न निकला मुँह से कुछ निकली न कुछ भी क़ल्ब-ए-मुज़्तर की
    किसी के सामने मैं बन गया तस्वीर पत्थर की

    ख़ुदा से क्यूँ न माँगूँ वाह मैं बंदों से क्या माँगूँ
    मुझे मिल जाएगी जो चीज़ है मेरे मुक़द्दर की

    तसव्वुर चाहिए ऐ शैख़ सब का एक ईमा है
    सदा है पर्दा-ए-नाक़ूस में अल्लाहु-अकबर की

    दिल-ए-राहत-तलब को क़ब्र में क्या बे-क़रारी है
    मुझे घबराए देती है उदासी इस नए घर की

    कलेजे में हज़ारों दाग़ दिल में हसरतें लाखों
    कमाई ले चला हूँ साथ अपने ज़िंदगी भर की

    सँभल कर देखना आराइशों के बा'द आईना
    ये आईना नहीं है अब ये टुकड़े है बराबर की

    मिरे अश'आर 'शाइ'र' दाग़ ओ आसिफ़ जाह से पूछो
    कि शाहजौहरी ही जानते हैं क़द्र गौहर की
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    शाइर-ए-रंगीं फ़साना हो गया
    शे'र बुलबुल का तराना हो गया

    इस क़दर नक़्शे उतारे यार ने
    ये जहाँ तस्वीर-ख़ाना हो गया

    वो चमन की याद ने मुज़्तर क्या
    ज़हर मुझ को आब-ओ-दाना हो गया

    आँख से टपकी जो आँसू की लड़ी
    क़ाफ़िला ग़म का रवाना हो गया

    जान लेने आए थे 'शाइ'र' वही
    मौत का तो इक बहाना हो गया
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    ये कैसे बाल खोले आए क्यूँ सूरत बनी ग़म की
    तुम्हारे दुश्मनों को क्या पड़ी थी मेरे मातम की

    शिकायत किस से कीजे हाए क्या उल्टा ज़माना है
    बढ़ाया प्यार जब हम ने मोहब्बत यार ने कम की

    जिगर में दर्द है दिल मुज़्तरिब है जान बे कल है
    मुझे इस बे-ख़ुदी में भी ख़बर है अपने आलम की

    नहीं मिलते न मिलिए ख़ैर कोई मर न जाएगा
    ख़ुदा का शुक्र है पहले मोहब्बत आप ने कम की

    अदू जिस तरह तुम को देखता है हम समझते हैं
    छुपाओ लाख तुम छुपती नहीं है आँख महरम की

    मज़ा इस में ही मिलता है नमक छिड़को नमक छिड़को
    क़सम ले लो नहीं आदत मिरे ज़ख़्मों को मरहम की

    कहाँ जाना है थम-थम कर चलो ऐसी भी किया जल्दी
    तुम ही तुम हो ख़ुदा रक्खे नज़र पड़ती है आलम की

    कोई ऐसा हो आईना कि जिस में तू नज़र आए
    ज़माने भर का झूटा क्या हक़ीक़त साग़र-ए-जम की

    घटाएँ देख कर बे-ताब है बेचैन है 'शाइ'र'
    तिरे क़ुर्बानमुतरिब सुना दे कोई मौसम की
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    चलेगा नहीं मुझ पे फ़ुक़रा तुम्हारा
    हटा लो कि ख़ंजर है झूटा तुम्हारा

    मनाएँ तो अब जान दे कर मनाएँ
    क़यामत है ये रूठ जाना तुम्हारा

    बड़े सीधे सादे बड़े भूले भाले
    कोई देखे इस वक़्त चेहरा तुम्हारा

    बचा है जो साग़र में क्यूँ फेंकते हो
    हमें दे दो हम पी लें झूटा तुम्हारा

    ये क्या है सबब आज चुप चुप हो प्यारे
    बताओ तो क्यूँ जी है कैसा तुम्हारा

    उठाने पड़े ख़ाक से दल के टुकड़े
    बड़ा प्यार था प्यार देखा तुम्हारा

    ख़ुदा के लिए हाँ नहीं कुछ तो कह दो
    कि मुँह तक रही है तमन्ना तुम्हारा

    इलाज उस के बीमार का तुम करोगे
    कहीं दिल चला है मसीहा तुम्हारा

    चला 'शाएर' ज़ार तस्लीम लीजिए
    भला हो भला मेरे दाता तुम्हारा
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    लाख लाख एहसान जिस ने दर्द पैदा कर दिया
    जिस ने इस दिल को हथेली का फफूला कर दिया

    देखना मग़रिब की जानिब ये शफ़क़ का फूलना
    डूबते सूरज ने सोने में सुहागा कर दिया

    ज़िंदगी और मौत में इक उम्र से थी कशमकश
    वक़्त पर दो हिचकियों ने पाक झगड़ा कर दिया

    इक शरारा सा क़रीब-ए-शम्अ जा कर मिल गया
    आतिश-ए-परवाना ने शो'ले को दूना कर दिया

    बुलबुल-ए-तस्वीर हूँ अब बोलना है नागवार
    तेरी इस हंगामा आराई ने चुपका कर दिया

    इस को कहते हैं लगी परवाने जल बुझ डूब मर
    रोते रोते शम्अ' ने आख़िर सवेरा कर दिया

    दे दिया आँखें लड़ा कर इस परी-पैकर ने जाम
    मैं नशे में चूर था ही और अंधा कर दिया

    क्या गिरामी हस्तियाँ हैं हज़रत-ए-'उस्मान'-ओ-'शाद'
    'शाइ'र' इन दोनों ने दुनिया में उजाला कर दिया
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    बहार आई है फिर चमन में नसीम इठला के चल रही है
    हर एक ग़ुंचा चटक रहा है गुलों की रंगत बदल रही है

    वो आ गए लो वो जी उठा मैं अदू की उम्मीद-ए-यास ठहरी
    अजब तमाशा है दिल-लगी है क़ज़ा खड़ी हाथ मल रही है

    बताओ दिल दूँ न दूँ कहो तो अजीब नाज़ुक मोआ'मला है
    इधर तो देखो नज़र मिलाओ ये किस की शोख़ी मचल रही है

    तड़प रहा हूँ यहाँ मैं तन्हा वहाँ अदू से वो हम-बग़ल हैं
    किसी के दम पर बनी हुई है किसी की हसरत निकल रही है

    घटा वो छाई वो अब्र उट्ठा यही तो है वक़्त मय-कशी का
    बुलाओ 'शाइ'र' को है कहाँ वो शराब शीशे से ढल रही है
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    गिरी गिर कर उठी पलटी तो जो कुछ था उठा लाई
    नज़र क्या कीमिया थी रंग चेहरों से उड़ा लाई

    ख़ुदा के वास्ते सफ़्फ़ाकियाँ ये किस से सीखी हैं
    नज़र से प्यार माँगा था वो इक ख़ंजर उठा लाई

    हसरत ही निकलती है न दिल को आग लगती है
    मिरी हस्ती मिरे दामन में क्या काँटा लगा लाई

    वो सब बदमस्तियाँ थीं ज़र की अब ज़र है न पीते हैं
    हमारी मुफ़्लिसी ख़ुद राह पर हम को लगा लाई

    मिटाने को हमारे ये ज़मीन-ओ-आसमाँ दोनों
    हमेशा मिल के चलते हैं ब-ईं पस्ती-ओ-बालाई

    जो कुछ देखा न देखा जो सुनी वो अन-सुनी 'शाइ'र'
    न आए हम यहाँ ये ज़िंदगी मुफ़्त-ए-ख़ुदा लाई
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    Agha Shayar Qazalbash
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    बुतों के वास्ते तो दीन-ओ-ईमाँ बेच डाले हैं
    ये वो माशूक़ हैं जो हम ने काबे से निकाले हैं

    वो दीवाना हूँ जिस ने कोहसहरा छान डाले हैं
    उन्हीं तलवों से तो टूटे हुए काँटे निकाले हैं

    तराशी हैं वो बातें उस सितमगर ने सर-ए-महफ़िल
    कलेजे से हज़ारों तीर चुन चुन कर निकाले हैं

    जिगर दिल के वरक़ हैं वादा-ए-दीदार से रौशन
    उन्हें क्यूँ दूँ किसी को ये तो जन्नत के क़बाले हैं

    अगर मुँह से कहा कुछ तो बिखर ही जाएँगे टुकड़े
    बड़ी मुश्किल से हम टूटे हुए दिल को सँभाले हैं

    हमीं हैं मोजिद-ए-बाब-ए-फ़साहत हज़रत-ए-'शाइ'र'
    ज़माना सीखता है हम से हम वो दिल्ली वाले हैं
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    मुझ को आता है तयम्मुमवज़ू आता है
    सज्दा कर लेता हूँ जब सामने तू आता है

    यूँ तो शिकवा भी हमें आईना-रू आता है
    होंट सिल जाते हैं जब सामने तू आता है

    हाथ धोए हुए हूँ नेस्ती-ओ-हस्ती से
    शैख़ क्या पूछता है मुझ से वज़ू आता है

    मिन्नतें करती है शोख़ी कि मना लूँ तुझ को
    जब मिरे सामने रूठा हुआ तू आता है

    पूछते क्या हो तमन्नाओं की हालत क्या है
    साँस के साथ अब अश्कों में लहू आता है

    यार का घर कोई का'बा तो नहीं है 'शाइ'र'
    हाए कम-बख़्त यहीं मरने को तू आता है
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    रोने से जो भड़ास थी दिल की निकल गई
    आँसू बहाए चार तबीअत सँभल गई

    मैं ने तरस तरस के गुज़ारी है सारी उम्र
    मेरी न होगी जान जो हसरत निकल गई

    बेचैन हूँ मैं जब से नहीं दिल-लगी कहीं
    वो दर्द क्या गया कि मिरे दिल की कल गई

    कहता है चारा-गर कि न पाएगा इंदिमाल
    अच्छा हुआ कि ज़ख़्म की सूरत बदल गई

    ऐ शम्अ' हम से सोज़-ए-मोहब्बत के ज़ब्त सीख
    कम-बख़्त एक रात में सारी पिघल गई

    शाख़-ए-निहाल-ए-उम्र हमारी न फल सकी
    ये तो है वो कली जो निकलते ही जल गई

    देखा जो उस ने प्यार से अग़्यार की तरफ़
    'शाइ'र' क़सम ख़ुदा की मिरी जान जल गई
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