Ata
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    मिरे लिए तिरा होना अहम ज़ियादा है
    ये बाक़ी ज़िक्र-ए-वजूद-ओ-अदम ज़ियादा है

    वो ख़ाली-पन है कहीं कुछ कशिश नहीं है मुझे
    कोई ख़ुशी है बहुत और न ग़म ज़ियादा है

    तिरे बग़ैर ज़रूरत ही किया पड़ी है मुझे
    तिरे बग़ैर ये दम है सो दम ज़ियादा है

    ये मेरी आँख है याँ ख़्वाब कैसे ठहरेंगे
    कि सीम-ख़ुर्दा ज़मीं है जो नम ज़ियादा है

    मिरा ये दिल कि जिसे कोई पेच-ओ-ताब नहीं
    तिरी ये ज़ुल्फ़ जिसे पेच-ओ-ख़म ज़ियादा है

    तू ख़ूब जानता है यार-ए-बे-नियाज़ कि अब
    जुनूँ बहुत है मुझे फिर भी कम ज़ियादा है
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    Ahmad Ata
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    सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें
    देर तक चूमता रहूँगा तुम्हें

    तुम भले देखते रहो सब को
    मैं छुपा कर कहीं रखूँगा तुम्हें

    तुम बने हो बने रहो ख़ुशबू
    मैं किसी रोज़ ले उड़ूँगा तुम्हें

    राग हो, दिल की धड़कनों का राग
    सामने बैठ कर सुनूँगा तुम्हें

    देखना देखते हुए मुझ को
    किस तरह आँख में भरूँगा तुम्हें

    जाओ छुपते फिरो गुरेज़ करो
    एक दिन मैं भी देख लूँगा तुम्हें

    तुम बहुत दूर जा चुके होगे
    मैं कहाँ ढूँढ़ता फिरूंगा तुम्हें

    इक दिन अहमद-'अता' भी ख़्वाब हुआ
    कह गया ख़्वाब में मिलूँगा तुम्हें
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    Ahmad Ata
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