एक पत्ता गिरा
तू ने आँसू भरी तुंद गाली से जिस का स्वागत किया
तू ने आँसू भरी तुंद गाली से जिस का स्वागत किया
एक पत्ता गिरा
ख़ुश्क होंटों पर अपनी ज़बाँ फेर कर
तू ने इक बार फिर अपनी बंजर हथेली को आगे किया
एक पत्ता गिरा
लाल सूरज
जो दिन फिर पके सेब के रूप में
तेरे सर पर लटकती हुई
बाँझ शाख़ों के झूले से चिपका रहा
अब कहाँ है
वो रंगों का तूफ़ाँ
तुझे जिस की ख़ातिर हथेली की बंजर ज़मीं को सजाना पड़ा
अब कहाँ है
लरज़ता हुआ लाल सूरज तो काले समुंदर की झोली में गिर भी चुका
लो वो पत्ता गिरा
Read Fullख़ुश्क होंटों पर अपनी ज़बाँ फेर कर
तू ने इक बार फिर अपनी बंजर हथेली को आगे किया
एक पत्ता गिरा
लाल सूरज
जो दिन फिर पके सेब के रूप में
तेरे सर पर लटकती हुई
बाँझ शाख़ों के झूले से चिपका रहा
अब कहाँ है
वो रंगों का तूफ़ाँ
तुझे जिस की ख़ातिर हथेली की बंजर ज़मीं को सजाना पड़ा
अब कहाँ है
लरज़ता हुआ लाल सूरज तो काले समुंदर की झोली में गिर भी चुका
लो वो पत्ता गिरा
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बैन करते फिरे
आख़िरी पात के सोग में
तिलमिलाती रहे
ज़ात के रोग में
फिर वो रुत आए जब
चिकनी काई-ज़दा सी चट्टानों पे देखूँ मैं ख़ुद को
मैं आँखों के पानी को रोकूँ मगर पानी कैसे रुके
तब मैं चीख़ूँ बुलाऊँ उसे
गहरे नीले समुंदर की तह में वो होगी कहीं कौन जाने
मगर वो बुलावे को सुन कर समुंदर की तह से उभर कर
मिरे पास आए मुझे छू के देखे
कहे तुम कहाँ थे
ख़ुदारा बताओ कि तुम इतना अर्सा कहाँ थे
मुझे ख़ुद से लिपटाए महकी हुई गोद में ले के झूला झुलाए
कोई गीत गाए जो सय्याल चाँदी का चश्मा सा बन कर बहे
धुँद बन कर उड़े
मुझ को सूरज की गंदी तमाज़त से महफ़ूज़ कर दे
कहे अब तो जाने न दूँगी तुम्हें
अब मैं जाने न दूँगी तुम्हें
और मैं
अपने बोझल पपोटों को मीचे
किसी नर्म झोंके के क़दमों की आहट सुनूँ
तंग होते हुए दूधिया बाज़ुओं के
मुलाएम से हल्क़े में सोने लगूँ
काश सोने लगूँ
काश मैं सो सकूँ
Read Fullआख़िरी पात के सोग में
तिलमिलाती रहे
ज़ात के रोग में
फिर वो रुत आए जब
चिकनी काई-ज़दा सी चट्टानों पे देखूँ मैं ख़ुद को
मैं आँखों के पानी को रोकूँ मगर पानी कैसे रुके
तब मैं चीख़ूँ बुलाऊँ उसे
गहरे नीले समुंदर की तह में वो होगी कहीं कौन जाने
मगर वो बुलावे को सुन कर समुंदर की तह से उभर कर
मिरे पास आए मुझे छू के देखे
कहे तुम कहाँ थे
ख़ुदारा बताओ कि तुम इतना अर्सा कहाँ थे
मुझे ख़ुद से लिपटाए महकी हुई गोद में ले के झूला झुलाए
कोई गीत गाए जो सय्याल चाँदी का चश्मा सा बन कर बहे
धुँद बन कर उड़े
मुझ को सूरज की गंदी तमाज़त से महफ़ूज़ कर दे
कहे अब तो जाने न दूँगी तुम्हें
अब मैं जाने न दूँगी तुम्हें
और मैं
अपने बोझल पपोटों को मीचे
किसी नर्म झोंके के क़दमों की आहट सुनूँ
तंग होते हुए दूधिया बाज़ुओं के
मुलाएम से हल्क़े में सोने लगूँ
काश सोने लगूँ
काश मैं सो सकूँ
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नदी किनारे बाहें खोले इक अलबेला पेड़ खड़ा है
पेड़ ने रस्ता रोक लिया है
पगडंडी हैरान खड़ी है
जिस्म चुराए आँख झुकाए
दाएँ बाएँ देख रही है
जाने कब से बाहें खोले रस्ता रोके पेड़ खड़ा है
जाने कब से
जिस्म चुराए आँख झुकाए पगडंडी हैरान खड़ी है
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इक पीपल के नीचे मैं ने अपनी खाट बिछाई
लेट गया मैं खाट पे लेकिन नींद न मुझ को आई
लेट गया मैं खाट पे लेकिन नींद न मुझ को आई
आहें भरते करवटें लेते सारी उम्र गँवाई
पीपल के पत्तों को गिनते करते उन पर ग़ौर
पीपल की शाख़ों को तकते बीत गया इक दौर
पीपल की हर चीज़ पुरानी अलबेला हर तौर
चले हवा तो डाली डाली लचक लचक बल खाए
रुके हवा तो साधू बन कर ध्यान का दीप जलाए
झक्कड़ के हर वार पे डोले चीख़ चीख़ रह जाए
पीपल की शाख़ों पर बैठे कुछ पंछी सुस्ताएँ
बाहरस कुछ आने वाले इक कोहराम मचाएँ
गाएँ गीत अनोखे मिल कर नाचें और नचाएँ
पीपल क्या है जोगी का बे-दरसा इक स्थान
झोंके पत्ते पंछी इंसाँ सब इस के मेहमान
खाट पे लिपटा सोच रहा हूँ मैं मूरख नादान
Read Fullपीपल के पत्तों को गिनते करते उन पर ग़ौर
पीपल की शाख़ों को तकते बीत गया इक दौर
पीपल की हर चीज़ पुरानी अलबेला हर तौर
चले हवा तो डाली डाली लचक लचक बल खाए
रुके हवा तो साधू बन कर ध्यान का दीप जलाए
झक्कड़ के हर वार पे डोले चीख़ चीख़ रह जाए
पीपल की शाख़ों पर बैठे कुछ पंछी सुस्ताएँ
बाहरस कुछ आने वाले इक कोहराम मचाएँ
गाएँ गीत अनोखे मिल कर नाचें और नचाएँ
पीपल क्या है जोगी का बे-दरसा इक स्थान
झोंके पत्ते पंछी इंसाँ सब इस के मेहमान
खाट पे लिपटा सोच रहा हूँ मैं मूरख नादान
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पिघले से के मानिंद गिरती रही
मेरी रग रग में घुल कर बिखरती रही
और फिरे हुए तुंद ज़र्रों की सूरत
मिरे जिस्म में दौड़ती झनझनाती फिरी
सुब्ह होने को है
कोई दम में ये ज़ख़्मों भरी रात की गर्म चादर
उजाले के साबुन में धुल कर निखर आएगी
हर तरफ़ नर्म-ओ-नाज़ुक सी ख़ुशियों के छींटे
किवाड़ों को छेड़ेंगे सुलाएँगे
फूल खिल जाएँगे
क़हक़हों चहचहों की ज्वाला
स्याही के धब्बों को खा जाएगी
सोचता हूँ
ये इक तेज़ सी धार ऐसी चमकती सदा
जिस की किर्चें मिरी एक इक रग में
पंजों को गाड़े खड़ी हैं
कहाँ जाएगी
इतनी सदियों के बन-बास को झेल कर
अपने घर आई नारी से अब किस तरह मैं कहूँ
जाओ
ये घर तो ख़ुशियों की रानी का घर है
Read Fullमेरी रग रग में घुल कर बिखरती रही
और फिरे हुए तुंद ज़र्रों की सूरत
मिरे जिस्म में दौड़ती झनझनाती फिरी
सुब्ह होने को है
कोई दम में ये ज़ख़्मों भरी रात की गर्म चादर
उजाले के साबुन में धुल कर निखर आएगी
हर तरफ़ नर्म-ओ-नाज़ुक सी ख़ुशियों के छींटे
किवाड़ों को छेड़ेंगे सुलाएँगे
फूल खिल जाएँगे
क़हक़हों चहचहों की ज्वाला
स्याही के धब्बों को खा जाएगी
सोचता हूँ
ये इक तेज़ सी धार ऐसी चमकती सदा
जिस की किर्चें मिरी एक इक रग में
पंजों को गाड़े खड़ी हैं
कहाँ जाएगी
इतनी सदियों के बन-बास को झेल कर
अपने घर आई नारी से अब किस तरह मैं कहूँ
जाओ
ये घर तो ख़ुशियों की रानी का घर है
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हम तक पहुँचती
हमें तुंद यादों के गिर्दाब मैं
डूबते और उभरते हुए देख कर हम से कहती
मैं उन सब के जिस्मों से मस हो के आई हूँ
उन के पसीने की ख़ुश्बू को
अपने लिबादे में भर कर
हथेली पे रख कर मैं लाई हूँ
कभी सुर्ख़ सूरज निकलता
तो हम उस से कहते
तुम्हारी दहकती हुई आँख का राज़ क्या है
वो कहता
मैं इन सब की आँखों के ग़ुर्फों से
ये सारी उजली तमाज़त चुराता रहा हूँ
मैं दरयूज़ा-गर उन चराग़ों से ख़ुद को जलाता रहा हूँ
उन्हें हम ने ढूँडा
कभी सब्ज़ शबनम के छींटों में तारों की रोती हुई अंजुमन मैं
कभी सुब्ह की क़त्ल-गाह शब के घाइल बदन में
उन्हें हम ने आवाज़ दी कू-ब-कू
ग़म में डूबी हुई बस्तियों से अटे ख़ाक-दान-ए-वतन में
मगर वो नहीं थे कहीं भी नहीं थे
कहीं उन के क़दमों की हल्की सी आवाज़ तक भी नहीं थी
फिर इक रोज़ धरती का मौसम जो बदला
तो बादल ने शानों से हम को हिला कर जगाया
कहा उन के आने का पैग़ाम आया
चहकते परिंदों ने शाख़ों से उड़ कर
हवाओं में इक दायरा सा बनाया
कहा उन के आने का पैग़ाम आया
धनक सात रंगों में लिपटी हुई
इक कमाँ बन के ज़ाहिर हुई
हम से कहने लगी अपनी आँखों से देखा है मैं ने उन्हें
तेज़ क़दमों से आते हुए
शाम हँसने लगी
उस की आँखों में ख़ुशियों के आँसू थे
आरिज़ पे शबनम
नगीनों की सूरत चमकने लगी थी
Read Fullहमें तुंद यादों के गिर्दाब मैं
डूबते और उभरते हुए देख कर हम से कहती
मैं उन सब के जिस्मों से मस हो के आई हूँ
उन के पसीने की ख़ुश्बू को
अपने लिबादे में भर कर
हथेली पे रख कर मैं लाई हूँ
कभी सुर्ख़ सूरज निकलता
तो हम उस से कहते
तुम्हारी दहकती हुई आँख का राज़ क्या है
वो कहता
मैं इन सब की आँखों के ग़ुर्फों से
ये सारी उजली तमाज़त चुराता रहा हूँ
मैं दरयूज़ा-गर उन चराग़ों से ख़ुद को जलाता रहा हूँ
उन्हें हम ने ढूँडा
कभी सब्ज़ शबनम के छींटों में तारों की रोती हुई अंजुमन मैं
कभी सुब्ह की क़त्ल-गाह शब के घाइल बदन में
उन्हें हम ने आवाज़ दी कू-ब-कू
ग़म में डूबी हुई बस्तियों से अटे ख़ाक-दान-ए-वतन में
मगर वो नहीं थे कहीं भी नहीं थे
कहीं उन के क़दमों की हल्की सी आवाज़ तक भी नहीं थी
फिर इक रोज़ धरती का मौसम जो बदला
तो बादल ने शानों से हम को हिला कर जगाया
कहा उन के आने का पैग़ाम आया
चहकते परिंदों ने शाख़ों से उड़ कर
हवाओं में इक दायरा सा बनाया
कहा उन के आने का पैग़ाम आया
धनक सात रंगों में लिपटी हुई
इक कमाँ बन के ज़ाहिर हुई
हम से कहने लगी अपनी आँखों से देखा है मैं ने उन्हें
तेज़ क़दमों से आते हुए
शाम हँसने लगी
उस की आँखों में ख़ुशियों के आँसू थे
आरिज़ पे शबनम
नगीनों की सूरत चमकने लगी थी
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समुंदर अगर मेरे अंदर आ गिरे
तू पायाब लहरों में ढल के सुलगने लगे
तू पायाब लहरों में ढल के सुलगने लगे
प्यास के बे-निशाँ दश्त में
व्हेल मछली की सूरत तड़पने लगे
हारपूनों से नेज़ों से छलनी बदन पर
दहकती हुई रेत के तेज़ चर के सहे
और फिर रेत पर झाग के कुछ निशाँ छोड़ कर
ता-अबद सर-बुरीदास साहिल के साए में
होने न होने की मीठी अज़िय्यत में खोया रहे
ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत भी क्या है
निगाहें उठाऊँ तो हद्द-ए-नज़र तक
अज़ल और अबद के सुतूनों पे बारीक सा एक ख़ेमा तना है
न होने का ये रूप कितना नया है
और खे़
में के अंदर
करोड़ों सितारों का मेला लगा है
ये होने का बहरूप ला-इंतिहा है
मिरा जिस्म
रेशम का सद-चाक ख़ेमा
किसी बे-कराँ दश्त में बे-सहारा खड़ा है
मगर जब मैं आँखें झुकाऊँ
तो उस सर्द खे़
में के अंदर
करोड़ों तड़पते हुए तुंद ज़र्रों का इक दश्त फैला हुआ है
ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत
अजब माजरा है
Read Fullव्हेल मछली की सूरत तड़पने लगे
हारपूनों से नेज़ों से छलनी बदन पर
दहकती हुई रेत के तेज़ चर के सहे
और फिर रेत पर झाग के कुछ निशाँ छोड़ कर
ता-अबद सर-बुरीदास साहिल के साए में
होने न होने की मीठी अज़िय्यत में खोया रहे
ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत भी क्या है
निगाहें उठाऊँ तो हद्द-ए-नज़र तक
अज़ल और अबद के सुतूनों पे बारीक सा एक ख़ेमा तना है
न होने का ये रूप कितना नया है
और खे़
में के अंदर
करोड़ों सितारों का मेला लगा है
ये होने का बहरूप ला-इंतिहा है
मिरा जिस्म
रेशम का सद-चाक ख़ेमा
किसी बे-कराँ दश्त में बे-सहारा खड़ा है
मगर जब मैं आँखें झुकाऊँ
तो उस सर्द खे़
में के अंदर
करोड़ों तड़पते हुए तुंद ज़र्रों का इक दश्त फैला हुआ है
ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत
अजब माजरा है
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दुख के रूप हज़ारों हैं
हवा भी दुख और आग भी दुख है
हवा भी दुख और आग भी दुख है
मैं तेरा तू मेरा दुख है
पर ये मैले और गहरे आकाश का दुख
जो क़तरा क़तरा टपक रहा है
इस दुख का कोई अंत नहीं है
जब आकाश का दिल दुखता है
बच्चे बूढ़े शजर हजर चिड़ियाँ और कीड़े
सब के अंदर दुख उगता है
फिर ये दुख आँखों के रस्ते
गालों पर बहने लगता है
फिर ठोड़ी के पंज-नद पर सब दुखों के धारे आ मिलते हैं
और शबनम सा मुख धरती का
ख़ुद इक धारा बन जाता है
सुना यही है
पहले भी इक बार दुखी आकाश की आँखें टपक पड़ी थीं
पर धरती की आख़िरी नाव
ज़ीस्त के बिखरे टुकड़ों को छाती से लगाए
पानी की सरकश मौजों से लड़ती-भिड़ती
दूर उफ़ुक़ तक जा पहुँची थी
आज मगर वो नाव कौन से देस गई है
दुख मैले आकाश का दुख
अब चारों जानिब उमड पड़ा है
क़तरा क़तरा टपक रहा है
Read Fullपर ये मैले और गहरे आकाश का दुख
जो क़तरा क़तरा टपक रहा है
इस दुख का कोई अंत नहीं है
जब आकाश का दिल दुखता है
बच्चे बूढ़े शजर हजर चिड़ियाँ और कीड़े
सब के अंदर दुख उगता है
फिर ये दुख आँखों के रस्ते
गालों पर बहने लगता है
फिर ठोड़ी के पंज-नद पर सब दुखों के धारे आ मिलते हैं
और शबनम सा मुख धरती का
ख़ुद इक धारा बन जाता है
सुना यही है
पहले भी इक बार दुखी आकाश की आँखें टपक पड़ी थीं
पर धरती की आख़िरी नाव
ज़ीस्त के बिखरे टुकड़ों को छाती से लगाए
पानी की सरकश मौजों से लड़ती-भिड़ती
दूर उफ़ुक़ तक जा पहुँची थी
आज मगर वो नाव कौन से देस गई है
दुख मैले आकाश का दुख
अब चारों जानिब उमड पड़ा है
क़तरा क़तरा टपक रहा है
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लो रात की बात तमाम हुई
अब दिन की बातें करते हैं
अब दिन की बातें करते हैं
सब ख़्वाब तमाशे धूल हुए
और जुगनू तारे दीप सभी
प्रकाश के फैले सागर में
चमकाट दिखाना भूल गए
इक चाँद कि शब भर साथ रहा
वो चाँद भी गिर कर टूट गया
लो रात की बात तमाम हुई
अब दिन की बातें करते हैं
फूलों के सूजे चेहरों पर
शबनम की चिड़ियाँ उतरी थीं
इन चिड़ियों पर हम सूरज के
तीरों का निशाना तकते हैं
अध-मीची अपनी पलकों से
हम गलियों और बाज़ारों में
सोने के रेज़े चुनते हैं
और दाग़ों धब्बों शिकनों से
दीवारें काली करते हैं
फिर उजले काग़ज़ पर लिक्खी
सब गंदी ख़बरें पढ़ते हैं
लो रात की बात तमाम हुई
अब दिन की बातें करते हैं
Read Fullऔर जुगनू तारे दीप सभी
प्रकाश के फैले सागर में
चमकाट दिखाना भूल गए
इक चाँद कि शब भर साथ रहा
वो चाँद भी गिर कर टूट गया
लो रात की बात तमाम हुई
अब दिन की बातें करते हैं
फूलों के सूजे चेहरों पर
शबनम की चिड़ियाँ उतरी थीं
इन चिड़ियों पर हम सूरज के
तीरों का निशाना तकते हैं
अध-मीची अपनी पलकों से
हम गलियों और बाज़ारों में
सोने के रेज़े चुनते हैं
और दाग़ों धब्बों शिकनों से
दीवारें काली करते हैं
फिर उजले काग़ज़ पर लिक्खी
सब गंदी ख़बरें पढ़ते हैं
लो रात की बात तमाम हुई
अब दिन की बातें करते हैं
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जो मज़ा चाहत में है
हासिल में उस को ढूँढ़ना बे-कार है
हासिल में उस को ढूँढ़ना बे-कार है
हो कहाँ तुम किस जहाँ में
क्यूँ मुझे मालूम हो?
धुँद में हो ख़्वाब में
या आसमाँ की क़ौस में
या मौज की गर्दिश में हो
तुम हाथ की रेखा के अंदर हो कहीं
या दूर सन्नाटों के टकराव से पैदा
अन-सुनी आवाज़ की रेज़िश में हो
चाहे कहीं भी हो
मिरी चाहत के फैले बाज़ुओं के
हल्क़ा-ए-मौहूम में मौजूद हो!
लम्स में हिद्दत बहुत है
और सितारों की चुभन का भी मुझे एहसास है
बंद मुट्ठी में दबे मोती
की लज़्ज़त से भी हूँ मैं आश्ना
पर बयाँ कैसे करूँ
वो लुत्फ़ जो चाहत की फैली बॉस की
मदहोश-कुन ठंडक में है
चाहत के हर दम
फैलते आफ़ाक़ की लर्ज़िश में है!!
Read Fullक्यूँ मुझे मालूम हो?
धुँद में हो ख़्वाब में
या आसमाँ की क़ौस में
या मौज की गर्दिश में हो
तुम हाथ की रेखा के अंदर हो कहीं
या दूर सन्नाटों के टकराव से पैदा
अन-सुनी आवाज़ की रेज़िश में हो
चाहे कहीं भी हो
मिरी चाहत के फैले बाज़ुओं के
हल्क़ा-ए-मौहूम में मौजूद हो!
लम्स में हिद्दत बहुत है
और सितारों की चुभन का भी मुझे एहसास है
बंद मुट्ठी में दबे मोती
की लज़्ज़त से भी हूँ मैं आश्ना
पर बयाँ कैसे करूँ
वो लुत्फ़ जो चाहत की फैली बॉस की
मदहोश-कुन ठंडक में है
चाहत के हर दम
फैलते आफ़ाक़ की लर्ज़िश में है!!
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