Wazir Agha

Top 10 of Wazir Agha

    एक पत्ता गिरा
    तू ने आँसू भरी तुंद गाली से जिस का स्वागत किया
    एक पत्ता गिरा

    ख़ुश्क होंटों पर अपनी ज़बाँ फेर कर
    तू ने इक बार फिर अपनी बंजर हथेली को आगे किया
    एक पत्ता गिरा

    लाल सूरज
    जो दिन फिर पके सेब के रूप में
    तेरे सर पर लटकती हुई
    बाँझ शाख़ों के झूले से चिपका रहा
    अब कहाँ है
    वो रंगों का तूफ़ाँ
    तुझे जिस की ख़ातिर हथेली की बंजर ज़मीं को सजाना पड़ा
    अब कहाँ है
    लरज़ता हुआ लाल सूरज तो काले समुंदर की झोली में गिर भी चुका
    लो वो पत्ता गिरा
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    तब वो बे-साख़्ता रो पड़े सीना-कूबी करे
    जाने वाले का मातम करे
    बैन करते फिरे
    आख़िरी पात के सोग में
    तिलमिलाती रहे
    ज़ात के रोग में

    फिर वो रुत आए जब
    चिकनी काई-ज़दा सी चट्टानों पे देखूँ मैं ख़ुद को
    मैं आँखों के पानी को रोकूँ मगर पानी कैसे रुके
    तब मैं चीख़ूँ बुलाऊँ उसे
    गहरे नीले समुंदर की तह में वो होगी कहीं कौन जाने
    मगर वो बुलावे को सुन कर समुंदर की तह से उभर कर
    मिरे पास आए मुझे छू के देखे
    कहे तुम कहाँ थे
    ख़ुदारा बताओ कि तुम इतना अर्सा कहाँ थे
    मुझे ख़ुद से लिपटाए महकी हुई गोद में ले के झूला झुलाए
    कोई गीत गाए जो सय्याल चाँदी का चश्मा सा बन कर बहे
    धुँद बन कर उड़े
    मुझ को सूरज की गंदी तमाज़त से महफ़ूज़ कर दे
    कहे अब तो जाने न दूँगी तुम्हें
    अब मैं जाने न दूँगी तुम्हें

    और मैं
    अपने बोझल पपोटों को मीचे
    किसी नर्म झोंके के क़दमों की आहट सुनूँ
    तंग होते हुए दूधिया बाज़ुओं के
    मुलाएम से हल्क़े में सोने लगूँ
    काश सोने लगूँ
    काश मैं सो सकूँ
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    Wazir Agha
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    इक अलबेली पगडंडी है
    उफ़्तां ख़ेज़ाँ गिरती पड़ती नदी किनारे उतरी है

    नदी किनारे बाहें खोले इक अलबेला पेड़ खड़ा है
    पेड़ ने रस्ता रोक लिया है
    पगडंडी हैरान खड़ी है
    जिस्म चुराए आँख झुकाए
    दाएँ बाएँ देख रही है

    जाने कब से बाहें खोले रस्ता रोके पेड़ खड़ा है
    जाने कब से
    जिस्म चुराए आँख झुकाए पगडंडी हैरान खड़ी है
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    Wazir Agha
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    इक पीपल के नीचे मैं ने अपनी खाट बिछाई
    लेट गया मैं खाट पे लेकिन नींद न मुझ को आई
    आहें भरते करवटें लेते सारी उम्र गँवाई

    पीपल के पत्तों को गिनते करते उन पर ग़ौर
    पीपल की शाख़ों को तकते बीत गया इक दौर
    पीपल की हर चीज़ पुरानी अलबेला हर तौर

    चले हवा तो डाली डाली लचक लचक बल खाए
    रुके हवा तो साधू बन कर ध्यान का दीप जलाए
    झक्कड़ के हर वार पे डोले चीख़ चीख़ रह जाए

    पीपल की शाख़ों पर बैठे कुछ पंछी सुस्ताएँ
    बाहरस कुछ आने वाले इक कोहराम मचाएँ
    गाएँ गीत अनोखे मिल कर नाचें और नचाएँ

    पीपल क्या है जोगी का बे-दरसा इक स्थान
    झोंके पत्ते पंछी इंसाँ सब इस के मेहमान
    खाट पे लिपटा सोच रहा हूँ मैं मूरख नादान
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    Wazir Agha
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    तेज़ तलवार की धार ऐसी सदा
    क़तरा क़तरा मिरे ख़ून में
    पिघले से के मानिंद गिरती रही
    मेरी रग रग में घुल कर बिखरती रही
    और फिरे हुए तुंद ज़र्रों की सूरत
    मिरे जिस्म में दौड़ती झनझनाती फिरी

    सुब्ह होने को है
    कोई दम में ये ज़ख़्मों भरी रात की गर्म चादर
    उजाले के साबुन में धुल कर निखर आएगी
    हर तरफ़ नर्म-ओ-नाज़ुक सी ख़ुशियों के छींटे
    किवाड़ों को छेड़ेंगे सुलाएँगे
    फूल खिल जाएँगे
    क़हक़हों चहचहों की ज्वाला
    स्याही के धब्बों को खा जाएगी
    सोचता हूँ
    ये इक तेज़ सी धार ऐसी चमकती सदा
    जिस की किर्चें मिरी एक इक रग में
    पंजों को गाड़े खड़ी हैं
    कहाँ जाएगी
    इतनी सदियों के बन-बास को झेल कर
    अपने घर आई नारी से अब किस तरह मैं कहूँ
    जाओ
    ये घर तो ख़ुशियों की रानी का घर है
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    Wazir Agha
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    कभी ख़ुश्क मौसम में पुर्वा जो चलती
    तो बंजर पहाड़ों घने गर्द-आलूद शहरों से कतरा के
    हम तक पहुँचती
    हमें तुंद यादों के गिर्दाब मैं
    डूबते और उभरते हुए देख कर हम से कहती
    मैं उन सब के जिस्मों से मस हो के आई हूँ
    उन के पसीने की ख़ुश्बू को
    अपने लिबादे में भर कर
    हथेली पे रख कर मैं लाई हूँ
    कभी सुर्ख़ सूरज निकलता
    तो हम उस से कहते
    तुम्हारी दहकती हुई आँख का राज़ क्या है
    वो कहता
    मैं इन सब की आँखों के ग़ुर्फों से
    ये सारी उजली तमाज़त चुराता रहा हूँ
    मैं दरयूज़ा-गर उन चराग़ों से ख़ुद को जलाता रहा हूँ
    उन्हें हम ने ढूँडा
    कभी सब्ज़ शबनम के छींटों में तारों की रोती हुई अंजुमन मैं
    कभी सुब्ह की क़त्ल-गाह शब के घाइल बदन में
    उन्हें हम ने आवाज़ दी कू-ब-कू
    ग़म में डूबी हुई बस्तियों से अटे ख़ाक-दान-ए-वतन में
    मगर वो नहीं थे कहीं भी नहीं थे
    कहीं उन के क़दमों की हल्की सी आवाज़ तक भी नहीं थी
    फिर इक रोज़ धरती का मौसम जो बदला
    तो बादल ने शानों से हम को हिला कर जगाया
    कहा उन के आने का पैग़ाम आया
    चहकते परिंदों ने शाख़ों से उड़ कर
    हवाओं में इक दायरा सा बनाया
    कहा उन के आने का पैग़ाम आया
    धनक सात रंगों में लिपटी हुई
    इक कमाँ बन के ज़ाहिर हुई
    हम से कहने लगी अपनी आँखों से देखा है मैं ने उन्हें
    तेज़ क़दमों से आते हुए
    शाम हँसने लगी
    उस की आँखों में ख़ुशियों के आँसू थे
    आरिज़ पे शबनम
    नगीनों की सूरत चमकने लगी थी
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    समुंदर अगर मेरे अंदर आ गिरे
    तू पायाब लहरों में ढल के सुलगने लगे
    प्यास के बे-निशाँ दश्त में
    व्हेल मछली की सूरत तड़पने लगे
    हारपूनों से नेज़ों से छलनी बदन पर
    दहकती हुई रेत के तेज़ चर के सहे
    और फिर रेत पर झाग के कुछ निशाँ छोड़ कर
    ता-अबद सर-बुरीदास साहिल के साए में
    होने न होने की मीठी अज़िय्यत में खोया रहे
    ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत भी क्या है
    निगाहें उठाऊँ तो हद्द-ए-नज़र तक
    अज़ल और अबद के सुतूनों पे बारीक सा एक ख़ेमा तना है
    न होने का ये रूप कितना नया है
    और खे़
    में के अंदर
    करोड़ों सितारों का मेला लगा है
    ये होने का बहरूप ला-इंतिहा है
    मिरा जिस्म
    रेशम का सद-चाक ख़ेमा
    किसी बे-कराँ दश्त में बे-सहारा खड़ा है
    मगर जब मैं आँखें झुकाऊँ
    तो उस सर्द खे़
    में के अंदर
    करोड़ों तड़पते हुए तुंद ज़र्रों का इक दश्त फैला हुआ है
    ये होने न होने की मीठी अज़िय्यत
    अजब माजरा है
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    Wazir Agha
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    दुख के रूप हज़ारों हैं
    हवा भी दुख और आग भी दुख है
    मैं तेरा तू मेरा दुख है
    पर ये मैले और गहरे आकाश का दुख
    जो क़तरा क़तरा टपक रहा है
    इस दुख का कोई अंत नहीं है

    जब आकाश का दिल दुखता है
    बच्चे बूढ़े शजर हजर चिड़ियाँ और कीड़े
    सब के अंदर दुख उगता है
    फिर ये दुख आँखों के रस्ते
    गालों पर बहने लगता है
    फिर ठोड़ी के पंज-नद पर सब दुखों के धारे आ मिलते हैं
    और शबनम सा मुख धरती का
    ख़ुद इक धारा बन जाता है

    सुना यही है
    पहले भी इक बार दुखी आकाश की आँखें टपक पड़ी थीं
    पर धरती की आख़िरी नाव
    ज़ीस्त के बिखरे टुकड़ों को छाती से लगाए
    पानी की सरकश मौजों से लड़ती-भिड़ती
    दूर उफ़ुक़ तक जा पहुँची थी

    आज मगर वो नाव कौन से देस गई है
    दुख मैले आकाश का दुख
    अब चारों जानिब उमड पड़ा है
    क़तरा क़तरा टपक रहा है
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    लो रात की बात तमाम हुई
    अब दिन की बातें करते हैं
    सब ख़्वाब तमाशे धूल हुए
    और जुगनू तारे दीप सभी
    प्रकाश के फैले सागर में
    चमकाट दिखाना भूल गए
    इक चाँद कि शब भर साथ रहा
    वो चाँद भी गिर कर टूट गया
    लो रात की बात तमाम हुई
    अब दिन की बातें करते हैं
    फूलों के सूजे चेहरों पर
    शबनम की चिड़ियाँ उतरी थीं
    इन चिड़ियों पर हम सूरज के
    तीरों का निशाना तकते हैं
    अध-मीची अपनी पलकों से
    हम गलियों और बाज़ारों में
    सोने के रेज़े चुनते हैं
    और दाग़ों धब्बों शिकनों से
    दीवारें काली करते हैं
    फिर उजले काग़ज़ पर लिक्खी
    सब गंदी ख़बरें पढ़ते हैं
    लो रात की बात तमाम हुई
    अब दिन की बातें करते हैं
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    Wazir Agha
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    जो मज़ा चाहत में है
    हासिल में उस को ढूँढ़ना बे-कार है
    हो कहाँ तुम किस जहाँ में
    क्यूँ मुझे मालूम हो?
    धुँद में हो ख़्वाब में
    या आसमाँ की क़ौस में
    या मौज की गर्दिश में हो
    तुम हाथ की रेखा के अंदर हो कहीं
    या दूर सन्नाटों के टकराव से पैदा
    अन-सुनी आवाज़ की रेज़िश में हो
    चाहे कहीं भी हो
    मिरी चाहत के फैले बाज़ुओं के
    हल्क़ा-ए-मौहूम में मौजूद हो!
    लम्स में हिद्दत बहुत है
    और सितारों की चुभन का भी मुझे एहसास है
    बंद मुट्ठी में दबे मोती
    की लज़्ज़त से भी हूँ मैं आश्ना
    पर बयाँ कैसे करूँ
    वो लुत्फ़ जो चाहत की फैली बॉस की
    मदहोश-कुन ठंडक में है
    चाहत के हर दम
    फैलते आफ़ाक़ की लर्ज़िश में है!!
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    Wazir Agha
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