बिछड़ के ख़ुदा से ज़फ़र हो चुका है

कि गुस्ताख़ अहल-ए-नज़र हो चुका है

तू ख़ुद में ही बनना ख़ुदा चाहता है
ये इंसाँ को देखो ज़बर हो चुका है

तुझे बा'द समझे, सुकूँ फिर न आए
मुझे किस दवा का असर हो चुका है

उड़ा इक परिंदा इधर फिर न आया
गिनाकर मसाइल ख़बर हो चुका है

न हो अब मुहब्बत, यही इल्तिजा है
तमाशा यहाँ इस क़दर हो चुका है

मुझे काश तालिब नज़र तू न आए
कहीं और रुख़्सत अगर हो चुका है

— Mohammad Talib Ansari

More by Mohammad Talib Ansari

Other ghazal from the same pen

See all from Mohammad Talib Ansari →

Parinda Shayari

Shers of parinda.

All Parinda Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling