जिधर ख़ुद गया था लगा ले गया
न जाने किधर रास्ता ले गया
न जाने किधर रास्ता ले गया
पड़ा था कि बे-कार की चीज़ था
मुझे राह से कौन उठा ले गया
कोई दे के मुझ को शुऊर-ए-हयात
मिरा दूर सब्र-आज़मा ले गया
गदा ले गया कब मिरे दर से भीक
सदा मेरे लब की चुरा ले गया
न पामाल होने दिया सब्र ने
गिरे आँसुओं को उठा ले गया
ख़िरद ढूँढती रह गई वजह-ए-ग़म
मज़ा ग़म का दर्द आश्ना ले गया
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पक्का था जो मन का ख़स्ता-तन था
वो क़ैस कहाँ था कोहकन था
मख़मूर सी हो रही थीं आँखें
रुझान-ए-गुनाह ज़ौ-फ़गन था
दुनिया मक़्तल बनी थी और दिल
अपने ही ख़याल में मगन था
ग़म-ख़ाना हो के रह गया है
वो लफ़्ज़ जो माबद-ए-सुख़न था
उड़ता फिरता ग़ुबार हर-सू
ये दश्त-ए-रवाँ कभी चमन था
कहने को तो मर चुकी थी ख़्वाहिश
बाक़ी मगर उस का बाँकपन था
फ़नकार थे हम न थे कफ़न-कश
ज़िंदों के लिए हमारा फ़न था
क्या रूह दमक दमक उठी थी
कुंदन सा ख़याल का बदन था
गो होंट 'रज़ा' के सिल गए थे
ख़ा
में की ज़बाँ से नग़्मा-ज़न था
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जिस ने इक अहद के ज़ेहनों को जिला दी होगी
मेरे आवारा ख़यालात की बिजली होगी
मेरे आवारा ख़यालात की बिजली होगी
ले उड़ी है तिरे हाथों की हिना पिछले पहर
मेरे उलझे हुए अफ़्कार की आँधी होगी
जितनी मिल जाएगी काँटों की चुभन ले लूँगा
जो भी हालत दिल-ए-बे-ताब की होगी होगी
हम न मानेंगे ख़मोशी है तमन्ना का मिज़ाज
हाँ भरी बज़्म में वो बोल न पाई होगी
मेरी ना-कामी-ए-हालात के धारे के सिवा
एक नद्दी भी तो बे-आब न बहती होगी
है 'रज़ा' आज का आलम तो असीर-ए-इबहाम
यार ज़िंदा हैं तो कल और तरक़्क़ी होगी
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उगेंगे फूल ख़यालों के रेग-ज़ारों से
ख़िज़ाँ के घर से जुलूस-ए-बहार निकलेगा
कहीं फ़रेब न खाना यही फ़िदा-ए-जाम
ब-वक़्त-ए-कार अजब होश्यार निकलेगा
चमन का हुस्न समझ कर समेट लाए थे
किसे ख़बर थी कि हर फूल ख़ार निकलेगा
ये हुक्म है कि कोई राह-ए-रास्त पर न चले
हवा के घोड़े पे कोई सवार निकलेगा
किसे नहीं है शिकायत 'रज़ा' ज़माने से
टटोलो कोई जिगर दाग़-दार निकलेगा
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अफ़्सोस दिल तक आने की राहें न खुल सकीं
कोई फ़क़त ख़याल तक आ कर पलट गया
हम तौल बैठे सुब्ह-दम इंसाँ को साए से
सूरज के सर पे आते ही साया सिमट गया
क्या जाने किस चटान से टकरा गया है दिल
चलता हुआ सफ़ीना अचानक उलट गया
अब कोई ढूँड-ढाँड के लाओ नया वजूद
इंसान तो बुलंदी-ए-इंसाँ से घट गया
मंज़िल पे गर्द-ए-वहम-ओ-गुमाँ थी वो धुल गई
रस्ते में अक़्ल ओ होश का पत्थर था हट गया
महफ़िल भी नूर-बार है साक़ी भी ख़ुम ब-दोश
मेरे ही नाव नोश का मेआ'र घट गया
मंज़िल कहीं मिली न मिली लेकिन ऐ 'रज़ा'
मंज़िल के इश्तियाक़ में रस्ता तो कट गया
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ये लम्हात-ए-नौ मेरा क्या ले गए
कुछ आँसू गिरे थे उठा ले गए
कुछ आँसू गिरे थे उठा ले गए
नदी नाले क़द्रें बहा ले गए
वफ़ा ले गए मुद्दआ' ले गए
किसे ढूँडते हो खड़ी नाव पर
सभी फ़ासले ना-ख़ुदा ले गए
ये कैसे झकोले थे पिंदार के
मुझे पँख दे कर उड़ा ले गए
चुना रहनुमा उन को ये क्या किया
कहाँ से कहाँ नक़्श-ए-पा ले गए
घर आँगन में सोने का सूरज कहाँ
किरन तक पड़ोसी चुरा ले गए
लबों पर कहीं 'काली-दास' अब नहीं
बड़े नाम 'गुप्ता-रज़ा' ले गए
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जहाँ तक आएँ तसव्वुर में वादियाँ लिख दूँ
फिर उन पे नाम तुम्हारा यहाँ वहाँ लिख दूँ
जहाँ मिले मुझे रोटी उसे लिखूँ धरती
जहाँ पहुँच न सकूँ उस को आसमाँ लिख दूँ
निकल चलूँ कहीं हुस्न-ओ-जुनूँ के जंगल में
हिरन की आँख में काजल की डोरियाँ लिख दूँ
कहानी ख़त्म हुई लेकिन इस का क्या कीजे
जो लफ़्ज़ याद अब आए उन्हें कहाँ लिख दूँ
जो ज़ेहन में हैं हुरूफ़ उन को काम में लाऊँ
जो दुख पड़े ही न हों उन की दास्ताँ लिख दूँ
कुछ ऐसा पत्र लिखूँ आप को जो भा जाए
मरा हूँ आप के गिन अपनी ख़ामियाँ लिख दूँ
ग़ज़ल तो कह दूँ 'रज़ा' ये भी तो इजाज़त हो
जिसे तू हिंदवी कहता था वो ज़बाँ लिख दूँ
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उजड़ तो सकता है लेकिन बदल नहीं सकता
वो हक़-शनास जो इक अहद की निशानी है
ख़िरद की बातें कहाँ तक करोगे दीवानो
ख़िरद के नाम पे कुछ ख़ाक भी उड़ानी है
तुम्हारे रंग-ए-जफ़ा को भी है क़याम कहीं
हमारे इश्क़ की मंज़िल तो कामरानी है
फ़क़त समझने के अंदाज़ हैं क़दीम ओ जदीद
फ़साना-गो के तो लब पर वही कहानी है
हयात लाख हो फ़ानी मगर ये सुन रखिए
हयात से जो है मक़्सूद ग़ैर-फ़ानी है
सुनी-सुनाई पे तरजीह लाख बार उस को
किताब-ए-दिल की 'रज़ा' बात आसमानी है
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आसमाँ सा मुझे घर दे देना
ख़ाक हो जाऊँ तो पर्दे देना
ख़ाक हो जाऊँ तो पर्दे देना
सामना आज अना से होगा
बात रखनी है तो सर दे देना
जाने कब से है धुँदलकों का शिकार
नुक़्ते को शम्स ओ क़मर दे देना
तालिब-ए-वक़्त नहीं हूँ लेकिन
मौत तक चार-पहर दे देना
जो पता पूछें मिरा तुम उन को
मुट्ठी भर गर्द-ए-सफ़र दे देना
कल का दिन बे-ख़बरी का होगा
सारे पर्चों में ख़बर दे देना
दे दिया है जो क़लम हाथों में
अब सुख़न में भी असर दे देना
फिर 'रज़ा' जल्वा-नुमा होता है
मन के अँधों को नज़र दे देना
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जब फ़िक्रों पर बादल से मंडलाते होंगे
इंसाँ घट कर साए से रह जाते होंगे
इंसाँ घट कर साए से रह जाते होंगे
दो दिन को गुलशन पे बहार आने को होगी
पंछी दिल में राग सदा के गाते होंगे
दुनिया तो सीधी है लेकिन दुनिया वाले
झूटी सच्ची कह के उसे बहकाते होंगे
याद आ जाता होगा कोई जब राही को
चलते चलते पाँव वहीं रुक जाते होंगे
कली कली बिरहन की चिता बन जाती होगी
काले बादल घिर कर आगे लगाते होंगे
दुख में क्या करते होंगे दौलत के पुजारी
रूप खिलौना तोड़ के मन बहलाते होंगे
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