Shiv
Shiv
Ghazal

बर्तन उदासी के सभी जब भर गए

सब चाहने वाले तेरे फिर घर गए

ज़िंदान से कोई बचा था ही नहीं
कुछ तौक़ से बंधे थे जिन के सर गए

उस को गले से ही लगा कर हम बचे
दिल से उसे जो भी लगाए मर गए

उम्मीद उन से थी हमें इस बात की
उन को कभी जाना नहीं था पर गए

वो  लोग  शे'र-ओ-शाइ'री  से  दूर  थे
बे-बहर को भी जो ग़ज़ल कह कर गए

काँटा बना कर वो गई है फूल को
'शिव' चुभ न जाए तोड़ने तुम गर गए

— Shiv

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