Ghazal Collection

मिरे महबूब मुझको अब मोहब्बत का सिला देना
तिरा ख़ुल्द-ए-अदन सा दिल मुझे तो कामिला देना

मोहब्बत जिस्म की मोहताज हो जाए नहीं सोचा
अभी ये सोच आई है लबों से लब मिला देना

गुलों को भी महक तेरे बदन से उन को मिलती है
मुझे ख़ुशबू भरे इस ख़ुश-बदन को तू दिला देना

बदन तेरा ये लज़्ज़त-आफ़रीं पर है बड़ा क़ातिल
मुझे मंजूर है मरना बग़ल में गुल खिला देना

बहारें आश्ना तेरी लिपट जाए बदन तेरे
मुझे भी साथ लिपटाना बता बस मुब्तिला देना

तिरी साँसें बिखर कर मनचला कर दे नशे में यूँ
तमन्ना-ए-दिल-ओ-जाँ के नशे का सिलसिला देना

हुआ था आश्ना 'अर्जुन' दिवाना हो गया है अब
ये जिस्म-ओ-जाँ तू दे या ज़हर का प्याला पिला देना
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arjun chamoli
तुमने हमें भी साथ निभाने नहीं दिया
दिल में किसी भी ग़ैर को आने नहीं दिया

हम पर है ज़िंदगी ने किया ज़ुल्म इस क़दर
रोने दिया तो शोर मचाने नहीं दिया

इक बार हमने दर्द को दिल में पनाह दी
और ज़िंदगी से फिर कभी जाने नहीं दिया

दुश्वारियों के ख़ौफ़ से जीने का मन न था
मजबूरियों ने ज़हर भी खाने नहीं दिया

दौलत पे अपनी कल बड़ा इतरा रहे थे जो
कुछ भी ख़ुदा ने साथ में लाने नहीं दिया

ख़ुद अपनी ख़्वाहिशात की पर्वा किए बग़ैर
काँटों को तेरी राह में आने नहीं दिया

आँखें न भूल जाऍं कहीं अपनी हैसियत
सो इनको तेरा ख़्वाब सजाने नहीं दिया

दुनिया में इल्म लोग हैं दो क़िस्म के मगर
ख़ुद को किसी भी क़िस्म में आने नहीं दिया
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Adesh Rathore
धड़कता ही नहीं है अब हमारा दिल उसे कहना
अभी भी जी रहा है पर तेरा "काबिल" उसे कहना

निखारी है बहुत अच्छे से मेरी शायरी उसने
नहीं सजती है मेरे बिन कोई महफ़िल उसे कहना

बहुत मज़बूत मैंने कर लिया है धोखे खा खा कर
नहीं टूटेगा अब ख़ंजर से भी ये दिल उसे कहना

बिना मतलब ही डरते थे हम उससे दूर होने से
नहीं है उसके बिन ये ज़िन्दगी मुश्किल उसे कहना

समय से नींद आ जाती है हमको कुछ दिनों से अब
नहीं करते सितारे रात में झिलमिल उसे कहना

हमारे साथ था जब तक भरे थे उसके बिल हमने
नया महबूब भरता है हमारे बिल उसे कहना

कहीं गर वो दिखे तुमको तो बस ये काम कर देना
मरा तो ख़ुद हूॅं मैं लेकिन मेरा क़ातिल उसे कहना

नया महबूब उसको मिल गया है तुमसे भी अच्छा
बहुत अच्छे से रहता है तेरा "काबिल" उसे कहना
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Raja Singh 'Kaabil'
जो बे-वफ़ा को बे-वफ़ा है मानता
क़ीमत वफ़ा की बस वही है जानता

वो यार है मेरा मुझे जो आज-कल
पहचान करके भी नहीं पहचानता

तुम बोल भी सकते नहीं आगे मिरे
तुमको अगर अपना नहीं मैं मानता

मैं रात भर रोता रहा जिसके लिए
क्या वो नहीं जज़्बात मेरे जानता

मैंने दिखावे की नहीं जी ज़िंदगी
वर्ना सड़क की ख़ाक मैं भी छानता

सच बोलने वाला कहीं मिलता नहीं
इस बात को हर आदमी है जानता

अब झूठ को ही पूजते हैं लोग सब
मैं भी इसे पूजूँ नहीं मन मानता

मैं जीत सकता था मगर जीता नहीं
किसको गिरा कर जीतने की ठानता

मुझसे बड़ा पापी नहीं होगा यहाँ
मैं तीर भाई पर अगर हूँ तानता

अब आज से ये ज़िंदगी तेरी हुई
'सागर' तुझे अपना सगा है मानता
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Saagar Singh Rajput
वो बे-वफ़ा थी वो बे-वफ़ा है
सबसे बड़ी ये उसकी ख़ता है

दिल तोड़ कर वो ख़ुश है रहे ख़ुश
मेरी तरफ़ से उस को दुआ है

धोखा उसे भी दे जाए कोई
उसके लिए मेरी बद्दुआ है

उसका नहीं हो कोई जहाँ में
उसके लिए बस ये ही सज़ा है

हालात मेरे अच्छे नहीं हैं
ये दुश्मनों को कैसे पता है

उसको दिया है सम्मान मैं ने
सम्मान जिससे मुझको मिला है

जो बा-वफ़ा है आशिक़ जहाँ में
हर बे-वफ़ा उससे ही ख़फ़ा है

सब लोग समझो आए समझ तो
मिल कर रहो इसमें ही भला है

मेरा नहीं है कोई जहाँ में
शायद वफ़ा की ये ही सज़ा है

मेरा नमन वो स्वीकार कर लें
जिनके दिलों में सच में दया है

है पूजने के क़ाबिल वही दिल
मेरे बराबर जो दिल जला है

कोई दिवाना है क्यूँ दिवाना
कोई दिवाने से पूछता है

मैं हूँ सिटी में पर गाँव मेरा
अब रात दिन रस्ता देखता है

मिल कर रहो सब वरना जहाँ में
है कौन कब तक किस को पता है

'सागर' तिरा बस तेरा रहेगा
'सागर' तिरा बस तुझको मिला है
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Saagar Singh Rajput

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