आँखों से हाल-ए-दिल बता के देखा है

इक शख़्स को दुनिया बना के देखा है

इक आख़िरी उम्मीद का दम टूटा बस
दीवार से फोटो हटा के देखा है

आँखों को होता है मुयस्सर पानी ही
हम ने ये दिल विल सब लगा के देखा है

ख़ुद ही के बातिन पे उभर छाले गए
उन की तरह उन को सता के देखा है

इक रोज़ जो भूले नहीं लेते ख़बर
हूँ मुंतज़िर ख़ल्क़त भुला के देखा है

ये झूट है हम चाँद छू सकते नहीं
मैं ने बदन पे लब लगा के देखा है

अधरों पे उन के नाम भी आया नहीं
राहों में पलकें भी बिछा के देखा है

तू ने अभी देखा ही क्या है देखा है
रोते हुए सब को हँसा के देखा है

त्यागी ये दुनिया पैसे से ही चलती है
सच्ची ये भी पैसा कमा के देखा है

— Chhayank Tyagi

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