बड़े सुकून से हम एहतियात से गुज़रे
क़दम जमा के चले काएनात से गुज़रे
है कोई अज़्म-ए-जवाँ और न कुछ जुनूँ-ख़ेज़ी
बे-दस्त-ओ-पा ही रहे मुम्किनात से गुज़रे
यक़ीन दिल में रहा तेरी दिलरुबाई का
सो जाग जाग के हम सारी रात से गुज़रे
कोई नतीजा कहाँ बात का निकल पाया
कि एक बात ही क्या बात बात से गुज़रे
तग़य्युरात की दुनिया में हम रहे हर दम
कि सोते जागते हम भी हयात से गुज़रे
कभी न ख़ुद को किया वक़्फ़-ए-इंहिमाक-ए-वजूद
'उबैद' बच के रहे हादसात से गुज़रे
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हमारी ज़ीस्त का इक एक बाब खुल जाए
ख़ुदाया हम पे हमारी किताब खुल जाए
ख़ुदाया हम पे हमारी किताब खुल जाए
फिर इस के बा'द ये दश्त-ओ-दमन भला क्या हैं
जो ग़ौरो-ओ-फ़िक्र करें आफ़्ताब खुल जाए
ज़मीं पे रास्ता आए नज़र तो क्या है अजब
ये रास्ता तो मियाँ ज़ेर-ए-आब खुल जाए
ख़तीब चीख़ता है रोज़ ही सर-ए-मिंबर
मजाल क्या है जो हम पर ख़िताब खुल जाए
न जाने कब से दर-ए-ख़्वाब पर है क़ुफ़्ल पड़ा
ख़ुदाया अब तो कोई हम पे बाब खुल जाए
हमारे फ़र्ज़ का दफ़्तर तो खोल डाला है
वरक़ हुक़ूक़ का भी इक जनाब खुल जाए
'उबैद' देना है हम सब को इम्तिहाँ इक दिन
दुआएँ कीजे कि हम पर निसाब खुल जाए
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हमें तो गोशा-नशीं और जहाँ भी होना है
यहाँ भी होना है हम को वहाँ भी होना है
यहाँ भी होना है हम को वहाँ भी होना है
निशान भी है लगाना निशाँ भी होना है
मकाँ में रहते हुए ला-मकाँ भी होना है
इस एहतियात से करना है ज़िंदगी अपनी
अकेला चलना है और कारवाँ भी होना है
ज़मीं में रखते हैं पैवस्त अपनी दुनिया को
ज़मीं पे रहते हुए आसमाँ भी होना है
इक ऐसी क़ैद भी अब ख़ुद पे यूँ लगानी है
ज़बान रखते हुए बे-ज़बाँ भी होना है
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हक़ीक़तों से जो होता है आश्ना ऐ दोस्त
तो इस के वास्ते राह-ए-ख़तर ज़रूरी है
किसी की नीची नज़र का सलाम साथ रहे
सफ़र के वास्ते ज़ाद-ए-सफ़र ज़रूरी है
मगर ये शर्त है हर लफ़्ज़ रूह से निकले
दुअा-ए-नीम-शबी में असर ज़रूरी है
दिलों का हाल न चेहरों से हो सके ज़ाहिर
ख़िरद के दौर में ये भी हुनर ज़रूरी है
'उबैद' दूसरों को कर चुके बहुत तल्क़ीन
अब अपने आप पे भी इक नज़र ज़रूरी है
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पुर-कैफ़ कहीं के भी नज़ारे न रहेंगे
दुनिया में अगर इश्क़ के मारे न रहेंगे
दुनिया में अगर इश्क़ के मारे न रहेंगे
दुनिया-ए-मोहब्बत में चराग़ाँ न मिलेगा
पलकों पे अगर अश्क हमारे न रहेंगे
तुम छोड़ के मत जाओ मुझे शहर-ए-बला में
वर्ना मिरे जीने के सहारे न रहेंगे
तय कर लो सफ़र शब का कि मौक़ा है ग़नीमत
फिर चर्ख़-ए-बरीं पे ये सितारे न रहेंगे
ग़म ज़ीस्त के अफ़्साने का उनवान हसीं है
हम होंगे कहाँ ग़म जो हमारे न रहेंगे
बे-म'अनी नज़र आएँगे आँखों के सहीफ़े
मौजूद अगर उन में इशारे न रहेंगे
फिर किस पे यक़ीं कैसा भरम कैसी मुरव्वत
आज़ा भी हमारे जो हमारे न रहेंगे
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तो अब हालत में अपनी यूँ भी तब्दीली नहीं होती
ये मिट्टी ख़ून भी पी कर कभी गीली नहीं होती
ये मिट्टी ख़ून भी पी कर कभी गीली नहीं होती
हुआ जाता है क़ुदरत के उसूलों में दख़ील इंसाँ
हवा अब तो दिसम्बर में भी बर्फ़ीली नहीं होती
चलो आँखों से अब के बात कर के देखते हैं हम
ज़बाँ से बात तो होती है तफ़सीली नहीं होती
वो जो महसूस करती है बयाँ करती है अब खुल कर
ग़ज़ल पहले ज़माने जैसी शर्मीली नहीं होती
हमें है शौक़ ऐसा ठोकरों को आज़माने का
कि उस रह पर नहीं चलते जो पथरीली नहीं होती
सँभल कर ऐ 'उबैद'-ए-ख़ुश-गुमाँ रहना ठहर कर याँ
बिला मक़्सद मियाँ रस्सी कभी ढीली नहीं होती
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ये कौन है जो बहुत बे-क़रार है मुझ में
ये किस के क़ुर्ब में यूँ कसमसा रही है ग़ज़ल
वो ख़ोल जिस में मुक़य्यद हूँ टूटने को है
मुझे बहार का मुज़्दा सुना रही है ग़ज़ल
वजूद का हुआ जाता है फ़ल्सफ़ा पानी
रुमूज़-ए-ज़ात से पर्दे उठा रही है ग़ज़ल
जो मो'तरिज़ थे हुए वो भी मो'तरिफ़ उस के
हर एक दौर में जादू-नुमा रही है ग़ज़ल
सहा है ख़ुद पे हर इक तीर तंज़ का हँस कर
पिया है ज़हर मगर मुस्कुरा रही है ग़ज़ल
है क़द्र-दान को अपने ये वज्ह-ए-सरशारी
ये हासिदों के दिलों को जला रही है ग़ज़ल
कि सिर्फ़ गुल ही नहीं ख़ार से भी निस्बत है
ये और बात कि बाद-ए-सबा रही है ग़ज़ल
करे है उस पे रियाज़त कि उस का हुस्न खुले
'उबैद' के लिए मिस्ल-ए-हिना रही है ग़ज़ल
था एक शग़्ल मिरा मेरी ये ग़ज़ल-गोई
'उबैद' ज़ात को अब अपनी भा रही है ग़ज़ल
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पैकर-ए-शेर को मल्बूस अता क्या कीजे
जब तख़य्युल की हो परवाज़ बयाँ से आगे
आब और ख़ाक की ये बज़्म हमें क्या रास आती
हम को जाना था सितारों के जहाँ से आगे
कब तलक दैर-ओ-हरम की ये हदीस-ए-बे-सूद
मसअले और हैं नाक़ूस-ओ-अज़ाँ से आगे
जुस्तुजू और है कुछ अहल-ए-जुनूँ की वर्ना
कौन करता है सफ़र जा-ए-अमाँ से आगे
कर्ब को अपने तमाशा न बनाया जाए
है अदब-गाह-ए-वफ़ा आह-ओ-फ़ुग़ाँ से आगे
नज़्र-ए-अंदेशा न हो जाए कहीं ज़ीस्त 'उबैद'
बात कुछ और करें सूद-ओ-ज़ियाँ से आगे
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वक़्त की धूप में जलता है बदन
मुझ पे साया कोई आँचल कर दे
ऐसी तहज़ीब से हासिल क्या है
जो भरे शहर को जंगल कर दे
रोक रक्खी है घटा आँखों में
वर्ना बह जाए तो जल-थल कर दे
वो जो रखता है मुझे नज़रों में
कहीं नज़रों से न ओझल कर दे
शहर में जादू है जाने कैसा
ज़र-ए-ख़ालिस को जो पीतल कर दे
ग़म है सौग़ात की सूरत यारब
तू मिरे ग़म को मुसलसल कर दे
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तामीर-ओ-तरक़्क़ी वाले हैं कहिए भी तो उन को क्या कहिए
जो शीश-महल में बैठे हुए मज़दूर की बातें करते हैं
ये लोग वही हैं जो कल तक तंज़ीम-ए-चमन के दुश्मन थे
अब आज हमारे मुँह पर ये दस्तूर की बातें करते हैं
इक भाई को दूजे भाई से लड़ने का जो देते हैं पैग़ाम
वो लोग न जाने फिर कैसे जम्हूर की बातें करते हैं
इक ख़्वाब की वादी है जिस में रहते हैं हमेशा खोए हुए
धरती पे नहीं हैं जिन के क़दम वो तूर की बातें करते हैं
हम को ये गिला महबूब उन्हें अफ़्साना-ए-बज़्म-ए-ऐश-ओ-तरब
शिकवा ये उन्हें हम उन से दिल-ए-रंजूर की बातें करते हैं
क्या ख़ूब अदा है उन की 'उबैद' अंदाज़-ए-करम है कितना हसीं
मजबूर के हक़ से ना-वाक़िफ़ मजबूर की बातें करते हैं
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