पिट जाता है पढ़ते ही सर-ए-बज़्म वो शहकार
आप अपने तईं जैसा भी शहकार निकालें
जाँ-कावी है ये काम नहीं आप के बस का
अश'आर नहीं शाम का अख़बार निकालें
खुल जाएगा सारा ही भरम ख़ुश-सुख़नी का
महफ़िल से ज़रा हाशिया-बरदार निकालें
अल्फ़ाज़ के नश्तर ने जिगर चीर दिया है
बेहतर है ज़बाँ रोक के तलवार निकालें
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इस वास्ते लोगों को सुनाई नहीं देते
हम आह तो भरते हैं दुहाई नहीं देते
हम आह तो भरते हैं दुहाई नहीं देते
कुछ दर्द हैं ऐसे कि जो चेहरे से अयाँ हैं
कुछ ज़ख़्म हैं ऐसे जो दिखाई नहीं देते
वो रास्ते जचते ही नहीं अहल-ए-दिलाँ को
वो रास्ते जो आबला-पाई नहीं देते
यादों की है इक बज़्म सजी ख़ाना-ए-दिल में
इस बज़्म में ग़ैरों को रसाई नहीं देते
हम लोग तअल्लुक़ में बहुत साफ़ हैं लेकिन
हम लोग तअल्लुक़ की सफ़ाई नहीं देते
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मुनाफ़िक़ीन से अज़लाम से मुक़ाबला है
मदीने वाले हैं और शाम से मुक़ाबला है
मदीने वाले हैं और शाम से मुक़ाबला है
ख़ुदा के आख़िरी पैग़ाम से मुक़ाबला है
जनाब-ए-शैख़ का इस्लाम से मुक़ाबला है
हमारे शे'र का आवर्द से तक़ाबुल छोड़
हमारे शे'र का इल्हाम से मुक़ाबला है
वो पास बैठा है और वसवसे जुदाई के
मिरे यक़ीन का औहाम से मुक़ाबला है
बदन कमान हुआ और साँस घुटने लगी
हमारा गर्दिश-ए-अय्याम से मुक़ाबला है
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ज़िंदगी से कलाम करने को
इज़्न-ए-नूर-ए-सहर लिया जाए
हम से पादाश में मोहब्बत की
जान ली जाए सर लिया जाए
बे-ख़ता है तो फिर भी डर ऐ दोस्त
बे-ख़ता ही न धर लिया जाए
शहर-ए-उम्मीद कितना दिलकश है
आओ कुछ दिन ठहर लिया जाए
कैसा सरसब्ज़ है तुम्हारा साथ
इस को तस्वीर कर लिया जाए
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फ़ुज़ूल नाज़ उठाने से बात बिगड़ी है
किसी को दिल में बसाने से बात बिगड़ी है
किसी को दिल में बसाने से बात बिगड़ी है
था वाजिबी सा तअल्लुक़ तो बात अच्छी थी
तअ'ल्लुक़ात बढ़ाने से बात बिगड़ी है
हम इख़्तिलाफ़ को आपस में तय न कर पाए
किसी को बीच बुलाने से बात बिगड़ी है
मोहब्बतों में तकल्लुफ़ भी है सम-ए-क़ातिल
क़दम सँभल के उठाने से बात बिगड़ी है
तुम्हारे साथ बिगड़ने पे कुछ मलाल नहीं
हमारी एक ज़माने से बात बिगड़ी है
फ़ज़ा-ए-वहम दर आई तअ'ल्लुक़ात के बीच
घड़ी घड़ी के फ़साने से बात बिगड़ी है
हम अपनी ज़ात की तरदीद कर नहीं पाए
अना के ज़ो'म में आने से बात बिगड़ी है
तिरे बग़ैर गुज़ारा नहीं किसी सूरत
उसे ये बात बताने से बात बिगड़ी है
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जिसे भी चाहिए ख़ैरात-ए-नूर ले जाए
भड़क रहा है अलाव फ़क़ीर मौज में है
ख़रीद ले न तुम्हारी ये काएनात तमाम
उसे बताना न भाव फ़क़ीर मौज में है
गिरा हुआ तो नहीं है ज़मीं को था
में है
ज़मीन से न उठाओ फ़क़ीर मौज में है
बस इक तरीक़ा है उस के क़रीब जाने का
धमाल डालते जाओ फ़क़ीर मौज में है
अभी तुम उस की निगाहों से दो-जहाँ देखो
अभी सुबू न उठाओ फ़क़ीर मौज में है
ख़मोश बैठा हुआ है ख़मोश रहने दो
और अपनी ख़ैर मनाओ फ़क़ीर मौज में है
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अन-देखी और भोली-भाली दुनिया है
उस खिड़की के पार अनोखी दुनिया है
उस खिड़की के पार अनोखी दुनिया है
आप का इस्तेहक़ाक़ था राह बदल लेना
सब का अपना जीवन अपनी दुनिया है
चाँद सितारे जुगनू फूल किताबें ख़्वाब
इक लड़की की कितनी प्यारी दुनिया है
दिल की बात बता कर मुजरिम बन बैठे
इस्तिग़फ़ार ख़ुदाया कैसी दुनिया है
इश्क़-नगर में कोई पहला पीर नहीं
ख़ैर से अपनी देखी भाली दुनिया है
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जब एक शख़्स अपना ठिकाना बदल गया
फिर उस के साथ सारा ज़माना बदल गया
फिर उस के साथ सारा ज़माना बदल गया
बदली निगाह-ए-नाज़ किसी ख़ुश-जमाल ने
बदला रुख़-ए-कमान निशाना बदल गया
बारिश में तेज़ धूप निकल आई चार-सू
मौसम था वो जो ख़ूब सुहाना बदल गया
वो शख़्स बे-सबात का मतलब बताएगा
वो शख़्स जिस का दोस्त पुराना बदल गया
हिजरत के साथ साथ मईशत बदल गई
शजरे के साथ साथ घराना बदल गया
बे-चारी लड़कियों का भी कैसा नसीब है
निस्बत बदल गई तो ठिकाना बदल गया
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गुज़िश्ता शब जो इतनी रौशनी थी
तुम्हारी याद की जल्वागरी थी
तुम्हारी याद की जल्वागरी थी
फ़ज़ा में गुनगुनाहट थी अजब सी
हवा पत्तों से बातें कर रही थी
ग़ज़ल जैसा सरापा था किसी का
कोई सूरत मुकम्मल शाइ'री थी
तिरे अल्फ़ाज़ निश्तर बन गए थे
मोहब्बत इंतिहा पर आ गई थी
सुना है बा'द मेरे कुछ दिनों तक
वो मिट्टी पर लकीरें खींचती थी
वो गाहे अब पलट कर देखती है
कोई इक बात कहना रह गई थी
वही हम हैं वही तीरा-शबी है
मोहब्बत चार दिन की चाँदनी थी
लबों पर क़हक़हे ही क़हक़हे थे
कोई लड़की थी या वो फुलजड़ी थी
कोई दिल में अचानक आ बसा था
मोहब्बत की नहीं थी हो गई थी
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बोसा न दे गले न लगा हाथ मत मिला
ऐ यार-ए-ख़ुश-जमाल मगर सामने तो आ
ऐ यार-ए-ख़ुश-जमाल मगर सामने तो आ
दो चार गज़ के फ़ासले से मुस्कुरा के देख
दो चार गज़ के फ़ासले तक आ के लौट जा
या घर में बैठ और मुझे तस्वीर भेज दे
फ़स्ल-ए-वबा में वस्ल का अंदाज़ है जुदा
खिड़की से झाँक झाँक के ख़ुश हो ऐ रू-ए-ख़ुश
पट खोल देख देख के कुछ देर मुस्कुरा
गुज़रें वबा के दिन तो बग़ल-गीर होवेंगे
अरमान ज़ब्त कर ऐ मिरे यार थम ज़रा
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