वो सब्ज़ चादर-ए-गुल-ताब
आरिज़-ए-महताब
ख़ुमार-ए-ख़्वाब का आलम
वो इंतिज़ार का आलम
कि दूर देस से जैसे
कभी तो आएगा
वो दूर देस से सूरज का देवता आया
और अपनी तेज़ निगाहों से गुदगुदी करता
वो जौफ़-उल-अर्ज़ के निस्फ़ुन्नहार पर पहुँचा
ज़मीं पे ख़ौफ़ की इक ज़र्द लहर सी फैली
मगर वो सब्ज़ सा जादू कुँवारी दुल्हन का
फ़ज़ा पे छा ही गया इक ख़ुमार का आलम
उतर गया हरे शीशे में देवता आख़िर
वो शाम लम्स धुँदलका
लबों का रंग लबों में घुला
हसीन था मंज़र
लज़ीज़ था लम्हा
हवा की अँगड़ाई
और उस के बा'द भयानक हवा के ज़न्नाटे
Read Fullआरिज़-ए-महताब
ख़ुमार-ए-ख़्वाब का आलम
वो इंतिज़ार का आलम
कि दूर देस से जैसे
कभी तो आएगा
वो दूर देस से सूरज का देवता आया
और अपनी तेज़ निगाहों से गुदगुदी करता
वो जौफ़-उल-अर्ज़ के निस्फ़ुन्नहार पर पहुँचा
ज़मीं पे ख़ौफ़ की इक ज़र्द लहर सी फैली
मगर वो सब्ज़ सा जादू कुँवारी दुल्हन का
फ़ज़ा पे छा ही गया इक ख़ुमार का आलम
उतर गया हरे शीशे में देवता आख़िर
वो शाम लम्स धुँदलका
लबों का रंग लबों में घुला
हसीन था मंज़र
लज़ीज़ था लम्हा
हवा की अँगड़ाई
और उस के बा'द भयानक हवा के ज़न्नाटे
10
0 Likes
9
0 Likes
तेरी तुर्बत
तेरी आवाज़ों का गुम्बद
तेरी आवाज़ों का गुम्बद
एक वज़ीफ़ा
जिस से गुम्बद का पोशीदा दर खुल जाता
भूल गया था
उस की ख़ातिर जाने कितने वीराने और कितने बसेरे मैं ने छाने
पर वो मुक़द्दस पाँव की मिट्टी न मिल सकी
जिस को इस मूरत पर मलता
तो तेरी ही आवाज़ निकलती
तेरी चाँद सी आवाज़ों पर
पत्थर जैसा बादल
बरस बरस कर घुल जाता
तो चाँदनी मेरे भीतर की भसमाने वाली आग बुझाती
मेरा जिस्म भी
तेरी आवाज़ों का मरक़द
अंदर इक तूफ़ान था
आवाज़ों के शो'ले चटख़ रहे थे
बाहर
हूँ का आलम
तेरी आवाज़ों में रंग थे
मीठे ठंडे और रसीले
मेरी आवाज़ों में चीख़ें
तेरी आवाज़ों के रंग मैं जंगल जंगल ढूँड रहा था
आँख उठा कर देखा
तो तेरी ही आवाज़ों के रंग हैं
जो आकाश पे बिखरे पड़े हैं
Read Fullजिस से गुम्बद का पोशीदा दर खुल जाता
भूल गया था
उस की ख़ातिर जाने कितने वीराने और कितने बसेरे मैं ने छाने
पर वो मुक़द्दस पाँव की मिट्टी न मिल सकी
जिस को इस मूरत पर मलता
तो तेरी ही आवाज़ निकलती
तेरी चाँद सी आवाज़ों पर
पत्थर जैसा बादल
बरस बरस कर घुल जाता
तो चाँदनी मेरे भीतर की भसमाने वाली आग बुझाती
मेरा जिस्म भी
तेरी आवाज़ों का मरक़द
अंदर इक तूफ़ान था
आवाज़ों के शो'ले चटख़ रहे थे
बाहर
हूँ का आलम
तेरी आवाज़ों में रंग थे
मीठे ठंडे और रसीले
मेरी आवाज़ों में चीख़ें
तेरी आवाज़ों के रंग मैं जंगल जंगल ढूँड रहा था
आँख उठा कर देखा
तो तेरी ही आवाज़ों के रंग हैं
जो आकाश पे बिखरे पड़े हैं
8
0 Likes
तो दरिया बन कर उस का सीना चीर के गुज़रा
सहराओं की तुंद हवाओं में लाला बन कर जलता रहा
धरती की आग़ोश मिली
तो पौदा बन कर फूटा
जब आकाश से नज़रें मिलीं
तो ताइर बन के उड़ा
ग़ारों के अँधियारों में मैं चाँद बना
और आकाश पे सूरज बन कर चमका
फिर भी मैं दीवाना रहा
अपने सपनों ख़्वाबों की उल्टी सीधी तस्वीर बनाई
टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचीं
लेकिन जब इक हर्फ़ मिला
गोया नूर की किरनें मेरे दो होंटों में सिमट आई हैं
मैं ये चराग़-ए-अला-दीं ले कर
ग़ारों के अँधियारों में खोए हुए मोती ढूँड रहा हूँ
Read Fullसहराओं की तुंद हवाओं में लाला बन कर जलता रहा
धरती की आग़ोश मिली
तो पौदा बन कर फूटा
जब आकाश से नज़रें मिलीं
तो ताइर बन के उड़ा
ग़ारों के अँधियारों में मैं चाँद बना
और आकाश पे सूरज बन कर चमका
फिर भी मैं दीवाना रहा
अपने सपनों ख़्वाबों की उल्टी सीधी तस्वीर बनाई
टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचीं
लेकिन जब इक हर्फ़ मिला
गोया नूर की किरनें मेरे दो होंटों में सिमट आई हैं
मैं ये चराग़-ए-अला-दीं ले कर
ग़ारों के अँधियारों में खोए हुए मोती ढूँड रहा हूँ
7
0 Likes
उस की गुज़रगाहों से रिवायतों और हिकायतों के हज़ार-हा क़ाफ़िले निकल कर
नए ज़माने की यूरिशों से मिरी बिखरती अना में
उल्फ़त यक़ीन और ए'तिमाद के रंग भर गए हैं
वो एक पुल आज टूट कर गहरी घाटियों में गिरा है
अब मैं खड़ा हूँ
उन गहरी घाटियों पर
मैं एक पुल हूँ
वो एक बरगद था
जिस की छाँव में एक ठंडी मिठास थी
जिस ने जलते सूरज की हिद्दतें अपने जिस्म में जज़्ब कर के
उस की सुनहरी किरनों को ठंडी शबनम की तरह
मेरी उजाड़ आँखों में क़तरा क़तरा उतारा
वो आज हिद्दतों के वफ़ूर से जल गया
तो अब मैं ही एक बरगद हूँ
आने वालों के वास्ते एक ठंडी छाँव
वो एक जव्वाला था
वो भरपूर ज़ीस्त करने की एक सीमाबी आरज़ू
वो लहू की धड़कन
जो रात की ज़ुल्मतों पे शब-ख़ून मार कर
रौशनी और उम्मीद के दरीचों को खोलता
आज शब का सफ़्फ़ाक हाथ
उस के लहू की धड़कन को ले उड़ा
और अब फ़क़त मैं हूँ
रात की ज़ुल्मतों से पंजा-फ़गन
Read Fullनए ज़माने की यूरिशों से मिरी बिखरती अना में
उल्फ़त यक़ीन और ए'तिमाद के रंग भर गए हैं
वो एक पुल आज टूट कर गहरी घाटियों में गिरा है
अब मैं खड़ा हूँ
उन गहरी घाटियों पर
मैं एक पुल हूँ
वो एक बरगद था
जिस की छाँव में एक ठंडी मिठास थी
जिस ने जलते सूरज की हिद्दतें अपने जिस्म में जज़्ब कर के
उस की सुनहरी किरनों को ठंडी शबनम की तरह
मेरी उजाड़ आँखों में क़तरा क़तरा उतारा
वो आज हिद्दतों के वफ़ूर से जल गया
तो अब मैं ही एक बरगद हूँ
आने वालों के वास्ते एक ठंडी छाँव
वो एक जव्वाला था
वो भरपूर ज़ीस्त करने की एक सीमाबी आरज़ू
वो लहू की धड़कन
जो रात की ज़ुल्मतों पे शब-ख़ून मार कर
रौशनी और उम्मीद के दरीचों को खोलता
आज शब का सफ़्फ़ाक हाथ
उस के लहू की धड़कन को ले उड़ा
और अब फ़क़त मैं हूँ
रात की ज़ुल्मतों से पंजा-फ़गन
6
0 Likes
पानी पानी
हर सू पानी
हर सू पानी
पानी बे-हैअत बे-सूरत
साग़र में साग़र बन जाए
फूलों पर ये शबनम
आँखों में ये आँसू
उड़ जाए तो बादल
बह जाए तो दरिया
फैले तो इक सागर
पानी बे-हैअत बे-सूरत
पानी
देवताओं का एक मुक़द्दस रस है
ज़ीस्त का बहता धारा
चाँदी की कश्ती का झूला
मैं भी पानी
नद्दी बन कर बहता जाऊँ
सख़्त चटानों का दिल चीरूँ
धरती के हाथों पर रेखा खींचूँ
Read Fullसाग़र में साग़र बन जाए
फूलों पर ये शबनम
आँखों में ये आँसू
उड़ जाए तो बादल
बह जाए तो दरिया
फैले तो इक सागर
पानी बे-हैअत बे-सूरत
पानी
देवताओं का एक मुक़द्दस रस है
ज़ीस्त का बहता धारा
चाँदी की कश्ती का झूला
मैं भी पानी
नद्दी बन कर बहता जाऊँ
सख़्त चटानों का दिल चीरूँ
धरती के हाथों पर रेखा खींचूँ
5
0 Likes
ये चटियल सर
ज़मीं
ज़मीं
तुम को मिली
तो तुम ने बे-बर्ग-ओ-गयाह टीले पर
इक मा'बद बना डाला
और उस में एक बुत रक्खा
जिसे तुम ने तराशा
आदमी के उस्तुख़्वाँ से
जिस के चरनों में चढ़ावा लाए तुम
तो अपने भाई का
और उस के होंट अब तक ख़ून की लाली से रंगीं हैं
ज़बाँ अब तक लहू के ज़ाइक़े से तर है
लाओ और नज़राना
कि ये मा'बद है
मैं बुत हूँ
मिरे ही तुम पुजारी हो
ये चटियल सर
ज़मीं
मुझ को मिली
तो मैं ने भूरी चरचराती ख़ुश्क मिट्टी को पसीने की नमी बख़्शी
मिरे ख़ूँ की हरारत ने ज़मीं के संग-ए-यख़-बस्ता को पिघलाया
ज़मीं की छातियों से ज़ीस्त के सोते बहे
रंगों के चश्में हर तरफ़ फूटे
ये धरती सब्ज़ चादर ओढ़ कर दुल्हन बनी निकली
और इस चादर में मैं ने नूर के धागे पिरो डाले
ये इक तुम हो
कि मेरे ख़ून से मा'बद बनाते हो
ये इक मैं हूँ
कि अपने नूर से धरती के मंदिर को सजाता हूँ
Read Fullतो तुम ने बे-बर्ग-ओ-गयाह टीले पर
इक मा'बद बना डाला
और उस में एक बुत रक्खा
जिसे तुम ने तराशा
आदमी के उस्तुख़्वाँ से
जिस के चरनों में चढ़ावा लाए तुम
तो अपने भाई का
और उस के होंट अब तक ख़ून की लाली से रंगीं हैं
ज़बाँ अब तक लहू के ज़ाइक़े से तर है
लाओ और नज़राना
कि ये मा'बद है
मैं बुत हूँ
मिरे ही तुम पुजारी हो
ये चटियल सर
ज़मीं
मुझ को मिली
तो मैं ने भूरी चरचराती ख़ुश्क मिट्टी को पसीने की नमी बख़्शी
मिरे ख़ूँ की हरारत ने ज़मीं के संग-ए-यख़-बस्ता को पिघलाया
ज़मीं की छातियों से ज़ीस्त के सोते बहे
रंगों के चश्में हर तरफ़ फूटे
ये धरती सब्ज़ चादर ओढ़ कर दुल्हन बनी निकली
और इस चादर में मैं ने नूर के धागे पिरो डाले
ये इक तुम हो
कि मेरे ख़ून से मा'बद बनाते हो
ये इक मैं हूँ
कि अपने नूर से धरती के मंदिर को सजाता हूँ
4
0 Likes
मैं ने वक़्त-ए-सुब्ह चिड़ियों की सुरीली चहचहाहट को सुना है
और मेरे ज़ेहन के सागर में नग़्में बुलबुले बन कर उठे हैं
तेरे कड़वे बोल से हर-सू हैं आवाज़ों के लाशे
और मैं चुप हूँ
मैं ने वो मासूम प्यारे गुल-बदन देखे हैं
जिन के मरमरीं जिस्मों में पाकीज़ा मोहब्बत के नशेमन हैं
तिरे इन खुरदुरे हाथों ने ये सारे नशेमन नोच डाले
और मैं चुप हूँ
मैं ने देखे हैं वो चेहरे चाँद जैसे ग़ुंचा-सूरत
जिन की आँखें आइना हैं आने वाले मौसमों का
तू ने उन आँखों में भी काँटे चुभोए
और मैं चुप हूँ
बा-कमाल ओ बा-सफ़ा वो लोग भी देखे हैं मैं ने
जिन के होंटों से खिले हैं सिद्क़ ओ दानाई के फूल
तू ने उन होंटों को घोला ज़हर में
और मैं चुप हूँ
Read Fullऔर मेरे ज़ेहन के सागर में नग़्में बुलबुले बन कर उठे हैं
तेरे कड़वे बोल से हर-सू हैं आवाज़ों के लाशे
और मैं चुप हूँ
मैं ने वो मासूम प्यारे गुल-बदन देखे हैं
जिन के मरमरीं जिस्मों में पाकीज़ा मोहब्बत के नशेमन हैं
तिरे इन खुरदुरे हाथों ने ये सारे नशेमन नोच डाले
और मैं चुप हूँ
मैं ने देखे हैं वो चेहरे चाँद जैसे ग़ुंचा-सूरत
जिन की आँखें आइना हैं आने वाले मौसमों का
तू ने उन आँखों में भी काँटे चुभोए
और मैं चुप हूँ
बा-कमाल ओ बा-सफ़ा वो लोग भी देखे हैं मैं ने
जिन के होंटों से खिले हैं सिद्क़ ओ दानाई के फूल
तू ने उन होंटों को घोला ज़हर में
और मैं चुप हूँ
3
0 Likes
चोटियों पर बर्फ़ की इक लाश
सारे पेड़ नंगे टुड-मुंड
सहन में वो चरमराते भूरे पत्तों का कफ़न
एक सन्नाटा
वो इक टहनी तड़ख़ कर गिर पड़ी
इक साँस टूटा
(२)
मैं ने कल ही अपने बूढे बाप के ठंडे बदन को
ग़ुस्ल दे के अपने हाथों
काली धरती के दहाने में उतारा
कि यही है रस्म
मैं ज़िंदा भी पामाल-ए-रुसूम
ज़िंदगी में वो चटकती रौशनी का एक मीनार-ए-बुलंद
उस की किरनों ने हज़ारों क़ुमक़ु
में रौशन किए
और ये रस्म-ए-ज़माना
उम्र-भर जो दूसरों को रौशनी देता रहा
इक अँधेरी क़ब्र इस के वास्ते
(३)
आने वाले मौसमों में सैंकड़ों ही टहनियाँ फूटेंगी
लेकिन जिस जगह उस पेड़ से ये शाख़ टूटी
वो निशाँ इक दायरा बन कर रहेगा
मैं ने जिन हाथों से अपने बाप के ठंडे बदन को
काली धरती के दहाने में उतारा
उस की पोरों से वो बूढ़ी धड़कनें क़िर्तास पर बहती रहेंगी
Read Fullसारे पेड़ नंगे टुड-मुंड
सहन में वो चरमराते भूरे पत्तों का कफ़न
एक सन्नाटा
वो इक टहनी तड़ख़ कर गिर पड़ी
इक साँस टूटा
(२)
मैं ने कल ही अपने बूढे बाप के ठंडे बदन को
ग़ुस्ल दे के अपने हाथों
काली धरती के दहाने में उतारा
कि यही है रस्म
मैं ज़िंदा भी पामाल-ए-रुसूम
ज़िंदगी में वो चटकती रौशनी का एक मीनार-ए-बुलंद
उस की किरनों ने हज़ारों क़ुमक़ु
में रौशन किए
और ये रस्म-ए-ज़माना
उम्र-भर जो दूसरों को रौशनी देता रहा
इक अँधेरी क़ब्र इस के वास्ते
(३)
आने वाले मौसमों में सैंकड़ों ही टहनियाँ फूटेंगी
लेकिन जिस जगह उस पेड़ से ये शाख़ टूटी
वो निशाँ इक दायरा बन कर रहेगा
मैं ने जिन हाथों से अपने बाप के ठंडे बदन को
काली धरती के दहाने में उतारा
उस की पोरों से वो बूढ़ी धड़कनें क़िर्तास पर बहती रहेंगी
2
0 Likes
वो तीरगी भी अजीब थी
चाँदनी की ठंडी गुदाज़ चादर से सारा जंगल लिपट रहा था
चाँदनी की ठंडी गुदाज़ चादर से सारा जंगल लिपट रहा था
गुलों के सद-रंग
धुँदले धुँदले से
जैसे इक सीम-तन के चेहरे के शोख़ ग़ाज़े पे
आँसुओं का ग़ुबार हो
पेड़, मुंतज़िर
अपनी नर्म शाख़ों के हाथ फैलाए
और कभी कोई शाख़ चटकी
तो साए निकले
मुलूक फूलों को चूम कर
चाँदनी की चादर पे नाचते थे
कहाँ से आई
वो इक किरन
जिस ने फैलती तीरगी की गँभीरता को चीरा
तो मेरे भीतर में एक किरनों का सिलसिला यूँ उतर रहा था
कि कोह-ए-आतिश-फ़शाँ से लावा नशेब को बह रहा हो
मेरे लहू से सोज उबल पड़े
जिन की तेज़ हिद्दत से तीरगी के मुहीब यख़-बस्ता संग पिघले
तो नूर के रास्तों का इक जाल खुल गया
मगर अभी तो मुहीब काले पहाड़ कुछ और भी नज़र आ रहे हैं
और मैं सफ़र की हिद्दत से जल रहा हूँ
ज़रा मैं अब चाँदनी की ठंडी गुदाज़-चादर में
दम तो ले लूँ
कहीं उबलती हुई ये आतिश
मुझे जला कर भस्म न कर दे
Read Fullधुँदले धुँदले से
जैसे इक सीम-तन के चेहरे के शोख़ ग़ाज़े पे
आँसुओं का ग़ुबार हो
पेड़, मुंतज़िर
अपनी नर्म शाख़ों के हाथ फैलाए
और कभी कोई शाख़ चटकी
तो साए निकले
मुलूक फूलों को चूम कर
चाँदनी की चादर पे नाचते थे
कहाँ से आई
वो इक किरन
जिस ने फैलती तीरगी की गँभीरता को चीरा
तो मेरे भीतर में एक किरनों का सिलसिला यूँ उतर रहा था
कि कोह-ए-आतिश-फ़शाँ से लावा नशेब को बह रहा हो
मेरे लहू से सोज उबल पड़े
जिन की तेज़ हिद्दत से तीरगी के मुहीब यख़-बस्ता संग पिघले
तो नूर के रास्तों का इक जाल खुल गया
मगर अभी तो मुहीब काले पहाड़ कुछ और भी नज़र आ रहे हैं
और मैं सफ़र की हिद्दत से जल रहा हूँ
ज़रा मैं अब चाँदनी की ठंडी गुदाज़-चादर में
दम तो ले लूँ
कहीं उबलती हुई ये आतिश
मुझे जला कर भस्म न कर दे
1
0 Likes









