Jahangeer nayab

Top 10 of Jahangeer nayab

    मैं ने कोशिश की बहुत लेकिन कहाँ यकजा हुआ
    सफ़हा-ए-हस्ती का शीराज़ा रहा बिखरा हुआ

    ज़ेहन की खिड़की खुली दिल का दरीचा वा हुआ
    तब जहाँ के दर्द से रिश्ता मिरा गहरा हुआ

    क्या पत्ता कब कौन उस की ज़द पे आ जाए कहाँ
    वक़्त की रफ़्तार से हर शख़्स है सहमा हुआ

    किस की याद आई मोअ'त्तर हो रहे हैं ज़ेहन-ओ-दिल
    किस की ख़ुशबू से है सारा पैरहन महका हुआ

    पेड़ के नीचे शिकारी जाल फैलाए हुए
    और परिंदा शाख़ पर बैठा डरा सहमा हुआ

    दो-क़दम भी अब तुम्हारे साथ चलना था मुहाल
    राह तुम ने ख़ुद अलग कर ली चलो अच्छा हुआ

    ज़िंदगी हर ज़ाविए से देखता हूँ मैं तुझे
    है मिरी फ़िक्र-ओ-नज़र का दायरा फैला हुआ

    छप गई पानी में अपनी छब दिखा कर जल-परी
    आज फिर 'नायाब' मेरे साथ इक धोका हुआ
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    दिल से निकाल यास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी
    होता है क्यूँ उदास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी

    मायूसियों की क़ैद से ख़ुद को निकाल कर
    आ जाओ मेरे पास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी

    आ कर कभी तू दीद से सैराब कर मुझे
    मरती नहीं है प्यास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी

    मेहर-ओ-वफ़ा ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत गुदाज़ दिल
    सब कुछ है मेरे पास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी

    लौटेंगे तेरे आते ही फिर दिन बहार के
    रहती है दिल में आस कि ज़िंदा हूँ मैं

    'नायाब' शाख़-ए-चश्म में खिलते हैं अब भी ख़्वाब
    सच है तिरा क़यास कि ज़िंदा हूँ मैं अभी
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    हर्फ़ से तासीर लफ़्ज़ों से मअ'नी ले गया
    जाते जाते वो मिरी जादू-बयानी ले गया

    उस से थीं मंसूब जो यादें सुहानी ले गया
    छीन कर मुझ से सभी अपनी निशानी ले गया

    शाह-राह-ए-ज़ीस्त पर मुझ को अकेला छोड़ कर
    जाने वाला मुझ से लुत्फ़-ए-ज़िंदगानी ले गया

    मेज़ पर नन्हा सा इक काग़ज़ का टुकड़ा छोड़ कर
    ज़िंदगी की हर ख़ुशी वो ना-गहानी ले गया

    हम उधर मसरूफ़ थे और वक़्त का सैल-ए-रवाँ
    क्या पता कब छीन कर हम से जवानी ले गया

    मुद्दतों से साकित-ओ-जामिद है ये नायाब दिल
    कौन इस दरिया की मौजों की रवानी ले गया
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    ये कौन जल्वा-फ़गन है मिरी निगाहों में
    क़दम क़दम पे बरसता है नूर राहों में

    भरोसा हद से सिवा था मुझे कभी जिस पर
    मिरे ख़िलाफ़ है शामिल वही गवाहों में

    सुपुर्दगी का ये आलम भी क्या क़यामत है
    सिमट के यूँ तेरा आ जाना मेरी बाहोँ में

    तिरी पनाह में रह कर भी जो नहीं महफ़ूज़
    मिरा शुमार है ऐसे ही बे-पनाहों में

    कब आसमान का फटता है दिल ये देखना है
    बदल रही हैं मिरी सिसकियाँ कराहों में

    मैं कैसे पेश करूँ दावा पारसाई का
    मैं एक उम्र मुलव्विस रहा गुनाहों में

    बना है जब से वो 'नायाब' हम-सफ़र मेरा
    बिछे हुए हैं मसर्रत के फूल राहों में
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    अपने हिसार-ए-ज़ात में उलझा हुआ हूँ मैं
    या'नी कि काएनात में उलझा हुआ हूँ मैं

    क़ाबू में आज दिल नहीं क्या हो गया मुझे
    फिर आज ख़्वाहिशात में उलझा हुआ हूँ मैं

    जैसे कि होने वाली है अनहोनी फिर कोई
    हर-पल तवहहुमात में उलझा हुआ हूँ मैं

    कुछ अपना फ़र्ज़ प्यार तिरा फ़िक्र-ए-रोज़गार
    कितने ही वारदात में उलझा हुआ हूँ मैं

    फ़ुर्सत कहाँ बनाऊँ मरासिम नए नए
    पिछले तअ'ल्लुक़ात में उलझा हुआ हूँ मैं

    सब हैं असीर-ए-रंज-ओ-अलम इस जहान में
    तन्हा कहाँ हयात में उलझा हुआ हूँ मैं

    'नायाब' जब नहीं है वफ़ाओं का उस को पास
    फिर क्यूँ तकल्लुफ़ात में उलझा हुआ हूँ मैं
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    Jahangeer nayab
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    ख़ुद अपने आप से रूठा हुआ हूँ
    समझते हैं वो मैं उन से ख़फ़ा हूँ

    हक़ाएक़ से चुरा कर आँख अपनी
    मैं किन सायों के पीछे भागता हूँ

    कोई तो रास्ता होगा बताना
    तिरे दिल तक पहुँचना चाहता हूँ

    ब-ज़ाहिर है हँसी होंटों पे मेरे
    मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ

    जहाँ ख़ुद को मुक़फ़्फ़ल कर रखा था
    मैं उस कमरे की चाबी खो चुका हूँ

    ये किस ने मुझ को बस में कर लिया है
    इशारों पर मैं किस के चल रहा हूँ

    अगरचे हाल है तारीक मेरा
    सितारा आने वाले वक़्त का हूँ

    तपा हूँ आतिश-ए-दौराँ में 'नायाब'
    तो अब जा कर कहीं कुंदन बना हूँ
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    Jahangeer nayab
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    क्यूँ ज़ुल्म ढा रहा हूँ मैं अपने वजूद पर
    कीचड़ उछालता हूँ मैं अपने वजूद पर

    इनकार कर के ख़ुद ही मैं अपने वजूद का
    ग़ुस्सा उतारता हूँ मैं अपने वजूद पर

    क्या चाहता हूँ ख़ुद से मुझे ख़ुद नहीं पता
    और ता'न छोड़ता हूँ मैं अपने वजूद पर

    डर है कोई चुरा न ले मुझ से कभी मुझे
    पहरे लगा रहा हूँ मैं अपने वजूद पर

    कर के ख़ुद अपने सारे सुबूतों को मुस्तरद
    उँगली उठा रहा हूँ मैं अपने वजूद पर

    'नायाब' मुझ से फ़ैज़ उठाता है हर कोई
    कब दाग़-ए-बद-नुमा हूँ मैं अपने वजूद पर
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    Jahangeer nayab
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    अब अगर और चुप रहूँगा मैं
    फिर ये तय हे कि फट पड़ूँगा मैं

    एक ऐसा भी वक़्त आएगा
    तुम सुनोगे फ़क़त कहूँगा मैं

    नाज़ उठाऊँगा नाज़ उठाने तक
    तेरे आगे नहीं बिछुँगा मैं

    देखना तेरी रहबरी के बग़ैर
    अपनी मंज़िल तलाश लूँगा मैं

    तुम को जाना है शौक़ से जाओ
    अब ख़ुशामद नहीं करूँगा मैं

    जब कभी तुझ से सामना होगा
    अजनबी की तरह मिलूँगा मैं

    क्या सबब है मिरी ख़मोशी का
    शोर थमने दो फिर कहूँगा मैं

    आइना रख के सामने 'नायाब'
    पागलों की तरह हँसूँगा मैं
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    Jahangeer nayab
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    अच्छा हूँ या बुरा हूँ मुझे कुछ नहीं पता
    नज़रों में तेरे क्या हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    क्या तुझ में ढूँढ़ता हूँ मुझे कुछ नहीं पता
    मैं तेरा हो गया हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    आगाह हूँ मैं मंज़िल-ए-मक़्सूद से मगर
    किस सम्त जा रहा हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    आवाज़ दे रहा है मुझे कौन बार बार
    किस के लिए रुका हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    इतना मुझे पता है तुम्हें हूँ अज़ीज़ मैं
    लेकिन तुम्हारा क्या हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    दीमक की तरह चाट रहा है जो कौन है
    किस ग़म में घुल रहा हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    मैं ख़ूब जानता हूँ ये मंज़िल नहीं मिरी
    आ कर कहाँ रुका हूँ मुझे कुछ नहीं पता

    रहता हूँ किस ख़याल में 'नायाब' इन दिनों
    क्या क्या मैं सोचता हूँ मुझे कुछ नहीं पता
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    Jahangeer nayab
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    मैं जब भी कोई मंज़र देखता हूँ
    ज़रा औरों से हट कर देखता हूँ

    कभी मैं देखता हूँ उस की रहमत
    कभी मैं अपनी चादर देखता हूँ

    नज़र का ज़ाविया बदला है जब से
    मैं कूज़े में समुंदर देखता हूँ

    कभी मेरे लिए थे फूल जिन में
    अब उन हाथों में पत्थर देखता हूँ

    सभी हैं मुब्तला-ए-ख़ुद-फ़रेबी
    अजब दुनिया का मंज़र देखता हूँ

    नहीं बदलाव के आसार कुछ भी
    अभी हालात अबतर देखता हूँ

    मुक़द्दर में लिखी वीरानियों में
    ज़रा सा रंग भर कर देखता हूँ

    नज़र आता है मदफ़न ख़्वाहिशों का
    कभी जब अपने अंदर देखता हूँ

    सुना है आग है उस का सरापा
    चलो बाहोँ में भर कर देखता हूँ

    बसीरत मुझ में है 'नायाब' ऐसी
    मैं हर क़तरे में गौहर देखता हूँ
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    Jahangeer nayab
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