Ejaz Farooqi

Top 10 of Ejaz Farooqi

    सहर के वक़्त
    कुँवारी ज़मीन शबनम में नहा के लेटी है
    वो सब्ज़ चादर-ए-गुल-ताब
    आरिज़-ए-महताब
    ख़ुमार-ए-ख़्वाब का आलम
    वो इंतिज़ार का आलम
    कि दूर देस से जैसे
    कभी तो आएगा
    वो दूर देस से सूरज का देवता आया
    और अपनी तेज़ निगाहों से गुदगुदी करता
    वो जौफ़-उल-अर्ज़ के निस्फ़ुन्नहार पर पहुँचा
    ज़मीं पे ख़ौफ़ की इक ज़र्द लहर सी फैली
    मगर वो सब्ज़ सा जादू कुँवारी दुल्हन का
    फ़ज़ा पे छा ही गया इक ख़ुमार का आलम
    उतर गया हरे शीशे में देवता आख़िर

    वो शाम लम्स धुँदलका
    लबों का रंग लबों में घुला
    हसीन था मंज़र
    लज़ीज़ था लम्हा
    हवा की अँगड़ाई

    और उस के बा'द भयानक हवा के ज़न्नाटे
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    Ejaz Farooqi
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    यादें नागिन
    डस जाएँ
    तो जीवन रस में ज़हर मिले
    शाख़ें सूख के काँटा हों
    मौत का साया गहरा हो

    यादें कलियाँ
    खिल जाएँ
    तो सहरा सहरा महक उठे
    टहनी टहनी पत्ता पत्ता अमृत रस टपकाए
    जीवन का उजयाला हो

    तेरी आँखें नागिन जैसी
    तेरे होंट हैं कलियाँ
    एक में मौत का गहरा साया
    एक में रस जीवन का
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    Ejaz Farooqi
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    तेरी तुर्बत
    तेरी आवाज़ों का गुम्बद
    एक वज़ीफ़ा
    जिस से गुम्बद का पोशीदा दर खुल जाता
    भूल गया था
    उस की ख़ातिर जाने कितने वीराने और कितने बसेरे मैं ने छाने
    पर वो मुक़द्दस पाँव की मिट्टी न मिल सकी
    जिस को इस मूरत पर मलता
    तो तेरी ही आवाज़ निकलती
    तेरी चाँद सी आवाज़ों पर
    पत्थर जैसा बादल
    बरस बरस कर घुल जाता
    तो चाँदनी मेरे भीतर की भसमाने वाली आग बुझाती
    मेरा जिस्म भी
    तेरी आवाज़ों का मरक़द
    अंदर इक तूफ़ान था
    आवाज़ों के शो'ले चटख़ रहे थे
    बाहर
    हूँ का आलम
    तेरी आवाज़ों में रंग थे
    मीठे ठंडे और रसीले
    मेरी आवाज़ों में चीख़ें
    तेरी आवाज़ों के रंग मैं जंगल जंगल ढूँड रहा था
    आँख उठा कर देखा
    तो तेरी ही आवाज़ों के रंग हैं
    जो आकाश पे बिखरे पड़े हैं
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    Ejaz Farooqi
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    वादी वादी सहरा सहरा फिरता रहा मैं दीवाना
    कोह मिला
    तो दरिया बन कर उस का सीना चीर के गुज़रा
    सहराओं की तुंद हवाओं में लाला बन कर जलता रहा
    धरती की आग़ोश मिली
    तो पौदा बन कर फूटा
    जब आकाश से नज़रें मिलीं
    तो ताइर बन के उड़ा
    ग़ारों के अँधियारों में मैं चाँद बना
    और आकाश पे सूरज बन कर चमका
    फिर भी मैं दीवाना रहा
    अपने सपनों ख़्वाबों की उल्टी सीधी तस्वीर बनाई
    टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचीं
    लेकिन जब इक हर्फ़ मिला
    गोया नूर की किरनें मेरे दो होंटों में सिमट आई हैं
    मैं ये चराग़-ए-अला-दीं ले कर
    ग़ारों के अँधियारों में खोए हुए मोती ढूँड रहा हूँ
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    Ejaz Farooqi
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    वो एक पुल था
    मिरे और अज्दाद के ज़मानों का नुक़्ता-ए-इत्तिसाल
    उस की गुज़रगाहों से रिवायतों और हिकायतों के हज़ार-हा क़ाफ़िले निकल कर
    नए ज़माने की यूरिशों से मिरी बिखरती अना में
    उल्फ़त यक़ीन और ए'तिमाद के रंग भर गए हैं
    वो एक पुल आज टूट कर गहरी घाटियों में गिरा है
    अब मैं खड़ा हूँ
    उन गहरी घाटियों पर
    मैं एक पुल हूँ
    वो एक बरगद था
    जिस की छाँव में एक ठंडी मिठास थी
    जिस ने जलते सूरज की हिद्दतें अपने जिस्म में जज़्ब कर के
    उस की सुनहरी किरनों को ठंडी शबनम की तरह
    मेरी उजाड़ आँखों में क़तरा क़तरा उतारा
    वो आज हिद्दतों के वफ़ूर से जल गया
    तो अब मैं ही एक बरगद हूँ
    आने वालों के वास्ते एक ठंडी छाँव

    वो एक जव्वाला था
    वो भरपूर ज़ीस्त करने की एक सीमाबी आरज़ू
    वो लहू की धड़कन
    जो रात की ज़ुल्मतों पे शब-ख़ून मार कर
    रौशनी और उम्मीद के दरीचों को खोलता
    आज शब का सफ़्फ़ाक हाथ
    उस के लहू की धड़कन को ले उड़ा
    और अब फ़क़त मैं हूँ
    रात की ज़ुल्मतों से पंजा-फ़गन
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    Ejaz Farooqi
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    पानी पानी
    हर सू पानी
    पानी बे-हैअत बे-सूरत
    साग़र में साग़र बन जाए
    फूलों पर ये शबनम
    आँखों में ये आँसू
    उड़ जाए तो बादल
    बह जाए तो दरिया
    फैले तो इक सागर
    पानी बे-हैअत बे-सूरत
    पानी
    देवताओं का एक मुक़द्दस रस है
    ज़ीस्त का बहता धारा
    चाँदी की कश्ती का झूला

    मैं भी पानी
    नद्दी बन कर बहता जाऊँ
    सख़्त चटानों का दिल चीरूँ
    धरती के हाथों पर रेखा खींचूँ
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    Ejaz Farooqi
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    ये चटियल सर
    ज़मीं
    तुम को मिली
    तो तुम ने बे-बर्ग-ओ-गयाह टीले पर
    इक मा'बद बना डाला
    और उस में एक बुत रक्खा
    जिसे तुम ने तराशा
    आदमी के उस्तुख़्वाँ से
    जिस के चरनों में चढ़ावा लाए तुम
    तो अपने भाई का
    और उस के होंट अब तक ख़ून की लाली से रंगीं हैं
    ज़बाँ अब तक लहू के ज़ाइक़े से तर है
    लाओ और नज़राना
    कि ये मा'बद है
    मैं बुत हूँ
    मिरे ही तुम पुजारी हो
    ये चटियल सर
    ज़मीं
    मुझ को मिली
    तो मैं ने भूरी चरचराती ख़ुश्क मिट्टी को पसीने की नमी बख़्शी
    मिरे ख़ूँ की हरारत ने ज़मीं के संग-ए-यख़-बस्ता को पिघलाया
    ज़मीं की छातियों से ज़ीस्त के सोते बहे
    रंगों के चश्में हर तरफ़ फूटे
    ये धरती सब्ज़ चादर ओढ़ कर दुल्हन बनी निकली
    और इस चादर में मैं ने नूर के धागे पिरो डाले
    ये इक तुम हो
    कि मेरे ख़ून से मा'बद बनाते हो
    ये इक मैं हूँ
    कि अपने नूर से धरती के मंदिर को सजाता हूँ
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    Ejaz Farooqi
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    तू ने सर्द हवाओं की ज़बाँ सीखी है
    तेरे ठंडे लम्स से धड़कनें यख़-बस्ता हुईं और मैं चुप हूँ
    मैं ने वक़्त-ए-सुब्ह चिड़ियों की सुरीली चहचहाहट को सुना है
    और मेरे ज़ेहन के सागर में नग़्में बुलबुले बन कर उठे हैं
    तेरे कड़वे बोल से हर-सू हैं आवाज़ों के लाशे
    और मैं चुप हूँ
    मैं ने वो मासूम प्यारे गुल-बदन देखे हैं
    जिन के मरमरीं जिस्मों में पाकीज़ा मोहब्बत के नशेमन हैं
    तिरे इन खुरदुरे हाथों ने ये सारे नशेमन नोच डाले
    और मैं चुप हूँ
    मैं ने देखे हैं वो चेहरे चाँद जैसे ग़ुंचा-सूरत
    जिन की आँखें आइना हैं आने वाले मौसमों का
    तू ने उन आँखों में भी काँटे चुभोए
    और मैं चुप हूँ
    बा-कमाल ओ बा-सफ़ा वो लोग भी देखे हैं मैं ने
    जिन के होंटों से खिले हैं सिद्क़दानाई के फूल
    तू ने उन होंटों को घोला ज़हर में
    और मैं चुप हूँ
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    Ejaz Farooqi
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    (1)
    मौसम-ए-सर्मा की ठिठुराती हुई शाम-ए-हज़ीं
    चोटियों पर बर्फ़ की इक लाश
    सारे पेड़ नंगे टुड-मुंड
    सहन में वो चरमराते भूरे पत्तों का कफ़न
    एक सन्नाटा
    वो इक टहनी तड़ख़ कर गिर पड़ी
    इक साँस टूटा
    (२)
    मैं ने कल ही अपने बूढे बाप के ठंडे बदन को
    ग़ुस्ल दे के अपने हाथों
    काली धरती के दहाने में उतारा
    कि यही है रस्म
    मैं ज़िंदा भी पामाल-ए-रुसूम
    ज़िंदगी में वो चटकती रौशनी का एक मीनार-ए-बुलंद
    उस की किरनों ने हज़ारों क़ुमक़ु
    में रौशन किए
    और ये रस्म-ए-ज़माना
    उम्र-भर जो दूसरों को रौशनी देता रहा
    इक अँधेरी क़ब्र इस के वास्ते
    (३)
    आने वाले मौसमों में सैंकड़ों ही टहनियाँ फूटेंगी
    लेकिन जिस जगह उस पेड़ से ये शाख़ टूटी
    वो निशाँ इक दायरा बन कर रहेगा
    मैं ने जिन हाथों से अपने बाप के ठंडे बदन को
    काली धरती के दहाने में उतारा
    उस की पोरों से वो बूढ़ी धड़कनें क़िर्तास पर बहती रहेंगी
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    Ejaz Farooqi
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    वो तीरगी भी अजीब थी
    चाँदनी की ठंडी गुदाज़ चादर से सारा जंगल लिपट रहा था
    गुलों के सद-रंग
    धुँदले धुँदले से
    जैसे इक सीम-तन के चेहरे के शोख़ ग़ाज़े पे
    आँसुओं का ग़ुबार हो
    पेड़, मुंतज़िर
    अपनी नर्म शाख़ों के हाथ फैलाए
    और कभी कोई शाख़ चटकी
    तो साए निकले
    मुलूक फूलों को चूम कर
    चाँदनी की चादर पे नाचते थे
    कहाँ से आई
    वो इक किरन
    जिस ने फैलती तीरगी की गँभीरता को चीरा
    तो मेरे भीतर में एक किरनों का सिलसिला यूँ उतर रहा था
    कि कोह-ए-आतिश-फ़शाँ से लावा नशेब को बह रहा हो
    मेरे लहू से सोज उबल पड़े
    जिन की तेज़ हिद्दत से तीरगी के मुहीब यख़-बस्ता संग पिघले
    तो नूर के रास्तों का इक जाल खुल गया
    मगर अभी तो मुहीब काले पहाड़ कुछ और भी नज़र आ रहे हैं
    और मैं सफ़र की हिद्दत से जल रहा हूँ
    ज़रा मैं अब चाँदनी की ठंडी गुदाज़-चादर में
    दम तो ले लूँ
    कहीं उबलती हुई ये आतिश
    मुझे जला कर भस्म न कर दे
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    Ejaz Farooqi
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