बद-नसीबी गर्दनों का तौक़ है
और मेहनतों के हात ख़ाली हैं
हवा के साथ गंदुम की महक शहरों में उड़ती है
ज़ख़ीरा घर मुक़फ़्फ़ल हैं
मशक़्क़त का बदल कड़वे कसीले मौसमों का ज़ाइक़ा है
हम पुरानी झोलियाँ फैलाए ख़्वाहिश के अँधेरे रास्तों पर
उल्टे लटके चीख़ते हैं
और ख़ुश-फ़हमी की मिट्टी पर लकीरें खींचते हैं
आसमाँ की सम्त तकते हैं
कि शायद रात-दिन के दरमियानी फ़ासलों के ख़त्म होने की बशारत हो
दुखों के काग़ज़ों पे सुख इबारत हो
Read Fullऔर मेहनतों के हात ख़ाली हैं
हवा के साथ गंदुम की महक शहरों में उड़ती है
ज़ख़ीरा घर मुक़फ़्फ़ल हैं
मशक़्क़त का बदल कड़वे कसीले मौसमों का ज़ाइक़ा है
हम पुरानी झोलियाँ फैलाए ख़्वाहिश के अँधेरे रास्तों पर
उल्टे लटके चीख़ते हैं
और ख़ुश-फ़हमी की मिट्टी पर लकीरें खींचते हैं
आसमाँ की सम्त तकते हैं
कि शायद रात-दिन के दरमियानी फ़ासलों के ख़त्म होने की बशारत हो
दुखों के काग़ज़ों पे सुख इबारत हो
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पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ
बाक़ी के चार दिन भी गुज़ार आइने के साथ
बाक़ी के चार दिन भी गुज़ार आइने के साथ
हासिद बहुत है पल में हुवैदा करे ख़िज़ाँ
इतना न लग के बैठ बहार आइने के साथ
पथरा गए हैं लोग तजल्ली से हुस्न की
थोड़ा सा डाल रुख़ पे ग़ुबार आइने के साथ
करता है अक्स ज़ेर-ओ-ज़बर ना-मुराद वक़्त
जब घूमता है उल्टे मदार आइने के साथ
पाया न कुछ ख़ला के सिवा अक्स-ए-हैरती
गुज़रा था आर-पार हज़ार आइने के साथ
मादूम हो रहे हैं ख़द-ओ-ख़ाल किस सबब
गुफ़्त-ओ-शुनीद कर मिरे यार आइने के साथ
वीरान सा खंडर है मगर सैर के लिए
लगती है इक तवील क़तार आइने के साथ
माकूस ओ अक्स कैसे हैं पैवस्त देख तू
आईना कर रहा है सिंघार आइने के साथ
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कोई सामान-ए-सफ़र है न मसाफ़त दर-पेश
मुतमइन बे-सर-ओ-सामानी में बैठा हुआ हूँ
कभी नायाफ़्त का है तो कभी कम-याफ़्त का ग़म
वज्ह-बे-वज्ह परेशानी में बैठा हुआ हूँ
कार-ए-दुश्वार है आग़ाज़ से मुंकिर जब तक
कार-ए-बे-कार की आसानी में बैठा हुआ हूँ
कल कहीं रफ़्ता में था हाल की हैरत का असीर
अब किसी फ़र्दा की हैरानी में बैठा हुआ हूँ
ख़ैर हम-ज़ाद मिरा दूर तमाशाई है
शर हूँ और फ़ितरत-ए-इंसानी में बैठा हुआ हूँ
जिस्म हूँ और नफ़स ठहरा है ज़ामिन मेरा
साअत-ए-उम्र की निगरानी में बैठा हुआ हूँ
एक बाज़ार-ए-तिलिस्मात है जिस के अंदर
जेब-ए-ख़ाली तिरी अर्ज़ानी में बैठा हुआ हूँ
रेग-ता-रेग हूँ फैला हुआ सहरा की तरह
और सराबों की फ़रावानी में बैठा हुआ हूँ
ऐसा सन्नाटा है आवाज़ से हौल आता है
इक बयाबाँ सा बयाबानी में बैठा हुआ हूँ
न मैं बिल्क़ीस कि हो शहर-ए-सबा की ख़्वाहिश
न ग़म-ए-तख़्त-ए-सुलैमानी में बैठा हुआ हूँ
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गलियों में भटकना रह-ए-आलाम में रहना
याँ सब को है नाकामी-ए-यक-गाम में रहना
याँ सब को है नाकामी-ए-यक-गाम में रहना
पहले तो बिखर जाना गुज़रगाहों के हमराह
फिर हसरत-ए-दीवार-ओ-दर-ओ-बाम में रहना
बाग़ात में फिरना ख़स-ओ-ख़ाशाक पहन कर
हर सिलसिला-ए-सब्ज़ के अंजाम में रहना
हर साँस में घुलना तिरी दहलीज़ की ख़ुश्बू
हर आँख का दूरी के सियह दाम में रहना
आवाज़ न आना किसी आबाद मकाँ से
हर हाथ का याँ दस्तक-ए-नाकाम में रहना
कुछ देर में खुल जाएगा बस्ती का नसीबा
कुछ देर है और सख़्ती-अय्याम में रहना
'ए'जाज़' बहुत दिन से है शोहरत का बुलावा
तुम हो कि वही क़रया-ए-गुमनाम में रहना
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सज़ा-ए-मर्ग की सूरत विसाल गुज़रा था
बिछड़ गए हैं तो क्या क्या क़यामतें होंगी
जुदाइयों में ज़माने ने क्या सुलूक किया
कभी दोबारा मिले तो हिकायतें होंगी
ख़ुशा कि अपनी वफ़ा फ़ासलों की नज़्र हुई
हमारे बा'द ज़मीं पर रिफ़ाक़तें होंगी
उजड़ गया हूँ मगर हौसले सलामत हैं
कि एक दिन तुझे शायद नदामतें होंगी
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उसी जन्नत जहन्नम में मरूँगा
गए मौसम को आवाज़ें न दूँगा
गए मौसम को आवाज़ें न दूँगा
नए जिस्मों से मक़्तल जागते हैं
नए लोगों के रस्ते पर चलूँगा
मिरी आँखें सलामत हैं तो फिर मैं
पराए ख़्वाब ले कर क्या करूँगा
लहू की सुर्ख़ियाँ मेरे अलम हैं
ख़िज़ाँ के ज़र्द लश्कर से लड़ूँगा
किसी ख़ित्ते में क़त्ल-ए-रौशनी हो
मैं अपने शहर पर नौहा कहूँगा
और उस पर जो सितम टूटेगा उस को
तुम्हारे नाम लिक्खूँगा सहूँगा
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फैला अजब ग़ुबार है आईना-गाह में
मुश्किल है ख़ुद को ढूँढ़ना अक्स-ए-तबाह में
मुश्किल है ख़ुद को ढूँढ़ना अक्स-ए-तबाह में
जल-बुझ चुका है ख़्वाहिश-ए-नाकाम से वजूद
परछाईं फिर रही है मकान-ए-सियाह में
मैं वो अजल-नसीब कि क़ातिल हूँ अपना-आप
होता हूँ रोज़ क़त्ल किसी क़त्ल-गाह में
रक्खा गया हूँ इज़्ज़त-ओ-तौक़ीर का असीर
बाँधा गया है सर को ग़ुरूर-ए-कुलाह में
हलकान में नहीं तिरी ख़ातिर सर-ए-हुजूम
सब मर रहे हैं हसरत-ए-यक-दो-निगाह में
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जो क़िस्सा-गो ने सुनाया वही सुना गया है
अगर था इस से सिवा तो नहीं कहा गया है
अगर था इस से सिवा तो नहीं कहा गया है
मुसाफ़िरत का हुनर है न वापसी की ख़बर
सो चल रहा हूँ जिधर भी ये रास्ता गया है
अमाँ को नील मुयस्सर न मैं कोई मूसा
मुझे सुपुर्द-ए-फ़राईल कर दिया गया है
सबब नहीं था ज़मीं पर उतारने का मुझे
सबब बग़ैर ही वापस उठा लिया गया है
ये मुंतहा है मिरी ना-रसाई का शायद
जो दूर हद्द-ए-नज़र से परे ख़ला गया है
महक उठे हैं मिरे बाग़ के ख़स-ओ-ख़ाशाक
कोई टहलता हुआ सूरत-ए-सबा गया है
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पेशरवो तुम बीत चुके अब हम लोगों की बारी है
ज़िंदानों के दर तो वा हों हम आगे आगे होंगे
गुमनामी की गलियों में तारीख़ कहाँ तक पहुँचेगी
एक तुम्हीं सुक़रात नहीं हो और बहुत गुज़रे होंगे
हुस्न अगर ज़ंजीर किया है इश्क़ भी फिर ज़ंजीर करो
वर्ना बात बहुत फैलेगी दूर तलक चर्चे होंगे
ऐ चकवाल से आने वालो कुछ तो हाल-अहवाल कहो
फूल से आरिज़ चाँद से चेहरे तुम ने भी देखे होंगे
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बना हुआ है तअल्लुक़ सा उस्तुवारी का
मिरे तवाफ़ से इस मेहवर ओ मदार के बीच
कि आता जाता रहे अक्स-ए-हैरती इस में
बिछा दिया गया आईना आर-पार के बीच
हवा के खेल में शिरकत के वास्ते मुझ को
ख़िज़ाँ ने शाख़ से फेंका है रहगुज़ार के बीच
ये मैं हूँ तू है हयूला है हर मुसाफ़िर का
जो मिट रहा है थकन से उधर ग़ुबार के बीच
कोई लकीर सी पानी की झिलमिलाती है
कभी कभी मिरे मतरूक आबशार के बीच
मैं उम्र को तो मुझे उम्र खींचती है उलट
तज़ाद सम्त का है अस्प और सवार के बीच
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