जो पलकों पर मिरी ठहरा हुआ है
वो आँसू ख़ून में डूबा हुआ है
वो आँसू ख़ून में डूबा हुआ है
फ़रिश्ते ख़्वान ले कर आ रहे हैं
सहीफ़ा ताक़ में रक्खा हुआ है
कोई अनहोनी शायद हो गई फिर
ग़ुबार-ए-कारवाँ ठहरा हुआ है
किसी की ख़्वाहिशें पा-बस्ता कर के
ये कब सोचा हरम रुस्वा हुआ है
वो इक लम्हा जो तेरे वस्ल का था
बयाज़-ए-हिज्र पर लिक्खा हुआ है
मुझे भी हो गया इरफ़ान-ए-ज़ात अब
मुक़ाबिल आइना रक्खा हुआ है
अयादत करने सब आए हैं 'अख़्तर'
तिरा चेहरा मगर उतरा हुआ है
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जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
चलो अहल-ए-जुनूँ के साथ हो लें
यहाँ अहल-ए-ख़िरद सस्ते बहुत हैं
मिरी बे-चेहरगी पर हँसने वालो
तुम्हारे आइने धुँदले बहुत हैं
ज़रा यादों के ही पत्थर उछालो
नवाह-ए-जाँ में सन्नाटे बहुत हैं
तिरी बाला-क़दी बदनाम होगी
यहाँ के बाम-ओ-दर नीचे बहुत हैं
शजर बे-साया हैं सूरज बरहना
मगर हम अज़्म के पक्के बहुत हैं
करो अब फ़त्ह का एलान 'अख़्तर'
सरों से सुर्ख़-रू नेज़े बहुत हैं
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दिल बहलने के वसीले दे गया वो
अपनी यादों के खिलौने दे गया वो
अपनी यादों के खिलौने दे गया वो
हम-सुख़न तन्हाइयों में कोई तो हो
सूने सूने से दरीचे दे गया वो
ले गया मेरी ख़ुदी मेरी अना भी
ऐ जबीन-ए-शौक़ सज्दे दे गया वो
रंज-ओ-ग़म सहने की आदत हो गई है
ज़िंदा रहने के सलीक़े दे गया वो
मेरी हिम्मत जानता था इस लिए भी
डूबने वाले सफ़ीने दे गया वो
ज़िंदगी भर जोड़ते रहना है इन को
टूटी ज़ंजीरों से रिश्ते दे गया वो
ज़र-फ़िशाँ हर लफ़्ज़ ज़र्रीं हर वरक़ है
'अख़्तर' ऐसे कुछ सहीफ़े दे गया वो
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कोई मंज़र नहीं बरसात के मौसम में भी
उस की ज़ुल्फ़ों से फिसलती हुई धूपों जैसा
आबलों की तरह रहने न दिया अश्कों को
मेरी पलकों ने किया काम बबूलों जैसा
संग-दिल है न फ़रेबी न जफ़ाकार है वो
मेरा महबूब है मा'सूम फ़रिश्तों जैसा
मैं तो इंसान हूँ तुम जैसा हूँ ठहरो लोगों
मुझ पे इल्ज़ाम लगाओ न रसूलों जैसा
ज़ेहन से महव हुए गुज़रा ज़माना 'अख़्तर'
एक चेहरा है मगर अब भी गुलाबों जैसा
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तिरे ख़त में जो अश्कों के निशाँ थे
वही अब किर्मक-ए-शब-ताब से हैं
चहक उठता है साज़-ए-ज़िंदगानी
तिरे अल्फ़ाज़ भी मिज़राब से हैं
दिलों में कर्ब बढ़ता जा रहा है
मगर चेहरे अभी शादाब से हैं
हमारे ज़ख़्म रौशन हो रहे हैं
मसीहा इस लिए बेताब से हैं
वो जुगनू हो सितारा हो कि आँसू
अँधेरे में सभी महताब से हैं
कभी नश्तर कभी मरहम समझना
मिरे अश'आर भी अहबाब से हैं
ख़ुशी तेरा मुक़द्दर होगी 'अख़्तर'
ये इम्काँ अब ख़याल-ओ-ख़्वाब से हैं
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कहाँ से लाएँगे आँसू अज़ा-दारी के मौसम में
बहुत कुछ रो चुके हम तो अदाकारी के मौसम में
बहुत कुछ रो चुके हम तो अदाकारी के मौसम में
उतर आऊँगा मैं भी ज़ीना-ए-हस्ती से यूँ इक दिन
कि जैसे रंग-ए-रुख़ उतरे है नादारी के मौसम में
तुम्हारे ख़त कभी पढ़ना कभी तरतीब से रखना
अजब मशग़ूलियत रहती है बेकारी के मौसम में
ब-जुज़ मेरे ज़माने की क़बा रंगीन कर डाली
ये क्या तफ़रीक़ रक्खी उस ने गुल-कारी के मौसम में
सर-ए-बर्ग-ए-तमन्ना मरहम-ए-दीदार कह जाएँ
न आएँ सामने मेरे निगह-दारी के मौसम में
तुलू-ए-मेहरस टूटेगी उन की नींद ना-मुम्किन
जो ख़्वाबीदा रहा करते हैं बेदारी के मौसम में
तरस खाते हैं क्यूँ अहबाब मेरे हाल पर 'अख़्तर'
बहुत बे-चैनियाँ बढ़ती हैं ग़म-ख़्वारी के मौसम में
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इक उम्र भटकते रहे घर ही नहीं आया
साहिल की तमन्ना थी नज़र ही नहीं आया
साहिल की तमन्ना थी नज़र ही नहीं आया
रौशन हैं जहाँ शम-ए-मोहब्बत की क़तारें
वो कुंज-ए-कम-आसार नज़र ही नहीं आया
मैं झूट को सच्चाई के पैकर में सजाता
क्या कीजिए मुझ को ये हुनर ही नहीं आया
वो गुम्बद-ए-बे-दर था कि दीवार-ए-अना थी
मंज़र कोई बाहर का नज़र ही नहीं आया
इक ऐसा सफ़र भी मुझे दरपेश था लोगों
कुछ काम जहाँ ज़ाद-ए-सफ़र ही नहीं आया
बैठे रहे पलकों को बिछाए सर-ए-राहे
वो जान-ए-जहाँ-गश्त इधर ही नहीं आया
इक पल को जहाँ बैठा हूँ थक कर कभी 'अख़्तर'
रस्ते में कोई ऐसा शजर ही नहीं आया
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ज़िंदाँ में दिन भी रात ही जैसा गुज़र गया
अहल-ए-जुनूँ वो पहली सी शोरिश कहाँ है अब
जाम-ए-शराब अब तो मिरे सामने न रख
आँखों में नूर हाथ में जुम्बिश कहाँ है अब
हल्क़ा-ब-गोश कोई न अब यार है यहाँ
वो रोज़-ओ-शब की दाद-ओ-सताइश कहाँ है अब
जीने का हक़ जो माँगा तो तेवर बदल गए
वो मेरे मुहसिनों की नवाज़िश कहाँ है अब
चेहरे पे गर्द-ए-उम्र-ए-रवाँ का ज़ुहूर है
बाँहों के बाले बोसों की बारिश कहाँ है अब
ख़ंजर हो या कि दशना हो या तेग़ या क़लम
'अख़्तर' वो आब और वो बुर्रिश कहाँ है अब
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ये भी क्या बात कि मैं तेरी अना की ख़ातिर
तेरी क़ामत से ज़ियादा तिरा साया चाहूँ
मुझ से उल्फ़त भी नहीं है तो न जाने फिर क्यूँ
तेरी महफ़िल में फ़क़त अपना ही चर्चा चाहूँ
वो तो गूँगा है मगर मुझ को ये ज़िद है कैसी
अपनी ता'रीफ़ में कुछ उस से भी सुनना चाहूँ
साथ देने से हुए जाते हैं क़ासिर अल्फ़ाज़
जाने क्या क्या मैं तिरी शान में लिखना चाहूँ
मैं तो इक ऐसा मुसाफ़िर हूँ जो थकता ही नहीं
अपनी मंज़िल से भी आगे कोई जादा चाहूँ
दिल से बादल कभी उठते ही नहीं हैं 'अख़्तर'
किस लिए आँखों से बहता हुआ दरिया चाहूँ
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मुझ को एहसास-ए-शर्मिंदगी है बहुत
क़िस्सा-ए-दर्द कैसे बयाँ हो गया
कितनी हसरत से तकती रही हर ख़ुशी
और दामन मिरा धज्जियाँ हो गया
मसअला बन गई फ़िक्र तफ़्हीम का
लफ़्ज़ का हुस्न भी राएगाँ हो गया
लोग ये सोच के ही परेशान हैं
मैं ज़मीं था तो क्यूँ आसमाँ हो गया
शिकवा-संजान-ए-तन्हाई हैं सब के सब
मेरा ग़म भी ग़म-ए-दो-जहाँ हो गया
पेड़ क्या मेरे आँगन का 'अख़्तर' गिरा
लोग समझे कि मैं बे-अमाँ हो गया
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