Ehya Bhojpuri

Top 10 of Ehya Bhojpuri

    कैसे कभी किसी को दिखाएगा आईना
    जब एक दूसरे को लड़ाएगा आईना

    जिस रौशनी पे अक्स का दार-ओ-मदार है
    उस रौशनी को कौन दिखाएगा आईना

    फ़ितरत में उस की नाज़-ख़िरामी नहीं तो फिर
    क्यूँकर किसी के नाज़ उठाएगा आईना

    समझो कि आईने का जनाज़ा निकल गया
    जिस दिन अमीर-ए-शहर को भाएगा आईना

    ऐसा नहीं कि सिर्फ़ सँवारेगा शख़्सियत
    एहसान भी न तुम पे जताएगा आईना

    पर्दा पड़ा हो आँखों पे मुमकिन तो है मगर
    मुमकिन नहीं कि ऐब छुपाएगा आईना

    कह दो अना-परस्त से 'अहया' कि जल्द ही
    मैं और हम के दरमियाँ आएगा आईना
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    दीप अंधों के दरमियाँ होगा
    तो उजाले का इम्तिहाँ होगा

    दिल के अंदर भी चार ख़ाने हैं
    कोई कैसे न बद-गुमाँ होगा

    जिस के पैरों तले ज़मीं होगी
    उस के क़दमों में आसमाँ होगा

    इक हक़ीक़त से आश्ना हूँ मैं
    सब का दुनिया में इम्तिहाँ होगा

    जाओगे तुम जहाँ जहाँ 'अहया'
    इक दिवाना वहाँ वहाँ होगा
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    किसी की चाहत में क़ैद रहना बुरा नहीं है तो और क्या है
    बग़ैर खिड़की के घर में रहना सज़ा नहीं है तो और क्या है

    पुराने पत्तों को झाड़ देना नए-नवेलों को राह देना
    ख़ुदा के बंदे अगर ये कार-ए-ख़ुदा नहीं है तो और क्या है

    ख़ुद अपने काँधों पे लाश उठाए मैं दफ़्न होने को जा रहा हूँ
    ये ज़िंदा लाशों का आख़िरी मरहला नहीं है तो और क्या है

    मैं जब भी चाहूँ बुला लूँ बादल गिरा दूँ बारिश उगा दूँ गंदुम
    ख़ुदा के लहजे में बात करना अना नहीं है तो और क्या है

    फ़सादियों को तरह तरह से जो आज हम तुम बचा रहे हैं
    मुनाफ़िक़त की ये आख़िरी इंतिहा नहीं है तो और क्या है

    पुराने ज़ख़्मों को याद रखना कुरेदना और नमक लगाना
    फिर उस की यादों में डूब जाना नशा नहीं है तो और क्या है

    हमारी मंज़िल वही है 'अहया' जहाँ से बे-दख़्ल हम हुए थे
    तो जी के मरना या मर के जीना सज़ा नहीं है तो और क्या है
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    तुम्हारी तारीख़ कोई बदले उसे मिटाए तो सर उठाओ
    अगर शराफ़त न काम आए न हक़ दिलाए तो सर उठाओ

    कहीं उजाला कहीं अँधेरा बग़ैर साज़िश नहीं है मुमकिन
    चराग़ जब रौशनी बराबर न बाँट पाए तो सर उठाओ

    किसी के हिस्से की बारिशें जब किसी की फ़स्लों को लहलहाएँ
    और उस की साज़िश का शक हवा पर अगर न जाए तो सर उठाओ

    अगर हो काँटों की क़द्र-ओ-क़ीमत किसी चमन में गुलों से बढ़ कर
    और उस का माली दलील दे उस को हक़ बताए तो सर उठाओ

    क़लम उठाओ नज़र मिलाओ तुम अब लब-ए-एहतिजाज खोलो
    मुख़ालिफ़त से मुनाफ़िक़त को कोई बुलाए तो सर उठाओ

    किसी की बातों में तुम न आओ न सर उठाओ न सर झुकाव
    अगर तुम्हारा ज़मीर जागे तुम्हें जगाए तो सर उठाओ

    ये क्या कि हर वक़्त जी-हुज़ूरी में सर झुकाए हुए हो अहया
    अगर बग़ावत का पर तुम्हारा भी फड़फड़ाए तो सर उठाओ
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    मतलब का कोई शे'र सुनाएँ जहाँ-पनाह
    हम सामईं पे क़हर न ढाएँ जहाँ-पनाह

    बच्चों को भूके पेट सुलाने के बा'द हम
    कैसे ग़ज़ल के शे'र सुनाएँ जहाँ-पनाह

    हर सू बिखेरता हो बराबर सी रौशनी
    ऐसा भी इक चराग़ जलाएँ जहाँ-पनाह

    पर्दे के पीछे बैठ के खेलेंगे कब तलक
    पर्दे के सामने भी तो आएँ जहाँ-पनाह

    गर जान की अमाँ हो तो दरख़्वास्त है मिरी
    फूलों को ख़ार से न मिलाएँ जहाँ-पनाह
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    तब्सिरा क्यूँ कर रहे हो बारहा अज्दाद पर
    फ़ैसला होगा तुम्हारा आज की बुनियाद पर

    बात तेरी मिल-मिला कर ठीक है नक़्क़ाद पर
    शे'र अच्छा या बुरा है मुनहसिर है दाद पर

    सब हिफ़ाज़त कर रहें हैं मुस्तक़िल दीवार की
    जब कि हमला हो रहा है मुस्तक़िल बुनियाद पर

    कैसे निकलोगे भला अपने गुनह के जाल से
    तुम ने तो इल्ज़ाम सारा रख दिया सय्याद पर

    दर-ब-दर फिरना पड़ेगा आशिक़ों को उम्र भर
    ज़ुल्म सहना लाज़मी है वारिस-ए-फ़र्हाद पर

    माँ के पैरों के तले जन्नत की ने'मत है मगर
    बाप का साया भी 'अहया' चाहिए औलाद पर
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    ज़बान बंद रखें और तुम से डर जाएँ
    ये बात ज़ेहन में आने से क़ब्ल मर जाएँ

    मुआ'फ़ी माँगने जाएँ ख़ुदा के घर लेकिन
    ख़ता हरम में हुई हो तो फिर किधर जाएँ

    मैं अब बदल नहीं सकता मिज़ाज जीने का
    अब आप चाहें तो ठहरें वगर्ना घर जाएँ

    बहार-ए-नौ में नए गुल तो खिल रहे हैं मगर
    झड़ी हैं शाख़ से जो पत्तियाँ किधर जाएँ

    वो जान-बूझ के नाख़ुन बढ़ा के रखते हैं
    ये चाहते ही नहीं हैं कि ज़ख़्म भर जाएँ

    मिला है तख़्त जो जम्हूरियत में बानर को
    तो उन से क्या सभी जंगल के शे'र डर जाएँ
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    जब हो गया कमाल तो सिगरेट जला लिया
    या फिर हुआ मलाल तो सिगरेट जला लिया

    ख़ुद पर किसी को हँसने का मौक़ा नहीं दिया
    पूछा किसी ने हाल तो सिगरेट जला लिया

    सूखे गले से लफ़्ज़ को लाना था ज़ेहन तक
    जब आ गया ख़याल तो सिगरेट जला लिया

    ग़ुस्से में ख़ूँ के घूँट तो पीता रहा मगर
    आँखें हुईं जो लाल तो सिगरेट जला लिया

    अच्छी नहीं है शय मगर 'अहया' मैं क्या करूँ
    करना है शुक्र-ए-हाल तो सिगरेट जला लिया
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    कितना कमज़ोर है ईमान पता लगता है
    घर में आया हुआ मेहमान बुरा लगता है

    मैं ने होंटों पे तबस्सुम तो सजा रक्खा है
    ग़म भुलाने में मगर वक़्त बड़ा लगता है

    आप बेकार मुझे शजरा दुखाने आए
    आप जो भी हैं वो लहजे से पता लगता है

    जब मिलाता हूँ नज़र तो नहीं मिलती नज़रें
    जब हटाता हूँ नज़र उस को बुरा लगता है

    तितलियाँ बन गईं फिर आज वफ़ादार कई
    बाग़ में कोई नया फूल खिला लगता है

    यूँ ग़म-ए-हिज्र को दुनिया से छुपाता हूँ मगर
    कितना कमज़ोर हूँ आँखों से पता लगता है
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    ऐ काश हो बरसात ज़रा और ज़रा और
    बढ़ जाए मुलाक़ात ज़रा और ज़रा और

    हाथों में तिरा हाथ ये काफ़ी तो नहीं है
    मिल जाएँ ख़यालात ज़रा और ज़रा और

    खलती है ये तन्हाई तो दूरी भी मिटा दे
    तू मान मिरी बात ज़रा और ज़रा और

    बुझती है कहाँ प्यास अब आँखों से पिला कर
    दे प्यार की सौग़ात ज़रा और ज़रा और

    हालात हूँ हमवार तो क्या फ़िक्र है लेकिन
    मुश्किल में मुनाजात ज़रा और ज़रा और

    जब प्यार से मिलता है तो भरता है कहाँ दिल
    उल्फ़त से भरी रात ज़रा और ज़रा और
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