कभी मैं ज़िक्र करूँँ दिन की शादमानी का

फ़साना ख़त्म तो हो शब की सरगिरानी का

सिमट के आ गया क़दमों में किस तरह सहरा
सुना था शोर बहुत उस की बे-करानी का

अजब नहीं कि नए रास्ते निकल आएँ
किसी ने रास्ता रोका है बहते पानी का

तमाम अहल-ए-ज़बाँ बातिलों के हक़ में हैं
मुझे मलाल नहीं अपनी बे-ज़बानी का

जो बात कहनी थी अब तक कही नहीं मैं ने
मैं इख़्तिताम करूँ कैसे इस कहानी का

ख़ुदा समझता है ख़ुद को यहाँ जो आता है
अजीब हाल है 'आलम' सरा-ए-फ़ानी का

— Alam Khursheed

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