हर तरफ़ कतरनें हैं
वो गुड़िया यहीं थी मगर अब दिखाई नहीं दे रही
वो गुड़िया यहीं थी मगर अब दिखाई नहीं दे रही
और ये धागे, यक़ीनन वो गेसू हैं जिन के लिए मेरी रातें कटीं
रूई धुनकी हुई है
कहीं ख़ून का कोई धब्बा नहीं
इक तरफ़ उस की पोशाक उधड़ी पड़ी है
उधर उस की आँखें, कटे अब्रूओं से अलग,
ख़ौफ़-ओ-दहशत में लुथड़ी हुई
हर तरफ़ कतरनें हैं
बदन रेशा रेशा है
नीचे का धड़ चील कव्वे उठा ले गए
लबों का लहू जम गया है
(लहू, जो यक़ीनन किसी और का है)
गले पर किसी गुर्ग के दाँत खींचे हुए हैं
वो गुड़िया नहीं है मगर हर तरफ़ कतरनें हैं
मैं आइंदा गुड़िया की ख़ातिर कपास और धागे नहीं लाऊँगा
कतरनें ले के अपनी किसी और जानिब निकल जाऊँगा
Read Fullरूई धुनकी हुई है
कहीं ख़ून का कोई धब्बा नहीं
इक तरफ़ उस की पोशाक उधड़ी पड़ी है
उधर उस की आँखें, कटे अब्रूओं से अलग,
ख़ौफ़-ओ-दहशत में लुथड़ी हुई
हर तरफ़ कतरनें हैं
बदन रेशा रेशा है
नीचे का धड़ चील कव्वे उठा ले गए
लबों का लहू जम गया है
(लहू, जो यक़ीनन किसी और का है)
गले पर किसी गुर्ग के दाँत खींचे हुए हैं
वो गुड़िया नहीं है मगर हर तरफ़ कतरनें हैं
मैं आइंदा गुड़िया की ख़ातिर कपास और धागे नहीं लाऊँगा
कतरनें ले के अपनी किसी और जानिब निकल जाऊँगा
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घड़ी दो घड़ी की मसर्रत
ये सदियों पे फैला हुआ देव-क़िस्सा हमारे लहू में रवाँ है
ये सदियों पे फैला हुआ देव-क़िस्सा हमारे लहू में रवाँ है
किसी घोंसले में से अंडे चुराता हुआ सूरमा
एक चीते से गुर सीखता कोई बच्चा
कमाँ खींचता और मादा को नावक से नीचे गिराता हुआ
आग दरयाफ़्त करता हुआ कोई लड़का
अजब सूरतें हैं
शब-ए-दास्ताँ-गोई सदियों पे फैली हुई है
हवा मर्ग़-ज़ारों की यख़-बस्तगी में नहीं रह सकी
सो यहाँ आ गई है कि अपना बदन गर्म कर ले
ये आग अब जिबिल्लत की तरतीब का लाज़िमा है
बहीमाना ख़सलत को तस्कीन देता हुआ एक उंसुर
हवा देव-मालाओं के दौर की एक बुढ़िया है
जिस को हर इक दास्ताँ याद है
ये घड़ी दो घड़ी की मसर्रत
जिसे दास्ताँ-गो की बातों से हम ने किया है कशीद
एक दिन आएगा जब हवा अपने क़िस्से में वो सूरतें लाएगी
जिन का आईना हम हैं
शब-ए-दास्ताँ-गोई में हम जो मबहूत ओ हैरान बैठे हुए
दास्तान सुन रहे हैं
कभी एक ठिठुरी हुई रात में हम कहानी का मरकज़ बनेंगे
जो बच्चे अदम हैं
हमें दास्ताँ में घिरा देख कर खिलखिलाएँगे
मबहूत-ओ-हैराँ होंगे
Read Fullएक चीते से गुर सीखता कोई बच्चा
कमाँ खींचता और मादा को नावक से नीचे गिराता हुआ
आग दरयाफ़्त करता हुआ कोई लड़का
अजब सूरतें हैं
शब-ए-दास्ताँ-गोई सदियों पे फैली हुई है
हवा मर्ग़-ज़ारों की यख़-बस्तगी में नहीं रह सकी
सो यहाँ आ गई है कि अपना बदन गर्म कर ले
ये आग अब जिबिल्लत की तरतीब का लाज़िमा है
बहीमाना ख़सलत को तस्कीन देता हुआ एक उंसुर
हवा देव-मालाओं के दौर की एक बुढ़िया है
जिस को हर इक दास्ताँ याद है
ये घड़ी दो घड़ी की मसर्रत
जिसे दास्ताँ-गो की बातों से हम ने किया है कशीद
एक दिन आएगा जब हवा अपने क़िस्से में वो सूरतें लाएगी
जिन का आईना हम हैं
शब-ए-दास्ताँ-गोई में हम जो मबहूत ओ हैरान बैठे हुए
दास्तान सुन रहे हैं
कभी एक ठिठुरी हुई रात में हम कहानी का मरकज़ बनेंगे
जो बच्चे अदम हैं
हमें दास्ताँ में घिरा देख कर खिलखिलाएँगे
मबहूत-ओ-हैराँ होंगे
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ख़्वाब की सल्तनत से उधर
इक जहाँ है जिसे आँख आबाद कर ले तो कर ले
इक जहाँ है जिसे आँख आबाद कर ले तो कर ले
वहाँ साए ही साए हैं
अक्सर ओ बेश-तर धूप में रक़्स करते हुए
रेज़गारी की आवाज़ पर धड़कनें ताल देती हैं तो झिलमिलाते हैं
आँखों में ख़्वाब
(अपना घर उस के दार-उल-ख़िलाफ़े में है)
सुब्ह से शाम तक
नोट गिनती हुई उँगलियाँ यूँ थिरकती हैं
जैसे तमन्नाओं को थपकियाँ दे शब-ए-हिज्र में एक ब्रिहन का दिल
रोज़ ख़्वाबों की पूँजी में सिक्कों के गिरने से इक गूँज उठती है
गोया कहीं टीन की छत पे बारिश के क़तरे पड़ें
रोज़ इक घर तमन्ना के मलबे से आँखों के पाताल में झाँकता है
वही बे-घरी बे-ज़मीनी का दुख आज तक मुझ को घेरे हुए है
मैं चाँद और सूरज की सूरत फ़लक-दर-फ़लक तैरता हूँ
मिरे ख़्वाब मुझ को उड़ाए लिए जा रहे हैं
मैं पामाल होती हुई आरज़ू में कहाँ तक जि
यूँगा
Read Fullअक्सर ओ बेश-तर धूप में रक़्स करते हुए
रेज़गारी की आवाज़ पर धड़कनें ताल देती हैं तो झिलमिलाते हैं
आँखों में ख़्वाब
(अपना घर उस के दार-उल-ख़िलाफ़े में है)
सुब्ह से शाम तक
नोट गिनती हुई उँगलियाँ यूँ थिरकती हैं
जैसे तमन्नाओं को थपकियाँ दे शब-ए-हिज्र में एक ब्रिहन का दिल
रोज़ ख़्वाबों की पूँजी में सिक्कों के गिरने से इक गूँज उठती है
गोया कहीं टीन की छत पे बारिश के क़तरे पड़ें
रोज़ इक घर तमन्ना के मलबे से आँखों के पाताल में झाँकता है
वही बे-घरी बे-ज़मीनी का दुख आज तक मुझ को घेरे हुए है
मैं चाँद और सूरज की सूरत फ़लक-दर-फ़लक तैरता हूँ
मिरे ख़्वाब मुझ को उड़ाए लिए जा रहे हैं
मैं पामाल होती हुई आरज़ू में कहाँ तक जि
यूँगा
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चंद साल उस तरफ़
हम शनासा निगाहों से बचते-बचाते
हम शनासा निगाहों से बचते-बचाते
यहीं पर मिले थे
तुम्हें याद है
काएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थी
हमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखें
किसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थी
मगर मैं ने आँखों में
अपने लिए और तुम्हारे लिए
मछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखीं
मुझे याद है
जब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजे
तो तुम कितनी नर्वस हुईं
जल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गए
दूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगे
अब मोहब्बत का मस्कन कहीं और है
ये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए है
जहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा है
कहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुए
आओ आगे चलें
Read Fullतुम्हें याद है
काएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थी
हमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखें
किसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थी
मगर मैं ने आँखों में
अपने लिए और तुम्हारे लिए
मछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखीं
मुझे याद है
जब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजे
तो तुम कितनी नर्वस हुईं
जल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गए
दूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगे
अब मोहब्बत का मस्कन कहीं और है
ये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए है
जहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा है
कहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुए
आओ आगे चलें
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वही बहार ओ ख़िज़ाँ है मुझ में भी
मुझ से बाहर भी
मुझ से बाहर भी
(आदमी से अलग नहीं हूँ)
शगूफ़े फूटें तो ख़ून में गीत बोलते हैं
कभी कभी ख़ार की खटक टीस बन के होंटों से झाँकती है
न-जाने कितने ही गीत थे जो बहार से पहले
शाख़ की रग में जी रहे थे
जड़ों का बुख़्ल उन को खा गया है
ये ख़ार, सौतेले बेटे शाख़ों के
इन तक आया नहीं है नम
फिर भी जी रहे हैं
(चमकते सूरज का सारा सच उन के बत्न में है)
तपिश की शिद्दत को पी के सूखे सड़े हुए हैं
प जी रहे हैं
मुझे ख़िज़ाँ और बहार के राबतों में जीना है
फूल का इल्तिफ़ात काँटे के तल्ख़ ता'ने
मिरे हवाले हैं
जड़ का नम, आफ़्ताब की तब
मिरे हुनर में ही बोलती है
मैं कितनी सतहों पे जी रहा हूँ
कभी कोई फूल मुस्कुराए
कभी कोई ख़ार दिल दुखाए
तो मुझ तक आना
ये नज़्म दोनों का माजरा है
Read Fullशगूफ़े फूटें तो ख़ून में गीत बोलते हैं
कभी कभी ख़ार की खटक टीस बन के होंटों से झाँकती है
न-जाने कितने ही गीत थे जो बहार से पहले
शाख़ की रग में जी रहे थे
जड़ों का बुख़्ल उन को खा गया है
ये ख़ार, सौतेले बेटे शाख़ों के
इन तक आया नहीं है नम
फिर भी जी रहे हैं
(चमकते सूरज का सारा सच उन के बत्न में है)
तपिश की शिद्दत को पी के सूखे सड़े हुए हैं
प जी रहे हैं
मुझे ख़िज़ाँ और बहार के राबतों में जीना है
फूल का इल्तिफ़ात काँटे के तल्ख़ ता'ने
मिरे हवाले हैं
जड़ का नम, आफ़्ताब की तब
मिरे हुनर में ही बोलती है
मैं कितनी सतहों पे जी रहा हूँ
कभी कोई फूल मुस्कुराए
कभी कोई ख़ार दिल दुखाए
तो मुझ तक आना
ये नज़्म दोनों का माजरा है
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अजब यक़ीन सा उस शख़्स के गुमान में था
वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था
वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था
हवा भरी हुई फिरती थी अब के साहिल पर
कुछ ऐसा हौसला कश्ती के बादबान में था
हमारे भीगे हुए पर नहीं खुले वर्ना
हमें बुलाता सितारा तो आसमान में था
उतर गया है रग-ओ-पय में ज़ाइक़ा उस का
अजीब शहद सा कल रात उस ज़बान में था
खुली जो आँख तो 'ताबिश' कमाल ये देखा
वो मेरी रूह में था और मैं मकान में था
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न देखें तो सुकूँ मिलता नहीं है
हमें आख़िर वो क्यूँ मिलता नहीं है
हमें आख़िर वो क्यूँ मिलता नहीं है
मोहब्बत के लिए जज़्बा है लाज़िम
ये आईना तो यूँ मिलता नहीं है
हम इक मुद्दत से दर पर मुंतज़िर हैं
मगर इज़्न-ए-जुनूँ मिलता नहीं है
है जितना ज़र्फ़ उतनी पासदारी
ज़रूरत है फ़ुज़ूँ मिलता नहीं है
अजब होती है आइंदा मुलाक़ात
हमेशा जूँ का तूँ मिलता नहीं है
अगर मिलते भी हों अपने ख़यालात
तो इक दूजे से ख़ूँ मिलता नहीं है
वो मेरे शहर में रहता है 'ताबिश'
मगर मैं क्या करूँ मिलता नहीं है
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क्या कहूँ वो किधर नहीं रहता
हाँ मगर इस नगर नहीं रहता
हाँ मगर इस नगर नहीं रहता
तू हो तेरा ख़याल हो या ख़्वाब
कोई भी रात भर नहीं रहता
जब सुकूँ ही न दे सके तो फिर
घर किसी तौर घर नहीं रहता
जिस घड़ी चाहो तुम चले आओ
मैं कोई चाँद पर नहीं रहता
यूँ तो अपनी भी जुस्तुजू है मुझे
तुझ से भी बे-ख़बर नहीं रहता
दिल-फ़िगारों के शहर में 'ताबिश'
एक भी बख़िया-गर नहीं रहता
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हमारा डूबना मुश्किल नहीं था
नज़र में दूर तक साहिल नहीं था
नज़र में दूर तक साहिल नहीं था
कहाँ था गुफ़्तुगू करते हुए वो
वो था भी तो सर-ए-महफ़िल नहीं था
मैं उस को सब से बेहतर जानता हूँ
जिसे मेरा पता हासिल नहीं था
ज़माने से अलग थी मेरी दुनिया
मैं उस की दौड़ में शामिल नहीं था
वो पत्थर भी था कितना ख़ूब-सूरत
जो आईना था लेकिन दिल नहीं था
हम उस धरती के बाशिंदे थे 'ताबिश'
कि जिस का कोई मुस्तक़बिल नहीं था
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कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है
किस को मालूम कि दीवार से आगे क्या है
किस को मालूम कि दीवार से आगे क्या है
एक तुर्रा सा तो मैं देख रहा हूँ लेकिन
कोई बतलाए कि दस्तार से आगे क्या है
ज़ुल्म ये है कि यहाँ बिकता है यूसुफ़ बे-दाम
और नहीं जानता बाज़ार से आगे क्या है
सर में सौदा है कि इक बार तो देखूँ जा कर
सर-ए-मैदान सजी दार से आगे क्या है
जिस ने इंसाँ से मोहब्बत ही नहीं की 'ताबिश'
उस को क्या इल्म कि पिंदार से आगे क्या है
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