हर्फ़ हूँ अपने मआ'नी ढूँढ़ता हूँ

में हक़ीक़त में कहानी ढूँढ़ता हूँ

तंग आ कर तंगी-ए-कौन-ओ-मकाँ से
अपने अंदर बे-करानी ढूँढ़ता हूँ

छानता हूँ ख़ाक सहरा-ए-अदम में
अपने होने की निशानी ढूँढ़ता हूँ

मेरी हर जानिब नए चेहरे सजे हैं
अब कोई सूरत पुरानी ढूँढ़ता हूँ

माँगता हूँ तर्ज़-ए-नौ रस्म-ए-कुहन से
ख़ुश्क दरिया में रवानी ढूँढ़ता हूँ

आरज़ू के बीच मुट्ठी में दबाए
ज़ीस्त के सहरा में पानी ढूँढ़ता हूँ

हर्फ़ की हिद्दत से लब जलने लगे हैं
अब ज़बान-ए-बे-ज़बानी ढूँढ़ता हूँ

जो सिखा दे आश्ती अहल-ए-ज़मीं को
वो किताब-ए-आसमानी ढूँढ़ता हूँ

— Ali Minai

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