हिज्र-मौसम था सताती रही तन्हाई हमें
    छत पे तारा भी जो टूटा तो सदा आई हमें

    क़हक़हा-ज़ार फ़ज़ाओं में अजब भीड़ सी थी
    घर का माहौल जो देखा तो हँसी आई हमें

    हम सराबों के मुसाफ़िर थे मगर जानते थे
    किस के दम पर न डराती रही पुर्वाई हमें

    छाँव ने आबला-पाई के सिवा कुछ न दिया
    धूप देती रही एहसास-ए-तवानाई हमें

    हम को तो दलदली सम्तों का भी अंदाज़ा था
    रेत दरिया की भी मालूम थी गहराई हमें

    'रिंद' ख़ामोश सी यलग़ार थी चौराहे पर
    काँच के घर से जो बाज़ार में ले आई हमें
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    P P Srivastava Rind
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    सब्ज़-रुतों में रंग-ए-ख़िज़ानी पढ़ते हैं
    हर चेहरे पर एक कहानी पढ़ते हैं

    नाम नहीं है कोई भी दरवाज़े पर
    तख़्ती पर बस एक निशानी पढ़ते हैं

    तिश्ना-लब लहरों ने क्या क्या लिख डाला
    ख़ुश्क रेत पर पानी पानी पढ़ते हैं

    नया सबक़ तो याद नहीं होता हम को
    जब पढ़ते हैं बात पुरानी पढ़ते हैं

    जब कोई मानूस सी ख़ुशबू आती है
    लम्स में उस के रात की रानी पढ़ते हैं

    फ़ुर्सत के लम्हों में हम अक्सर ऐ 'रिंद'
    तहरीरें जानी पहचानी पढ़ते हैं
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    P P Srivastava Rind
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    उफ़ुक़ पे दूधिया साया जो पाँव धरने लगा
    मुहीब रात का शीराज़ा ही बिखरने लगा

    तमाम उम्र जो लड़ता रहा मिरे अंदर
    मिरा ज़मीर ही मुझ से फ़रार करने लगा

    सफ़र में जब कभी ला-सम्तियों का ज़िक्र हुआ
    हमारा क़ाफ़िला तूल-ए-सफ़र से डरने लगा

    सुलग रहा है कहीं दूर दर्द का जंगल
    जो आसमान पे कड़वा धुआँ बिखरने लगा

    चढ़ी नदी को मैं पायाब कर के क्या आया
    तमाम शहर ही दरिया के पार करने लगा

    अजीब कर्ब से गुज़रा है जुगनुओं का जुलूस
    कहाँ ठहरना था इस को कहाँ ठहरने लगा

    हमारे साथ रही है सफ़र में बे-ख़बरी
    जुनूँ में सोच का इम्कान काम करने लगा

    बहुत अजीब है बातिन की गुमरही ऐ 'रिंद'
    सुकूत-ए-ज़ाहिरी टुकड़ों में था बिखरने लगा
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    P P Srivastava Rind
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    एहसास-ए-बे-तलब का ही इल्ज़ाम दो हमें
    रुस्वाइयों की भीड़ में इनआम दो हमें

    ख़ुद्दारियों की धूप में आराम दो हमें
    सौग़ात में ही गर्दिश-ए-अय्याम दो हमें

    एहसास-ए-लम्स जिस्म की इस भीड़ में कहाँ
    काली रुतें गुनाह का पैग़ाम दो हमें

    गुम-सुम हिसार-ए-रब्त में है लम्हा-ए-अज़ाब
    ख़्वाहिश का कर्ब फ़ितरत-ए-बदनाम दो हमें

    बे-ज़ारियों को दश्त-ए-नफ़स में समेट कर
    दर्द-आश्ना जुनून के अहकाम दो हमें

    दश्त-ए-सराब-ए-संग है माज़ी का इज़्तिराब
    गर हो सके तो मुस्तक़िल आराम दो हमें

    सौग़ात में मिली है मुझे राएगाँ शफ़क़
    किस ने कहा है इस का भी इल्ज़ाम दो हमें

    यादों का इक हुजूम है ऐ 'रिंद' और हम
    फ़ुर्सत नहीं है इन दिनों आराम दो हमें
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    P P Srivastava Rind
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    बे-तअल्लुक़ रूह का जब जिस्म से रिश्ता हुआ
    घर में ला-वारिस पस-ए-मंज़र का सन्नाटा हुआ

    धूप लहजे में नोकीलापन कहाँ से लाएगी
    हम ने देखा है शफ़क़-सूरज अभी बुझता हुआ

    चाहता है दिल किसी से राज़ की बातें करे
    फूल आधी रात का आँगन में है महका हुआ

    सुर्ख़ मौसम की कहानी तो पुरानी हो गई
    खुल गया मौसम तो सारे शहर में चर्चा हुआ

    आसमाँ ज़हराब-मंज़र गुम-शुदा बेज़ारीयां
    लम्स तन्हाई का लगता है मुझे डसता हुआ

    हर तरफ़ रोती हुई ख़ामोशियों का शोर है
    देखना ये मेरी बस्ती में अचानक क्या हुआ

    जिस्म मेरा जागता है दोनों आँखें बंद हैं
    और सन्नाटा है मेरी रूह तक उतरा हुआ

    आफ़ियत गर चाहते हो 'रिंद' वापस घर चलो
    अब तमाशा-गाह का मंज़र है कुछ बिगड़ा हुआ
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    P P Srivastava Rind
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    रौशनी भर ख़ला पे बार थे हम
    धुँद मंज़र पस-ए-ग़ुबार थे हम

    धूप में आए तो सुकून मिला
    छाँव में थे तो दाग़दार थे हम

    कोई दस्तक न कोई आहट थी
    मुद्दतों वहम के शिकार थे हम

    बुत-गरी में हुनर भी शामिल था
    संग-साज़ी से होशियार थे हम

    क़र्ज़ कोई भी जिस्म ओ जाँ पे न था
    ज़िंदगी पर मगर उधार थे हम

    ज़ुल्मतें तो चराग़-ए-ख़ेमा थीं
    ख़ल्वतों के गुनाहगार थे हम

    फ़िक्र ओ मअ'नी तलाज़मे तश्बीह
    ऐ ग़ज़ल तेरे जाँ-निसार थे हम

    'रिंद' था बेकसी का लुत्फ़ अजीब
    घर में रह कर भी बे-दयार थे हम
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    P P Srivastava Rind
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    पेश-ए-मंज़र जो तमाशे थे पस-ए-मंज़र भी थे
    हम ही थे माल-ए-ग़नीमत हम ही ग़ारत-गर भी थे

    आस्तीनों में छुपा कर साँप भी लाए थे लोग
    शहर की इस भीड़ में कुछ लोग बाज़ीगर भी थे

    बर्फ़-मंज़र धूल के बादल हवा के क़हक़हे
    जो कभी दहलीज़ के बाहर थे वो अंदर भी थे

    आख़िर-ए-शब दर्द की टूटी हुई बैसाखियाँ
    आड़े-तिरछे ज़ाविए मौसम के चेहरे पर भी थे

    रात हम ने जुगनुओं की सब दुकानें बेच दीं
    सुब्ह को नीलाम करने के लिए कुछ घर भी थे

    कुछ बिला-उनवान रिश्ते अजनबी सरगोशियाँ
    रतजगों के जश्न में ज़ख़्मों के सौदागर भी थे

    शब-परस्तों के नगर में बुत-परस्ती ही न थी
    वहशतें थीं संग-ए-मरमर भी था कारीगर भी थे

    इस ख़राबे में नए मौसम की साज़िश थी तो 'रिंद'
    लज़्ज़त-ए-एहसास के लम्हों के जलते पर भी थे
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    P P Srivastava Rind
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    रात के गुम्बद में यादों का बसेरा हो गया है
    चाँद की क़िंदील जलते ही उजाला हो गया है

    ख़ामुशी की आँधियाँ बाग़ी नज़र आती हैं मुझ को
    रात काली है तो सन्नाटा भी काला हो गया है

    अब मोहब्बत है मुरव्वत है न अब इंकिसारी
    आज के इस दौर में हर शख़्स नंगा हो गया है

    क़िस्सा-ए-रेग-ए-रवाँ जब आँधियों की ज़द पे आया
    धुँद का हैरत-ज़दा आसेब तन्हा हो गया है
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    P P Srivastava Rind
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    नशात-ए-दर्द के मौसम में गर नमी कम है
    फ़ज़ा के बर्ग-ए-शफ़क़ पर भी ताज़गी कम है

    सराब बन के ख़लाओं में गुम नज़ारा-ए-सम्त
    मुझे लगा कि ख़लाओं में रौशनी कम है

    अजीब लोग हैं काँटों पे फूल रखते हैं
    ये जानते हुए इन में मुक़द्दरी कम है

    न कोई ख़्वाब न यादों का बे-कराँ सा हुजूम
    उदास रात के ख़ेमे में दिलकशी कम है

    मैं अपने-आप में बिखरा हुआ हूँ मुद्दत से
    अगर मैं ख़ुद को समेटूँ तो ज़िंदगी कम है

    खुली छतों पे दुपट्टे हवा में उड़ते नहीं
    तुम्हारे शहर में क्या आसमान भी कम है

    पुरानी सोच को समझें तो कोई बात बने
    जदीद फ़िक्र में एहसास-ए-नग़्मगी कम है

    कहाँ से लाओगे ऐ 'रिंद' मो'तबर मज़मून
    ग़ज़ल में जबकि रिवायत की चाशनी कम है
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    P P Srivastava Rind
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    फ़िक्र कम बयान कम
    रह गई ज़बान कम

    धूप में ढलान कम
    रौशनी में जान कम

    बारिशों की इंतिहा
    छत पे आसमान कम

    ज़लज़लों ने कर दिए
    शहर के मकान कम

    ख़ामुशी ही ख़ामुशी
    मुर्ग़ की अज़ान कम

    धूप शोला-बार है
    छाँव का गुमान कम

    जिस्म में तनाव है
    हड्डियों में जान कम

    'रिंद' अब सुकूँ कहाँ
    है अज़ाब जान कम
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    P P Srivastava Rind
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