बहर-ए-बला है मौज पर क़हर-ए-क़ज़ा है औज पर
हैं काह-ए-सामाँ मुस्तइद ता ना-गुरेज़ानी करें
आई है रात ऐसी दनी है हर चराग़ अफ़्सुर्दनी
ऐ दिल बया ऐ दिल बया कुछ शो'ला-सामानी करें
हाँ हाँ दिखाएँगे ज़रूर हम वहशत-ए-दिल का वफ़ूर
पहले ये शहर-ए-दश्त-ओ-दर तकमील-ए-वीरानी करें
ऐ आशिक़ाँ ऐ आशिक़ाँ आया है अमर-ए-ना-गहाँ
जो लोग हैं नज़ारा जू वो मश्क़-ए-हैरानी करें
वो शम्अ'' है दर-ए-ताक़-ए-दिल रौशन हैं सब आफ़ाक़-ए-दिल
उफ़्तादगान-ए-ख़ाक उठो अफ़्लाक गर्दानी करें
है बस-कि तेग़ उस की रवाँ कमयाब हैं ना-कुश्तगाँ
सब सरफ़रोशों से कहो चंदे फ़रावानी करें
इक नासिहाना अर्ज़ है दरियाओं पर ये फ़र्ज़ है
दिल की तरह हर लहर में तज्दीद-ए-तुग़्यानी करें
ऐसे घरों में अहल-ए-दिल रहते नहीं हैं मुस्तक़िल
तब्दील ये दीवार-ओ-दर उस्लूब-ए-वीरानी करें
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हरगिज़ न राह पाई फ़र्दा-ओ-दी ने दिल पर
रहती है एक हालत बारह महीने दिल पर
रहती है एक हालत बारह महीने दिल पर
सकते में हैं मह-ओ-मेहर दरिया पड़े हैं बे-बहर
है सख़्त ग़ैर-मौज़ूँ दुनिया ज़मीन-ए-दिल पर
शो'ला चराग़ में है सौदा दिमाग़ में है
साबित क़दम हूँ अब तक दीन-ए-मुबीं-ए-दिल पर
या-अय्योहल-मजाज़ीब है बस-कि ज़ेर-ए-तर्तीब
मजमूअतुल-फ़तावा क़ौल-ए-मतीन-ए-दिल पर
लिख लो ये मेरी राय क्या क्या सितम न ढाए
कल दिल ने आदमी पर आज आदमी ने दिल पर
ये रंज ना-कशीदा ये जेब ना-दरीदा
ऐ इश्क़ रहम हाँ रहम इन तारकीन-ए-दिल पर
मानो ये घर न छोड़ो दुनिया को देखते हो
जो कुछ गुज़र चुकी है इस ना-मकीन-ए-दिल पर
इक सर है ना-कशूदा इक क़ौल ना-शनूदा
इक नग़्मा ना-सरूदा तर्ज़-ए-नवीन-ए-दिल पर
पड़ता है जस्ता जस्ता मद्धम सा और शिकस्ता
इक माह-ए-नीलमीं का परतव नगीन-ए-दिल पर
सौ बार इधर से गुज़रा वो आतिशीं चमन सा
इक बर्ग-ए-गुल न रक्खा दस्त-ए-यमीन-ए-दिल पर
ख़ूँ-बस्ता चश्म-ए-हैराँ पैवस्ता ला'न-गर्दां
बे-दीद बल्कि बे-दर्द बल्कि कमीने दिल पर
तूफ़ान उठा रखा था आँखों ने वाह-वा का
उस की नज़र नहीं थी कल आफ़रीन-ए-दिल पर
रंगीन तो बहुत है दुनिया मगर महाशय
धब्बे से पड़ गए हैं कुछ आस्तीन-ए-दिल पर
वो माह-ए-नाज़नीं है या सर्व-आतिशीं है
या फ़ित्ना-ए-क़यामत बरपा ज़मीन-ए-दिल पर
सब ना-मलामतों को सब बे-करामतों को
सब सर-सलामतों को लाना है दीन-ए-दिल पर
'जावेद' को दिखा कर कहता है सब से दिलबर
ऊधम मचा रखा था इन भाई-जी ने दिल पर
फ़ारूक़ी और अहमद-मुश्ताक़ को तहय्यत
शाख़-ए-ग़मगीन-ए-दिल पर हिस्न-ए-हसीन-ए-दिल पर
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मौजूद हैं कितने ही तुझ से भी हसीं कर के
झुटला दिया आँखों को मैं दिल पे यक़ीं कर के
झुटला दिया आँखों को मैं दिल पे यक़ीं कर के
जिस चश्म से रिंदों में हू-हक़ है उसी ने तो
ज़ाहिद को भी रक्खा है मेहराब-नशीं कर के
क्या उस की लताफ़त का अहवाल बयाँ कीजिए
जो दिल पे हुआ ज़ाहिर आँखों को नहीं कर के
कुछ कम था बला-ए-जाँ पे चेहरा कि ऊपर से
आँखें भी बना लाए ग़ारत-गर-ए-दीं कर के
आईने के आगे से अब उठ भी चुको साहब
क्या कीजिएगा ख़ुद को इतना भी हसीं कर के
सौ दाग़ हैं सीने में वो दाग़-ए-जुदाई भी
देखो तो ज़रा होगा उन में ही कहीं कर के
इस दिल का तो नक़्शा ही दुनिया ने बदल डाला
कुछ याद है रहता था वो भी तो यहीं कर के
'जावेद' वहाँ तक तो मुश्किल है कोई पहुँचे
मँगवाइए क़ासिद भी जिब्रील-ए-अमीं कर के
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मुझ से बड़ा है मेरा हाल
तुझ से छूटा तेरा ख़याल
तुझ से छूटा तेरा ख़याल
चार पहर की है ये रात
और जुदाई के सौ साल
हाथ उठा कर दिल पर से
आँखों पर रक्खा रुमाल
नंग है तकियेदारों का
पा-ए-तलब या दस्त-ए-सवाल
मन जो कहता है मत सुन
या फिर तन पर मिट्टी डाल
उजला उजला तेरा रूप
धुँदले धुँदले ख़द्द-ओ-ख़ाल
सुख की ख़ातिर दुख मत बेच
जाल के पीछे जाल न डाल
राज-सिंघासन मेरा दिल
आन बिराजे हैं जगपाल
किस दिन घर आया 'जावेद'
कब पाया है उस को बहाल
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मगर वो दिया ही नहीं मान कर के
बहुत हम ने देखा है जी जान कर के
बहुत हम ने देखा है जी जान कर के
कभी दिल को भी सैर कर जाओ साहब
ये ग़ुंचा भी हैगा गुलिस्तान कर के
नज़र इस सरापे में सौ जा से पलटी
ज़ुलेख़ाई यूसुफ़िस्तान कर के
वो जिस रोज़ निकलें जग उजियारने को
ये दिल भी दिखा लाइयो ध्यान कर के
जनाब आप हूर ओ मलक होंगे लेकिन
समझिएगा आशिक़ को इंसान कर के
तिरी लाला-ज़ारी सलामत कि हम भी
खड़े हैं कोई ग़ुंचा अरमान कर के
मसीह ओ ख़िज़्र सर-ब-कफ़ फिर रहे हैं
कोई उस पे मरना है आसान कर के
मिरी किश्त-ए-जाँ पर से गुज़रा है 'जावेद'
सहाब-ए-जुनूँ ज़ोर-ए-बारान कर के
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दिल आईना है मगर इक निगाह करने को
ये घर बनाया है उस ने तबाह करने को
ये घर बनाया है उस ने तबाह करने को
गुल-ए-विसाल अभी देखा न था कि आ पहुँची
शब-ए-फ़िराक़ भी आँखें सियाह करने को
गलीम ओ तख़्त उतारे हैं ग़ैब से उस ने
मुझे फ़क़ीर तुझे बादशाह करने को
सजे हैं दश्त ओ बयाबाँ अजब क़रीने से
तुझे सवार मुझे गर्द-ए-राह करने को
मिली मुझे तिरी हम-साएगी सो दुनिया में
तमीज़-ए-मर्तबा-ए-कोह-ओ-काह करने को
दमीदा हर शजर-ए-गर्द-बाद नख़्ल-ए-जुनूँ
हमारे चाक-ए-गरेबाँ से राह करने को
दिल-ए-गुदाख़्ता ओ चश्म-ए-तर ही काफ़ी है
फ़ुतूह-ए-ममलिकत-ए-मेहर-ओ-माह करने को
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स्वाँग भरना कभी शाही कभी दरवेशी का
किसी सूरत से मुझे उस की नज़र में रहना
एक हालत पे बसर हो नहीं सकती मेरी
जामा-ए-ख़ाक कभी ख़िलअत-ए-ज़र में रहना
दिन में है फ़िक्र-ए-पस-अंदाज़ी-ए-सरमाया-ए-शब
रात भर काविश-ए-सामान-ए-सहर में रहना
दिल से भागे तो लिया दीदा-ए-तर ने गोया
आग से बच के निकलना तो भँवर में रहना
अहल-ए-दुनिया बहुत आराम से रहते हैं मगर
कब मुयस्सर है तिरी राह-गुज़र में रहना
वस्ल की रात गई हिज्र का दिन भी गुज़रा
मुझे वारफ़्तगी-ए-हाल-ए-दिगर में रहना
कर चुका है कोई अफ़्लाक ओ ज़मीं की तकमील
फिर भी हर आन मुझे अर्ज़-ए-हुनर में रहना
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कोई जल में ख़ुश है कोई जाल में
मस्त हैं सब अपने अपने हाल में
मस्त हैं सब अपने अपने हाल में
जादा-ए-शमशीर हो या फ़र्श-ए-गुल
फ़र्क़ कब आया हमारी चाल में
एक आँसू से कमी आ जाएगी
ग़ालिबन दरियाओं के इक़बाल में
शोला-ए-सद-रंग की सी कैफ़ियत
तुझ में है या तेरे ख़द्द-ओ-ख़ाल में
एक लम्हा मेरा यार-ए-ग़ार है
इस मुसीबत-गाह-ए-माह-ओ-साल में
ये जो मेरे जी को चैन आता नहीं
हिन्द में ईरान में बंगाल में
रोज़ का रोना लगा है अपने साथ
हम ने आँखें बाँध लीं रुमाल में
दीदा ओ दिल ने किया है काम बंद
ठप है कारोबार इस हड़ताल में
इस निगाह-ए-नाज़ की एक एक बात
है हमारे पीर के अक़वाल में
दिल पे साया है किसी सुलतान का
वर्ना क्या रक्खा है इस कंगाल में
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आँसू की तरह दीदा-ए-पुर-आब में रहना
हर गाम मुझे ख़ाना-ए-सैलाब में रहना
हर गाम मुझे ख़ाना-ए-सैलाब में रहना
वो अबरू-ए-ख़मदार नज़र आए तो समझे
आँखों की तरह साया-ए-मेहराब में रहना
ग़फ़लत ही में कटते हैं शब-ओ-रोज़ हमारे
हर आन किसी ध्यान किसी ख़्वाब में रहना
दिन भर किसी दीवार के साए में तग-ओ-ताज़
शब जुस्तुजू-ए-चादर-ए-महताब में रहना
वीराना-ए-दुनिया में गुज़रते हैं मिरे दिन
रातों को रवाक़-ए-दिल-ए-बेताब में रहना
मिट्टी तो हर इक हाल में मिट्टी ही रहेगी
क्या टाट में क्या क़ाक़ुम ओ संजाब में रहना
घर और बयाबाँ में कोई फ़र्क़ नहीं है
लाज़िम है मगर इश्क़ के आदाब में रहना
इक पल को भी आँखें न लगीं ख़ाना-ए-दिल में
हर लम्हा निगहबानी-ए-असबाब में रहना
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दुनिया का कोई दाग़ मिरे दिल को क्या लगे
माँगा न इक दिरम भी कभी इस बख़ील से
क्या बोरिया-नशीं को हवस ताज ओ तख़्त की
क्या ख़ाक-आश्ना को ग़रज़ अस्प ओ फ़ील से
दिल की तरफ़ से हम कभी ग़ाफ़िल नहीं रहे
करते हैं पासबानी-ए-शहर उस फ़सील से
गहवारा-ए-सफ़र में खुली है हमारी आँख
ता'मीर अपने घर की हुई संग-ए-मील से
इक शख़्स बादशाह तो इक शख़्स है वज़ीर
गोया नहीं हैं दोनों हमारी क़बील से
दुनिया मिरे पड़ोस में आबाद है मगर
मेरी दुआ-सलाम नहीं उस ज़लील से
'जावेद' एक ग़म के सिवा दिल में है भी क्या
हम घर चला रहे हैं मता-ए-क़लील से
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