इस की बुनियाद अगर ज़ोहद ने डाली होती
दीन की तरह ये दुनिया भी ख़याली होती
अंजुमन दाग़-ए-जिगर की मुतहम्मिल न हुई
काश हम ने भी कोई शम्अ'' जला ली होती
सच तो ये है कहा गर जुर्म न साबित होता
हम ने ख़ुद माँग के जीने की सज़ा ली होती
आज इस मोड़ पे हम हैं कि अगर बस चलता
लौट जाने की कोई राह निकाली होती
तुम ने क़ानून में तरमीम की ज़हमत क्यूँ की
हम ने ख़ुद क़ैद की मीआ'द बढ़ा ली होती
वुसअ'त-ए-शौक़ ने रक्खा न कहीं का हम को
वर्ना हर दिल में जगह अपनी बना ली होती
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तू भी न बची होगी ऐ आफ़ियत-अंदेशी
हर सम्त से जब पत्थर बरसाए गए होंगे
फिर उस ने मसाइल का हल ढूँड लिया होगा
फिर लोग मसाइल में उलझाए गए होंगे
हम गुज़रे कि तुम गुज़रे ये देखने कौन आता
थे जितने तमाशाई सब लाए गए होंगे
यारान-ए-क़दह से कुछ लग़्ज़िश भी हुई होगी
दानिस्ता भी कुछ साग़र छलकाए गए होंगे
'अफ़ज़ल' का मुक़द्दर है हक़-गोई-ओ-रुसवाई
सच बात कही होगी झुटलाए गए होंगे
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आँगन आँगन ख़ाना-ख़राबी हँसती है में'मारों पर
पत्थर की छत ढाल रहे हैं शीशे की दीवारों पर
पत्थर की छत ढाल रहे हैं शीशे की दीवारों पर
ज़ख़्म लगे तो बस ये जानो चोट पड़ी नक़्क़ारों पर
आज लगा दो जान की बाज़ी टूट पड़ो तलवारों पर
अहल-ए-जुनूँ की लाला-कारी मौसम की पाबंद नहीं
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में फूल खुले हैं ज़िंदाँ की दीवारों पर
दिल के उफ़ुक़ से टूट गए हैं कितने सूरज कितने चाँद
टपके हैं दो-चार सितारे जब तेरे रुख़्सारों पर
कहते हैं ख़ुश-क़ामत किस को देख निकल कर गुलशन से
कैसे कैसे सर्व-ए-रा'ना चलते हैं अंगारों पर
इस साहिल पर नाव पड़ी है उस साहिल पर माँझी है
बीच नदी में तैरती लाशो पुल बन जाओ धारों पर
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आग़ोश-ए-कमाँ अब तक अफ़्कार का ख़ाली है
तुम अपनी निगाहों के कुछ तीर हमें दे दो
क्या तोल रहे हो तुम हाथों में ख़िरद-मंदो
ज़ेवर ये जुनूँ का है ज़ंजीर हमें दे दो
ऐ ख़ाली कटोरों के बे-कैफ़ निगहबानों
मय-ख़ाना हमारी है जागीर हमें दे दो
तुम तो न झुका पाए गर्दन दिल-ए-सरकश की
ऐ अहल-ए-सितम लाओ शमशीर हमें दे दो
आशुफ़्ता लकीरें हैं तहरीर की नौ-मश्क़ी
लिख लेंगे हमीं लौह-ए-तक़दीर हमें दे दो
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अपने बहके हुए दामन की ख़बर ली न गई
जिस को देखो चराग़ों से ख़फ़ा लगता है
बाग़ का फूल नहीं लाला-ए-सहरा हूँ मैं
लू का झोंका भी मुझे बाद-ए-सबा लगता है
तंगी-ए-ज़र्फ़-ए-नज़र कसरत-ए-नज़्ज़ारा-ए-दहर
प्यास कच्ची हो तो हर जाम भरा लगता है
किस तकल्लुफ़ से गिरह खोल रहा हूँ दिल की
उक़्दा-ए-दर्द तिरा बंद-ए-क़बा लगता है
ख़ार-ज़ारों को सिखा दे न गुलिस्ताँ का चलन
ये मुसाफ़िर तो कोई आबला-पा लगता है
देख तू रौज़न-ए-ज़िंदाँ से ज़रा सू-ए-चमन
आज क्यूँ दिल का हर इक ज़ख़्म हरा लगता है
कौन 'अफ़ज़ल' के सिवा ऐसी ग़ज़ल छेड़ेगा
दोस्तो ये वही आशुफ़्ता-नवा लगता है
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नद्दी नद्दी रन पड़ते हैं जब से नाव उतारी है
तूफ़ानों के कस-बल देखे अब मल्लाह की बारी है
तूफ़ानों के कस-बल देखे अब मल्लाह की बारी है
नींद रगों में दौड़ रही है पोर पोर बेदारी है
जिस्म बहुत हस्सास है लेकिन दिल जज़्बात से आरी है
आवाज़ों के पैकर ज़ख़्मी लफ़्ज़ों के बुत लहू-लुहान
करते हैं इज़हार-ए-तफ़न्नुन कहते हैं फ़नकारी है
मंज़िल मंज़िल पाँव जमा कर हम भी चले थे हम-सफ़रो
उखड़ी उखड़ी चाल का बाइ'से राह की ना-हमवारी है
आँख थकन ने खोली है या अज़्म-ए-सफ़र ने करवट ली
पर फैला कर बैठोगे या उड़ने की तय्यारी है
सच कहते हो नीव में इस की टेढ़ी कोई ईंट नहीं
आड़ी-तिरछी छत का बाइ'से घर की कज-दीवारी है
क्या कहिए क्यूँ आज सरों से ज़ख़्मों का बोझ उठ न सका
पत्थर थे लेकिन हल्के थे फूल है लेकिन भारी है
बस्ती बस्ती क़र्या क़र्या कोसों आँगन है न मुंडेर
ज़ेहन ख़राबा दिल वीराना घर आ'साब पे तारी है
एक दिया और इतना रौशन जैसे दहकता सूरज हो
कहने वाले सच कहते हैं रात बहुत अँधियारी है
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जाम खनके तो सँभाला न गया दिल तुम से
है अभी दूर बहुत ज़ब्त की मंज़िल तुम से
है अभी दूर बहुत ज़ब्त की मंज़िल तुम से
हम तो दरिया में बहुत दूर निकल आए हैं
लौट जाओ अभी नज़दीक है साहिल तुम से
जुस्तुजू सरहद-ए-इदराक से आगे न बढ़ी
दो-क़दम तय न हुआ मरहला-ए-दिल तुम से
ख़ल्वत-ए-शौक़ के दर बंद किए लेता हूँ
अब शिकायत न करेगी कोई महफ़िल तुम से
सख़्त-जानी मिरी आसूदा-ए-ख़ंजर तो न थी
क्यूँ निकाला गया हौसला-ए-दिल तुम से
तुम तो नग़्मों की फ़सीलों पे बहुत नाज़ाँ थे
क्यूँ दबाया न गया शोर-ए-सलासिल तुम से
धड़कनों को नज़र-अंदाज़ किए जाते हो
फिर न कहना कि मुख़ातब न हुआ दिल तुम से
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चलो कुछ तो राह तय हो न चले तो भूल होगी
अभी बंद हर गली है जो खुलेगी तूल होगी
अभी बंद हर गली है जो खुलेगी तूल होगी
तिरे हुस्न की वदीअत मिरी जुरअत-ए-नज़ारा
तिरे रू-ब-रू झुकेगी तो नज़र की भूल होगी
मिरे हम-सफ़र बढ़ेंगे मुझे रास्ता बता कर
मिरे पाँव से उड़ी है मिरे सर पे धूल होगी
मुझे क़िबला-रू बिठा कर मिरे हाथ उठाने वालो
ये यक़ीन भी दिला दो कि दुआ क़ुबूल होगी
चलो मान लें ये दोनों कोई शय है मस्लहत भी
न सितम का दिल दुखेगा न वफ़ा मलूल होगी
तिरा फ़न-ए-क़िस्सा-गोई अभी दार तक ही पहुँचा
मिरे शौक़ की कहानी अभी और तूल होगी
वो लहू की धार 'अफ़ज़ल' जो है क़र्ज़ ख़ंजरों पर
न करेंगे हम तक़ाज़ा न कभी वसूल होगी
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उजाले तेल छिड़कने लगे उजालों पर
अजीब वक़्त पड़ा है चराग़ वालों पर
अजीब वक़्त पड़ा है चराग़ वालों पर
तुम्हारा आलम-ए-मस्ती ढका-छुपा ही सही
मिरी निगाह है टूटे हुए प्यालों पर
तुम्हारे ज़ेहन में जो आज चुभ रहे होंगे
मैं कल से सोच रहा हूँ उन्हीं सवालों पर
न उठ सका तिरे तर्ज़-ए-ख़िराम से पर्दा
हवाएँ डाल गईं ख़ाक पाएमालों पर
मुहाकमा न करें आप अपनी बातों का
ये काम छोड़ दिया जाए सुनने वालों पर
मुसल्लिमात से क्यूँ क़स्द-ए-इंहिराफ़ क्या
अक़ीदे टूट पड़े हैं मिरे सवालों पर
ये क्या ज़रूर कि रुख़ सब का एक जानिब हो
फ़ज़ा की क़ैद लगाओ न उड़ने वालों पर
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ये शहर ये ख़्वाबों का समुंदर न बचेगा
जब आग लगेगी तो कोई घर न बचेगा
जब आग लगेगी तो कोई घर न बचेगा
या नक़्श उभारो कोई या अक्स को पूजो
शीशे को बचाओगे तो पत्थर न बचेगा
एहसास-ए-रक़ाबत से जबीनों को बचाओ
टकराएँगे सज्दे तो कोई दर न बचेगा
ऐ नींद छुपे रहने दे दो-चार नज़ारे
जब आँख खुलेगी कोई मंज़र न बचेगा
मक़्तल की सियासत न हमारी न तुम्हारी
तफ़रीक़ करोगे तो कोई सर न बचेगा
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