रौज़न-ए-दीवार-ए-शब
ख़ुश-अदा पुर-कार है
नूर से सरशार है
सैल-ए-मौज-ए-शहर में
वो उतरने को है अब
ख़ैर-मक़्दम के लिए
जागते हैं चश्म-ओ-लब
मेरी ख़ातिर शहर में
वो फ़रोज़ाँ जिस्म-ओ-जाँ
वो दरख़्शाँ पैरहन
वो सुनहरा बाँकपन
शो'ला-ए-तनवीर है
ख़ून में तहलील है
सुब्ह की तस्वीर है
उस का रू-ए-शादमाँ
हश्र के हंगाम तक
मेरे दिल में जावेदाँ
Read Fullख़ुश-अदा पुर-कार है
नूर से सरशार है
सैल-ए-मौज-ए-शहर में
वो उतरने को है अब
ख़ैर-मक़्दम के लिए
जागते हैं चश्म-ओ-लब
मेरी ख़ातिर शहर में
वो फ़रोज़ाँ जिस्म-ओ-जाँ
वो दरख़्शाँ पैरहन
वो सुनहरा बाँकपन
शो'ला-ए-तनवीर है
ख़ून में तहलील है
सुब्ह की तस्वीर है
उस का रू-ए-शादमाँ
हश्र के हंगाम तक
मेरे दिल में जावेदाँ
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ये जहान-ए-रंग-ओ-बू
घूमते पहियों धड़कती गाड़ियों की हिचकियाँ
दास्ताँ-दर-दास्ताँ उलझी हुई हैं चार-सू
दर्द से सह
में हुए ख़्वाबों के लाखों क़ाफ़िले
गामज़न हैं सू-ए-हसरत हौसले था
में हुए
मैं भी उन में तुम भी इन में सारी दुनिया उन में है
ख़ामुशी भी नग़्मगी भी अश्क-ओ-ख़ूँ भी उन में है
कुछ निगाहें अर्श पर हैं कुछ निगाहें फ़र्श पर
वक़्त आँधी की तरह
कर रहा है तेज़-तर इस सैल को
हम कहाँ हैं कौन सी मंज़िल पे हैं
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
Read Fullघूमते पहियों धड़कती गाड़ियों की हिचकियाँ
दास्ताँ-दर-दास्ताँ उलझी हुई हैं चार-सू
दर्द से सह
में हुए ख़्वाबों के लाखों क़ाफ़िले
गामज़न हैं सू-ए-हसरत हौसले था
में हुए
मैं भी उन में तुम भी इन में सारी दुनिया उन में है
ख़ामुशी भी नग़्मगी भी अश्क-ओ-ख़ूँ भी उन में है
कुछ निगाहें अर्श पर हैं कुछ निगाहें फ़र्श पर
वक़्त आँधी की तरह
कर रहा है तेज़-तर इस सैल को
हम कहाँ हैं कौन सी मंज़िल पे हैं
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
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मकाँ जल चुका है
खंडर है सियाही है बुझती हुई राख की सिसकियाँ हैं
खंडर है सियाही है बुझती हुई राख की सिसकियाँ हैं
मिरी आँख पुर-नम है
चुप-चाप गुम-सुम खड़ा हूँ यहाँ पर
मिरे आँसुओं में
तसावीर हैं
माज़ी-ओ-हाल की
वक़्त की मंज़िलों की
मिरे ज़ेहन में दास्ताँ है
ज़माने के बनने बिगड़ने की
तामीर-ओ-तख़रीब की धड़कनों की
मिरे कान में गूँजती हैं वो नर्म और शीरीं सदाएँ
जिन्हें आग ने इस मकान के खंडर में फ़ना कर दिया है
मोहब्बत की तक़्दीस
मा'सूम शम्ओं' के अश्कों की गर्मी
धोएँ की तड़पती हुई धारियाँ
उन का पैग़ाम बन कर
फ़ज़ाओं में शायद भटकने लगी हैं
मिरी आँख पुर-नम है फिर भी मैं ख़ुश हूँ
मिरे पास ख़्वाबों की मा'सूम ठंडक
इरादों के रौशन सितारों की नर्मी
तख़य्युल की बहती हुई नग़्मगी है
मैं यादों के मलबे पे तख़्लीक़ का फूल ले कर खड़ा हूँ
Read Fullचुप-चाप गुम-सुम खड़ा हूँ यहाँ पर
मिरे आँसुओं में
तसावीर हैं
माज़ी-ओ-हाल की
वक़्त की मंज़िलों की
मिरे ज़ेहन में दास्ताँ है
ज़माने के बनने बिगड़ने की
तामीर-ओ-तख़रीब की धड़कनों की
मिरे कान में गूँजती हैं वो नर्म और शीरीं सदाएँ
जिन्हें आग ने इस मकान के खंडर में फ़ना कर दिया है
मोहब्बत की तक़्दीस
मा'सूम शम्ओं' के अश्कों की गर्मी
धोएँ की तड़पती हुई धारियाँ
उन का पैग़ाम बन कर
फ़ज़ाओं में शायद भटकने लगी हैं
मिरी आँख पुर-नम है फिर भी मैं ख़ुश हूँ
मिरे पास ख़्वाबों की मा'सूम ठंडक
इरादों के रौशन सितारों की नर्मी
तख़य्युल की बहती हुई नग़्मगी है
मैं यादों के मलबे पे तख़्लीक़ का फूल ले कर खड़ा हूँ
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उस की हर शय से
पत्थर से दीवारों से
छोटी छोटी चीज़ों और किताबों से
मुतरन्निम आवाज़ों से
शोर मचाते हँसते-गाते
गाहे-गाहे लम्हा-भर को
चुप हो जाते
अपने अपने आसमाँ से
तन्हाई में
सुख और दुख की बातें करते लोगों से
नन्ही-मुन्नी सरगोशी में जादू भरती
गुड़िया से
रंग लुटाते उस के नट-खट गुड्डे से
तुम तो मेरे अपने थे
तुम ने ये क्या कर डाला
तुम ने अपने हाथ से
मेरी बरसों की मानूस लकीरें
दरहम-बरहम कर डालें
आवाज़ों की रागनियों की तस्वीरों की
रौशन आँखें
तुम तो मेरे अपने थे
तुम ने ये क्या कर डाला
Read Fullपत्थर से दीवारों से
छोटी छोटी चीज़ों और किताबों से
मुतरन्निम आवाज़ों से
शोर मचाते हँसते-गाते
गाहे-गाहे लम्हा-भर को
चुप हो जाते
अपने अपने आसमाँ से
तन्हाई में
सुख और दुख की बातें करते लोगों से
नन्ही-मुन्नी सरगोशी में जादू भरती
गुड़िया से
रंग लुटाते उस के नट-खट गुड्डे से
तुम तो मेरे अपने थे
तुम ने ये क्या कर डाला
तुम ने अपने हाथ से
मेरी बरसों की मानूस लकीरें
दरहम-बरहम कर डालें
आवाज़ों की रागनियों की तस्वीरों की
रौशन आँखें
तुम तो मेरे अपने थे
तुम ने ये क्या कर डाला
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जब कुत्ते रात को रोते हैं
तो अक्सर लोग समझते हैं
तो अक्सर लोग समझते हैं
कुछ ऐसा होने वाला है
जो हम ने अब तक सोचा था न ही समझा था
जो होना था वो कब का लेकिन हो भी चुका
ये शहर जला
इस शहर में रौशन हँसते बस्ते घर थे कई
सब राख हुए
और उन के मकीं
कुछ क़त्ल हुए
कुछ जान बचा कर भाग गए
जो बा-इस्मत थीं
रुस्वाई की ख़ाक ओढ़ के राह-गुज़र पर बैठी हैं
कुछ बेवा हैं
कुछ पा-बस्ता रिश्तों की वहशत सहती हैं
कुछ अध-नंगे भूके बच्चे
दिन भर आवारा फिरते हैं
हर जानिब मुजरिम ही मुजरिम
उन में से कुछ हैं पेशा-वर
कुछ सीख रहे हैं जुर्म के फ़न के राज़ नए असरार नए
जो होना था ये सच है उस में से तो बहुत कुछ हो भी चुका
लेकिन शायद कुछ और भी होने वाला है
कुत्ते तो आख़िर कुत्ते हैं
दिन भर कचरे के ढेरों पर
वो मारे मारे फिरते हैं
जब रात उतरने लगती हैं
आने वाले दुश्मन-मौसम की दहशत से
सब मिल कर रोने लगते हैं
Read Fullजो हम ने अब तक सोचा था न ही समझा था
जो होना था वो कब का लेकिन हो भी चुका
ये शहर जला
इस शहर में रौशन हँसते बस्ते घर थे कई
सब राख हुए
और उन के मकीं
कुछ क़त्ल हुए
कुछ जान बचा कर भाग गए
जो बा-इस्मत थीं
रुस्वाई की ख़ाक ओढ़ के राह-गुज़र पर बैठी हैं
कुछ बेवा हैं
कुछ पा-बस्ता रिश्तों की वहशत सहती हैं
कुछ अध-नंगे भूके बच्चे
दिन भर आवारा फिरते हैं
हर जानिब मुजरिम ही मुजरिम
उन में से कुछ हैं पेशा-वर
कुछ सीख रहे हैं जुर्म के फ़न के राज़ नए असरार नए
जो होना था ये सच है उस में से तो बहुत कुछ हो भी चुका
लेकिन शायद कुछ और भी होने वाला है
कुत्ते तो आख़िर कुत्ते हैं
दिन भर कचरे के ढेरों पर
वो मारे मारे फिरते हैं
जब रात उतरने लगती हैं
आने वाले दुश्मन-मौसम की दहशत से
सब मिल कर रोने लगते हैं
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शनाख़्त उस के नाम से थी
जिस्म की बहार से
जिस्म की बहार से
शनाख़्त आफ़्ताब से थी
ज़ुल्फ़-ए-आबशार से
शनाख़्त पैरहन से थी
ग़ज़ाल-ए-नूर-बार से
शनाख़्त उस के शबनमी
फ़िशार आतिशीं से थी
ज़मीन-दोज़ आसमाँ-सिफ़त ख़ुमार से
खुली हुई थी दूर दूर तक
तबस्सुमों की सुर्ख़ धूप
तेज़ रौशनी
तमाम शफ़क़तों की नर्म चाँदनी
मलाइक-ओ-नुजूम
आज सारे बे-मुराद हो गए
शनाख़्तें उजड़ गईं
सुलगते बाम-ओ-दर के दरमियाँ
शुमार हो रहे हैं सोख़्ता बुरीदा जिस्म
रेज़ा रेज़ा कुछ मकाँ
वो बे-शनाख़्त हो गई
वो ख़्वाब थी
वो इक हसीन नाम थी
वो नाम से बिछड़ गई
Read Fullज़ुल्फ़-ए-आबशार से
शनाख़्त पैरहन से थी
ग़ज़ाल-ए-नूर-बार से
शनाख़्त उस के शबनमी
फ़िशार आतिशीं से थी
ज़मीन-दोज़ आसमाँ-सिफ़त ख़ुमार से
खुली हुई थी दूर दूर तक
तबस्सुमों की सुर्ख़ धूप
तेज़ रौशनी
तमाम शफ़क़तों की नर्म चाँदनी
मलाइक-ओ-नुजूम
आज सारे बे-मुराद हो गए
शनाख़्तें उजड़ गईं
सुलगते बाम-ओ-दर के दरमियाँ
शुमार हो रहे हैं सोख़्ता बुरीदा जिस्म
रेज़ा रेज़ा कुछ मकाँ
वो बे-शनाख़्त हो गई
वो ख़्वाब थी
वो इक हसीन नाम थी
वो नाम से बिछड़ गई
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मुझ को वो बदनाम दुश्मन याद आता है
जो मेरे ख़ून का प्यासा गली से जब गुज़रता था
मिरे आ'साब में इक सनसनी सी दौड़ जाती थी
मैं इस लम्हे की बरहम आग में जलता हुआ
महसूस करता था
मैं ज़िंदा हूँ मुसलसल हूँ
मैं ज़िंदा हूँ मुसलसल हूँ
वो दुश्मन मर गया
या दोस्तों आ आ मिला
में सोचता हूँ पूछता हूँ
कौन बतलाएगा
मेरे फ़िक्र और एहसास की बे-सम्त रौ
बहती है रोज़-ओ-शब
दिसम्बर चीख़ता है अब
कहाँ मंज़िल कहाँ मंज़िल
Read Fullजो मेरे ख़ून का प्यासा गली से जब गुज़रता था
मिरे आ'साब में इक सनसनी सी दौड़ जाती थी
मैं इस लम्हे की बरहम आग में जलता हुआ
महसूस करता था
मैं ज़िंदा हूँ मुसलसल हूँ
मैं ज़िंदा हूँ मुसलसल हूँ
वो दुश्मन मर गया
या दोस्तों आ आ मिला
में सोचता हूँ पूछता हूँ
कौन बतलाएगा
मेरे फ़िक्र और एहसास की बे-सम्त रौ
बहती है रोज़-ओ-शब
दिसम्बर चीख़ता है अब
कहाँ मंज़िल कहाँ मंज़िल
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लाखों दुआएँ
ख़ूब-सूरत आरज़ुएँ
पेश करता हूँ
सबा मम्नून है
लेकिन ज़बाँ है
कुछ नहीं कहती
सबा अब रोज़ ओ शब
दीवार-ओ-दर तन पर सजाती है
अब आँचल छत का सर पर ओढ़ती है
लम्स-ए-फ़र्श-ए-मरमरीं से
पाँव की तज़ईन करती है
वो कोहसारों शगुफ़्ता वादियों झरनों
चमकते नील-गूँ आकाश के
नग़्में नहीं गाती
सबा अब लाला-ओ-गुल की तरफ़ शायद नहीं आती
सबा शबनम-अदा तस्वीर-ए-पा-बस्ता
दर-ए-रौज़न में आवेज़ां
हसीं नाज़ुक बदन
रौशन मुनव्वर साहिलों पर अब नहीं बहती
सबा लब खोलती है मुस्कुराती है
सबा सरगोशियों में
अब किसी से कुछ नहीं कहती
Read Fullख़ूब-सूरत आरज़ुएँ
पेश करता हूँ
सबा मम्नून है
लेकिन ज़बाँ है
कुछ नहीं कहती
सबा अब रोज़ ओ शब
दीवार-ओ-दर तन पर सजाती है
अब आँचल छत का सर पर ओढ़ती है
लम्स-ए-फ़र्श-ए-मरमरीं से
पाँव की तज़ईन करती है
वो कोहसारों शगुफ़्ता वादियों झरनों
चमकते नील-गूँ आकाश के
नग़्में नहीं गाती
सबा अब लाला-ओ-गुल की तरफ़ शायद नहीं आती
सबा शबनम-अदा तस्वीर-ए-पा-बस्ता
दर-ए-रौज़न में आवेज़ां
हसीं नाज़ुक बदन
रौशन मुनव्वर साहिलों पर अब नहीं बहती
सबा लब खोलती है मुस्कुराती है
सबा सरगोशियों में
अब किसी से कुछ नहीं कहती
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बारिशों में ग़ुस्ल करते सब्ज़ पेड़
धूप में बनते सँवरते सब्ज़ पेड़
धूप में बनते सँवरते सब्ज़ पेड़
किस क़दर तश्हीर-ए-ग़म से दूर था
चुपके चुपके आह भरते सब्ज़ पेड़
दूर तक रोती हुई ख़ामोशियाँ
रात के मंज़र से डरते सब्ज़ पेड़
दश्त में वो राह-रौ का ख़्वाब थे
घर में कैसे पाँव धरते सब्ज़ पेड़
दोस्तों की सल्तनत में दूर तक
दुश्मनों के ढोर चरते सब्ज़ पेड़
कर गए बे-मेहर मौसम के सुपुर्द
रफ़्ता रफ़्ता आज मरते सब्ज़ पेड़
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खोया खोया उदास सा होगा
तुम से वो शख़्स जब मिला होगा
तुम से वो शख़्स जब मिला होगा
क़ुर्ब का ज़िक्र जब चला होगा
दरमियाँ कोई फ़ासला होगा
रूह से रूह हो चुकी बद-ज़न
जिस्म से जिस्म कब जुदा होगा
फिर बुलाया है उस ने ख़त लिख कर
सामने कोई मसअला होगा
हर हिमाक़त पे सोचते थे हम
अक़्ल का और मरहला होगा
घर में सब लोग सो रहे होंगे
फूल आँगन में जल चुका होगा
कल की बातें करोगे जब लोगों
ख़ौफ़ सा दिल में रूनुमा होगा
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