मैं जानता हूँ कि उस की ख़बर न आएगी
तनाज़ुर उस का मगर हर ख़बर से निकलेगा
सभी असीर हुए अपनी अपनी सुब्हों के
वो कोई होगा जो क़ैद-ए-सहरस निकलेगा
किसी को अपने सिवा कुछ नज़र नहीं आता
जो दीदा-वर है तिलिस्म-ए-नज़र से निकलेगा
जलाल-ए-हुस्न दिखा मेरे माहताब-ए-जमाल
तू रौशनी है शबों के असर से निकलेगा
शबों को जागते हो जिस के ख़्वाब में 'अकबर'
वो शाहकार कमाल-ए-हुनर से निकलेगा
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मुझे लिक्खो वहाँ क्या हो रहा है
यहाँ तो फिर तमाशा हो रहा है
यहाँ तो फिर तमाशा हो रहा है
हवा के दोश पर है आशियाना
परिंदा तिनका तिनका हो रहा है
अभी परवाज़ की फ़ुर्सत है किस को
अभी तो दाना-दुन्का हो रहा है
कोई नादीदा उँगली उठ रही है
मिरी जानिब इशारा हो रहा है
वो अपने हाथ सीधे कर रहे हैं
हमारा शहर उल्टा हो रहा है
न जाने किस तरफ़ से लिक्खा जाए
चमन दीवार-ए-फ़र्दा हो रहा है
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कई आवाज़ों की आवाज़ हूँ मैं
ग़ज़ल के वास्ते एज़ाज़ हूँ मैं
ग़ज़ल के वास्ते एज़ाज़ हूँ मैं
कई हर्फ़ों से मिल कर बन रहा हूँ
बजाए लफ़्ज़ के अल्फ़ाज़ हूँ मैं
मिरी आवाज़ में सूरत है मेरी
कि अपने साज़ की आवाज़ हूँ मैं
बहुत फ़ितरी था तेरा हर्फ़-ए-इंकार
तिरा ग़म-ख़्वार हूँ दम-साज़ हूँ मैं
कहीं तो हर्फ़-ए-आख़िर हूँ मैं 'अकबर'
किसी का नुक़्ता-ए-आग़ाज़ हूँ मैं
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ऐसा भी सिदक़-ओ-सफ़ा का नहीं दावा हम को
ज़िंदगी शैख़ की दस्तार नहीं है भाई
पाक-बाज़ों की ये बस्ती है फ़रिश्तों का नगर
कोई इस शहर में मय-ख़्वार नहीं है भाई
इश्क़ करना है तो छुट्टी नहीं करनी कोई इश्क़ में एक भी इतवार नहीं है भाई
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नाम 'अकबर' तो मिरा माँ की दुआ ने रक्खा
हाँ भरम उस का मगर मेरे ख़ुदा ने रक्खा
हाँ भरम उस का मगर मेरे ख़ुदा ने रक्खा
वो भी दिन था कि तिरे आने का पैग़ाम आया
तब मिरे घर में क़दम बाद-ए-सबा ने रक्खा
किस तरह लोगों ने माँगीं थीं दुआएँ उस की
कुछ लिहाज़ इस का न बे-मेहर हवा ने रक्खा
ऐसे हालात में इक रोज़ न जी सकते थे
हम को ज़िंदा तिरे पैमान-ए-वफ़ा ने रक्खा
इत्तिफ़ाक़ात के पीछे भी हैं अस्बाब-ओ-इलल
इक न इक अपना सबब दस्त-ए-क़ज़ा ने रक्खा
जिस ने रक्खा तिरी मिटती हुई क़द्रों का लिहाज़
कुछ ख़याल इस का नहीं तू ने ज़माने रक्खा
सिर्फ़ 'अकबर' ही नहीं देख के तस्वीर हुआ
सब को हैराँ तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा ने रक्खा
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भटक रहा है अकेला जो कोह-ओ-सहरा में
उस एक आदमी को कारवाँ बनाना है
ये शाख़-ए-गुल जो घिरी है हज़ार काँटों में
मुझे इसी से नया गुलिस्ताँ बनाना है
मैं जानता हूँ मुझे क्या बनाना है लेकिन
वहाँ बनाने से पहले यहाँ बनाना है
चराग़ ले के उसे शहर शहर ढूँढ़ता हूँ
बस एक शख़्स मुझे राज़-दाँ बनाना है
हमें भी उम्र-गुज़ारी तो करनी है 'अकबर'
उन्हें भी मश्ग़ला-ए-दिल-बराँ बनाना है
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दिलों को तोड़ न डाले तुम्हारी हक़-गोई
बजाए हर्फ़ के आईना रू-ब-रू रखना
जो वक़्त अहल-ए-वफ़ा से कभी लहू माँगे
तो सब से पहले लब-ए-तेग़ पर गुलू रखना
ख़िज़ाँ से हार न जाना किसी भी हालत में
नुमू मिले न मिले ख़्वाहिश-ए-नुमू रखना
बुरा न कहना ज़माने को हम ज़माना हैं
हमारे ब'अद ज़माने से गुफ़्तुगू रखना
फ़क़ीह-ए-शहर के फ़तवे की हैसियत क्या है
तो ख़ुद को अपनी निगाहों में सुर्ख़-रू रखना
विसाल-ए-दोस्त की साअत भी आने वाली है
सहर क़रीब है 'अकबर' अभी वज़ू रखना
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गई गुज़री कहानी लग रही है
मुझे हर शय पुरानी लग रही है
मुझे हर शय पुरानी लग रही है
वो कहता है कि फ़ानी है ये दुनिया
मुझे तो जावेदानी लग रही है
ये ज़िक्र-ए-आसमाँ कैसा कि मुझ को
ज़मीं भी आसमानी लग रही है
वो इस हुस्न-ए-तवज्जोह से मिले हैं
ये दुनिया पुर-मआनी लग रही है
ग़ज़ल दुनिया में रहता हूँ मैं 'अकबर'
ये मेरी राजधानी लग रही है
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कुछ इश्क़-ओ-आशिक़ी पे नहीं मेरा ए'तिक़ाद
मैं जिस को चाहता था हसीं इंतिहा का था
जल कर गिरा हूँ सूखे शजर से उड़ा नहीं
मैं ने वही किया जो तक़ाज़ा वफ़ा का था
तारीक रात मौसम-ए-बरसात जान-ए-ज़ार
गिर्दाब पीछे सामने तूफ़ाँ हवा का था
इक उम्र बा'द भी न शिफ़ा हो सके तो क्या
रग रग में ज़हर सदियों की आब-ओ-हवा का था
गो राहज़न का वार भी कुछ कम न था मगर
जो वार कार-गर हुआ वो रहनुमा का था
'अकबर' जहाँ में कार-कुशाई बुतों की थी
अच्छा रहा जो मानने वाला ख़ुदा का था
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