Tahir Adeem

Top 10 of Tahir Adeem

    असीर-ए-बहर-ओ-बर कोई नहीं है
    जहाँ में मुख़्तसर कोई नहीं है

    है धड़का सा मिरे सीने में लेकिन
    दर-ए-उम्मीद पर कोई नहीं है

    मिरा साया सिमट आया है मुझ में
    मिरा अब हम-सफ़र कोई नहीं है

    हवादिस भी वहीं हम भी वहीं हैं
    मगर अब चश्म-ए-तर कोई नहीं है

    नज़र ही बाम पर मेरी नहीं या
    नज़र के बाम पर कोई नहीं है

    ब-जुज़ मेरे यहाँ मेरी वफ़ा का
    हवाला मो'तबर कोई नहीं है

    समझ कर सोच कर दिल में उतरना
    यहाँ बाहर को दर कोई नहीं है

    ख़िरद के लाख क़ासिद हैं तो होंगे
    जुनूँ का नामा-बर कोई नहीं है

    मुझे अपनाने वाले लोग 'ताहिर'
    बहुत से हैं मगर कोई नहीं है
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    वो नहीं यारो किसी भी बात में
    जीत कर भी जो मज़ा है मात में

    हर किसी के गिर्द लोगों का हुजूम
    हर कोई तन्हा है अपनी ज़ात में

    देखने वाले इन्हें पढ़ ग़ौर से
    एक इक दुनिया है इन ज़र्रात में

    खा गई अब तक ये कितने आफ़्ताब
    राज़ है मुज़्मर अजब इस रात में

    बे-गुनाहों के लहू की सुर्ख़ियाँ
    जा बजा बिखरी हैं अख़बारात में

    आओ काटें केक को इमसाल भी
    आँसुओं की इस भरी बरसात में

    बच के रहना हम से ऐ दश्त-ए-जुनूँ
    उस का साया है हमारे सात में

    सफ़ीरान-ए-ज़िया अब तुम कहो
    अब के सूरज है हमारे हात में

    बाब में उस के है 'ताहिर' आज भी
    एक सन्नाटा सा काएनात में
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    हिज्र की रा'नाई मुझ से छीन ली
    याद ने तन्हाई मुझ से छीन ली

    आँख खुलते ही तुम्हारी याद ने
    टूटती अँगड़ाई मुझ से छीन ली

    उस के होंटों की शफ़क़ ने आज फिर
    क़ुव्वत-ए-गोयाई मुझ से छीन ली

    हाथ में उस ने थमाया इक दिया
    और फिर बीनाई मुझ से छीन ली

    दिल में जीने की जो ख़्वाहिश थी कभी
    तू ने वो हरजाई मुझ से छीन ली

    दस्त-ए-दुनिया ने कभी तक़दीर ने
    चीज़ जो भी भाई मुझ से छीन ली

    इन मशीनों ने मशीनी दौर ने
    ख़ूबी-ओ-ज़ेबाई मुझ से छीन ली
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    जो तिरी बंदगी से मिलता है
    लुत्फ़ वो कम किसी से मिलता है

    है ये काफ़ी तिरा मिरा शजरा
    एक ही आदमी से मिलता है

    लाख बरहम हो वो मगर यारो
    फिर भी शाइस्तगी से मिलता है

    दिन को लगता है धूप उस का मिज़ाज
    रात को चाँदनी से मिलता है

    अब तो मुझ को वो मेरी रग रग में
    दौड़ती सनसनी से मिलता है

    हों मह-ओ-मेहर या नुजूम तमाम
    वो किसी न किसी से मिलता है

    लाख भटकूँ मैं ज़ुल्मतों में मिरा
    इक सिरा रौशनी से मिलता है

    क़ाबिल-ए-दीद रंग होते हैं
    जब कभी सादगी से मिलता है

    पहले मेरी ख़ुशी से मिलता था
    अब वो अपनी ख़ुशी से मिलता है

    शुक्र-सद-शुक्र कि मिरा ज़ाहिर
    हालत-ए-बातिनी से मिलता है

    जो मुझे मौजिब-ए-मसर्रत है
    दर्द भी तो उसी से मिलता है

    उस में हर रंग ऊद आया है
    वो मिरी शाइ'री से मिलता है

    गुलशन-ए-दिल में जब बहारें हों
    कौन फिर बेकली से मिलता है

    हिज्र में बे-सुकून रहता हूँ
    चैन भी हिज्र ही से मिलता है

    अब तो इस ज़िंदगी का हर लम्हा
    लम्हा-ए-आख़िरी से मिलता है

    देख कर ज़र्फ़ पास आता है
    दर्द कम ही किसी से मिलता है

    सिलसिला-हा-ए-वुसअ'त-ए-सहरा
    दिल की उस तिश्नगी से मिलता है

    जब से वो आँख के फ़्रेम में है
    जो है मिलता उसी से मिलता है

    मुहक़क़िक़ सुराग़-ए-क़त्ल मिरा
    आख़िरश ज़िंदगी से मिलता है

    रोज़ वो ढूँडते हैं 'ताहिर' को
    रोज़ उस की गली से मिलता है
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    चाँदनी का है बदन या है बदन में चाँदनी
    जब उतरता है उतरती है चमन में चाँदनी

    तीरगी जब पाँव फैलाए तो फिर सुनना उसे
    बाँध कर रखता है वो अपने सुख़न में चाँदनी

    जब भी लिखता हूँ क़लम से फूटती है रौशनी
    घोल दी है किस ने दश्त-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न में चाँदनी

    यार की शहर-ए-बुताँ में इक निशानी ये भी है
    चाँद सा चेहरा है उस का और मन में चाँदनी

    रौशनी के इस्तिआ'रे हैं कहानी में सभी
    नाम उस का है कहानी के मतन में चाँदनी

    वो सँवरता जा रहा है सामने 'ताहिर-अदीम'
    और बरसती जा रही है दिल के बन में चाँदनी
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    तेरी चाहत में मर के देखूँगा
    काम ये भी मैं कर के देखूँगा

    छीन सकता है कौन मुझ से तुझे
    जाँ हथेली पे धर के देखूँगा

    ग़ैर मुमकिन है चाँद को लाना
    फिर भी कोशिश मैं कर के देखूँगा

    तेरी आँखों में ख़ुद को पाऊँगा
    रुख़ पे तेरे सँवर के देखूँगा

    रख के आँखों में हिज्र को तेरे
    फिर तसव्वुर में डर के देखूँगा

    बन के 'ताहिर' मैं प्यार की ख़ुशबू
    गिर्द तेरे बिखर के देखूँगा
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    बिला जवाज़ नहीं है ग़ुरूर आँखों में
    बसा हुआ है कोई तो ज़रूर आँखों में

    तसल्लियों का चराग़ाँ शफ़ीक़ होंटों पर
    मोहब्बतों की अनोखी सुतूर आँखों में

    वज़ू-ए-दीद जुदाई में भी मुयस्सर है
    हैं गरचे दूर मगर हैं हुज़ूर आँखों में

    कि रात दूधिया चादर में ख़्वाब लिपटे थे
    तमाम दिन था रहा उस का नूर आँखों में

    रुके हुए किसी सैलाब की सफ़ारत को
    किया है अश्क ने फिर से ज़ुहूर आँखों में

    जिया है दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ हद-ए-मुअ'य्यन में
    किया है आँख का दरिया उबूर आँखों में

    ख़ुमार-ए-दर्द में 'ताहिर-अदीम' सब मसरूर
    हैं मस्तियाँ सी सरों में सुरूर आँखों में
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    कहीं दीवार है तो दर ग़ाएब
    और कहीं पर हमारा घर ग़ाएब

    हम-सफ़र है कहीं सफ़र ग़ाएब
    है सफ़र गर तो हम-सफ़र ग़ाएब

    ऐ ख़ुदा कौन सा तिलिस्म है ये
    जिस्म मौजूद हैं ये सर ग़ाएब

    शौक़-ए-परवाज़ है सभी में मगर
    ताइरान-ए-चमन के पर ग़ाएब

    आसमाँ भी नहीं रहा सर पर
    उस पे पाँव से है सफ़र ग़ाएब

    मैं भी बै'अत करूँ ब-दस्त-ए-हुनर
    दर्द-ए-दिल को जिगर से कर ग़ाएब

    मुझ पे पड़ती नहीं कोई भी नज़र
    मैं भी महफ़िल में हूँ मगर ग़ाएब

    तुम रहो आँख में तो बेहतर है
    दूर हों गर तो बहर-ओ-बर ग़ाएब

    या तो मौजूद ही नहीं वो रहा
    या कोई आँख से नज़र ग़ाएब
    इश्क़ के बाम पर वो है मौजूद
    कासा-ए-शाम से क़मर ग़ाएब

    क़हत कैसा पड़ा है अब के बरस
    दस्त-ए-फ़न-कार से हुनर ग़ाएब

    सामने मंज़िलें सभी मादूम
    मुड़ के देखूँ तो चारा-गर ग़ाएब

    ज़ख़्म 'ताहिर-अदीम' कैसे भरे
    हर दवा से हुआ असर ग़ाएब
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    आँखों में है कैसा पानी बंद है क्यूँ आवाज़
    अपने दिल से पूछो जानाँ मेरी चुप का राज़

    उस के ज़ख़्म को सहना रहना उस में ही महसूर
    उस के ज़ुल्म पे हँस कर कहना तेरी उम्र दराज़

    तेरी मर्ज़ी ख़ुशियों के या छेड़ ग़मों के राग
    तू मेरी सुर-ताल का मालिक मैं हूँ तेरा साज़

    दिल की हर धड़कन का मौजिब दीद शुनीद तिरी
    सीने में जलती साँसों का तू ही एक जवाज़

    और सी और हुआ है साजन ज़ीस्त का हर मफ़्हूम
    और सी और हुई है मेरी सोचों की परवाज़

    तुझ बिन कौन बनेगा ख़ाली आँखें गुंग सदा
    तुझ बिन जान करेगा 'ताहिर' किस से राज़ नियाज़
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    मुझे वो छोड़ कर जब से गया है इंतिहा है
    रग-ओ-पय में फ़ज़ा-ए-कर्बला है इंतिहा है

    मिरे हालात हैं नाराज़ इस पे क्या करूँ मैं
    गुरेज़ाँ आसमानों से दुआ है इंतिहा है

    ग़म ओ आलाम हैं या हसरतें हैं ज़िंदगी में
    तुम्हारे बा'द बाक़ी क्या बचा है इंतिहा है

    फ़क़त तुम ही नहीं नाराज़ मुझ से जान-ए-जानाँ
    मिरे अंदर का इंसाँ तक ख़फ़ा है इंतिहा है

    कहीं मंज़र असालीब-ए-हवस के चार-सू हैं
    कहीं पे ख़ून-आलूदा फ़ज़ा है इंतिहा है

    ख़मोशी तोड़ दे ऐ ख़ालिक़-ए-अर्ज़-ओ-समा अब
    तिरी मख़्लूक़ बन बैठी ख़ुदा है इंतिहा है

    ग़ज़ल जो तुम पे 'ताहिर' ने लिखी थी जान-ए-'ताहिर'
    वही तो ज़ीनत-ए-बाम-ए-बक़ा है इंतिहा है
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