Raees Akhtar

Top 10 of Raees Akhtar

    जाने क्या बात है क्यूँ गर्मी-ए-बाज़ार नहीं
    अब कोई जिंस-ए-वफ़ा का भी ख़रीदार नहीं

    लोग इक शख़्स को ले जाते हैं मक़्तल की तरफ़
    इस पे इल्ज़ाम है उतना कि गुनहगार नहीं

    ज़िंदगी ज़ख़्म सही ज़ख़्म का दरमाँ कीजे
    कोई इस शहर में ज़ख़्मों का ख़रीदार नहीं

    पैकर-ए-शे'र में ढल जाए किसी का चेहरा
    मेरे इज़हार-ए-मोहब्बत का ये मेआ'र नहीं

    तेरी इक नीची नज़र उम्र का सरमाया है
    साक़िया मैं तिरे साग़र का तलबगार नहीं

    यूँ भी हम दर्द को पहलू में छुपा लेते हैं
    मुजरिम-ए-शौक़ हैं रुस्वा सर-ए-बाज़ार नहीं

    अपनी मर्ज़ी से यहाँ मुझ को बहा ले जाए
    तेज़ इतनी तो अभी वक़्त की रफ़्तार नहीं

    आप के दर्द से रिश्ता है मिरे दिल का 'रईस'
    कौन कहता है कि मैं आप का ग़म-ख़्वार नहीं
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    Raees Akhtar
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    वक़्त की तेज़ रवी देख के डर जाते हैं
    लोग जीते हैं कुछ इस तरह कि मर जाते हैं

    ज़िंदगानी तिरी अज़्मत को बढ़ाने वाले
    मुस्कुराते हुए मक़्तल से गुज़र जाते हैं

    बज़्म याराँ हो कि दश्त-ए-शब-ए-तन्हाई हो
    ज़ख़्म भरने पे जब आते हैं तो भर जाते हैं

    ये शब-ओ-रोज़ भी औराक़-ए-परेशाँ की तरह
    बारहा वक़्त की आँधी में बिखर जाते हैं

    कितनी यादों से उलझती है मिरी तन्हाई
    कितने तूफ़ान मिरे सर से गुज़र जाते हैं

    दूर रह कर भी कभी शिकवा-ए-दूरी न रहा
    आप ही आप हैं जिस सम्त जिधर जाते हैं

    अपनी पलकों पे सजाए हुए अश्कों के चराग़
    कुछ तो कहिए कि 'रईस' आप किधर जाते हैं
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    Raees Akhtar
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    कहीं शर्मिंदा न हो रस्म-ए-वफ़ा मेरे बा'द
    मेरे माज़ी को न दो मेरी सज़ा मेरे बा'द

    ऐसा लगता है कि सब ख़ून के प्यासे हैं यहाँ
    हाए इस शहर का क्या हाल हुआ मेरे बा'द

    तिश्ना-लब और भी आएँगे यहाँ मेरी तरह
    कौन देगा उन्हें जीने की दुआ मेरे बा'द

    मुझ पे ही ख़त्म हुआ क़हर ज़माने-भर का
    फिर किसी और का दामन न जला मेरे बा'द

    एक ही शब में बने लोग मसीहा कितने
    शहर में फिर कोई क़ातिल न रहा मेरे बा'द

    अब तो अपनों में भी अगली सी शराफ़त न रही
    रिश्ता-ए-मेहर-ओ-वफ़ा टूट गया मेरे बा'द

    ग़ालिबन मैं ही यहाँ लाला-ए-सहरा था 'रईस'
    फिर न सहरा में कोई फूल खिला मेरे बा'द
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    Raees Akhtar
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    निशात-ए-मंज़िल-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र को याद करो
    सफ़र में अपने किसी हम-सफ़र को याद करो

    बड़े ख़ुलूस से तारीक रास्तों पे चलो
    बड़े तपाक से हुस्न-ए-सहर को याद करो

    जले चराग़ तो चुपके से नाम लो मेरा
    मिले ख़ुशी तो मिरी चश्म-ए-तर को याद करो

    जो दिल में रह के भी अंजान सी रही बरसों
    किसी की उस निगह-ए-फ़ित्ना-गर को याद करो

    दिल-ए-हज़ीं का तक़ाज़ा है जादा-ए-ग़म में
    नज़र के साथ फ़रेब-ए-नज़र को याद करो

    क़दम क़दम पे जहाँ ज़िंदगी निखरती थी
    किसी के प्यार की उस रहगुज़र को याद करो

    है जिस के फ़ैज़ से अब तक भी रौशनी घर में
    'रईस' अब भी उसी चश्म-ए-तर को याद करो
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    Raees Akhtar
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    ग़मों से रिश्ता है अपना भी दोस्ती की तरह
    मिले हैं अश्क भी हम को यहाँ हँसी की तरह

    करम की ज़हमत-ए-बे-जा का शुक्रिया लेकिन
    तुम्हारे दर्द को चाहा है ज़िंदगी की तरह

    मैं अपना दर्द लिए अब कहाँ कहाँ जाऊँ
    मुझे रफ़ीक़ भी मिलते हैं अजनबी की तरह

    शरीफ़ लोग भी होते हैं मस्लहत का शिकार
    उजाले आज भी मिलते हैं तीरगी की तरह

    ये किस ने शमएँ जलाई हैं अपनी यादों की
    अँधेरे घर में है ये कौन रौशनी की तरह

    किसी ख़याल में अक्सर शगुफ़्ता रहता हूँ
    कोई ख़याल है फूलों की ताज़गी की तरह

    ये और बात कि अब मैं 'रईस'-ए-महफ़िल हूँ
    ग़रीब-ए-शहर कभी था में आप ही की तरह
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    Raees Akhtar
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    जाने किस वास्ते दिल चश्म-ए-करम माँगे है
    ज़िंदगी आप से फिर दीदा-ए-नम माँगे है

    हम कहाँ जाएँगे अब तेरी गली से उठ कर
    किस का दिल है जो यहाँ दैर-ओ-हरम माँगे है

    मुझ को फूलों की हवस है न तो मोती की तलाश
    कासा-ए-चश्म मिरा दस्त-ए-करम माँगे है

    चश्म-ए-नम को किसी दामन की तमन्ना ही सही
    दिल-ए-बेताब मगर आप का ग़म माँगे है

    जाने किस वास्ते इक शख़्स की बहकी हुई चाल
    हर-क़दम आप के ही नक़्श-ए-क़दम माँगे है

    कोई दीवाना तमन्नाओं को ज़ख़्मी पा कर
    ज़िंदगी-भर के लिए रंज-ओ-अलम माँगे है

    आइना-ख़ानों की यक-रंगी से उक्ता के 'रईस'
    आज़र-ए-वक़्त भी पत्थर के सनम माँगे है
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    ज़िंदगी की चाहत में ज़िंदगी से मत खेलो
    रौशनी के दीवानो रौशनी से मत खेलो

    बुतान-ए-बे-परवा कुछ ख़ुदा नहीं हो तुम
    प्यार की ख़ुदाई में बंदगी से मत खेलो

    आप ही ने कर डाला ज़िंदगी से बेगाना
    आप ही तो कहते थे ज़िंदगी से मत खेलो

    प्यार दिल का सौदा है अक़्ल दिल की बीमारी
    दोस्ती के पर्दे में दोस्ती से मत खेलो

    रौशनी की ख़्वाहिश में जल उठे न पैराहन
    रौशनी में शो'ले हैं रौशनी से मत खेलो

    तुम से कुछ नहीं मतलब हाँ मगर ख़िरद-मंदो
    हम जुनूँ-परस्तों की आगही से मत खेलो

    नग़्मा-ए-तमन्ना से ख़ून-ए-दिल टपकता है
    इशरतों के मतवालो शाइ'री से मत खेलो

    मेहर-ओ-माह रहते हैं तीरगी के सीने में
    भूल कर 'रईस'-अख़्तर तीरगी से मत खेलो
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    हम कहाँ और दिल-ए-ख़राब कहाँ
    शब-ए-ग़म तिरा जवाब कहाँ

    ज़िंदगी के शुऊ'र से बढ़ कर
    ज़िंदगी में कोई अज़ाब कहाँ

    कोई चेहरा हो ग़ौर से पढ़िए
    इस से जा
    में' कोई किताब कहाँ

    दर्द-ओ-ग़म की उदास आँखों में
    आरज़ू के हसीन ख़्वाब कहाँ

    आओ अपनी सहरस पूछ तो लें
    छोड़ आई है आफ़्ताब कहाँ

    रूह जब हो गई है ख़ुद घाइल
    दिल के ज़ख़्मों का फिर हिसाब कहाँ

    दिल धड़कते हैं अब मगर दिल में
    वो महकते हुए गुलाब कहाँ

    क्या पता वक़्त के अँधेरों में
    छप गए फ़न के माहताब कहाँ

    वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है
    रुक गया आ के इंक़लाब कहाँ

    ऐ 'रईस' आरज़ू के चेहरे पर
    अब वो अगली सी आब-ओ-ताब कहाँ
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    Raees Akhtar
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    एक धोका है दिलकशी क्या है
    हम समझते हैं दोस्ती क्या है

    आँसुओं की हो और उम्र दराज़
    चाँद-तारों की रौशनी क्या है

    हुस्न की इक निगाह जाँ-परवर इश्क़ की और ज़िंदगी क्या है

    हम ने देखा है भीगी पलकों को
    आप क्या जानें तिश्नगी क्या है

    रूठना इक अदा तो है लेकिन
    ये हमेशा की बरहमी क्या है

    दिल को निस्बत है उन के दिल से 'रईस'
    जज़्ब-ए-उल्फ़त में अब कमी क्या है
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    Raees Akhtar
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    साज़-ए-फ़ुर्क़त पे ग़ज़ल गाओ कि कुछ रात कटे
    प्यार की रस्म को चमकाओ कि कुछ रात कटे

    जब ये तय है कि ग़म-ए-इश्क़ बहुत काफ़ी है
    ग़म का मफ़्हूम ही समझाओ कि कुछ रात कटे

    सुब्ह के साथ ही हम ख़ुद भी बिखर जाएँगे
    दो-घड़ी और ठहर जाओ कि कुछ रात कटे

    दामन-ए-दर्द पे बिखरे हुए आँसू की तरह
    मेरी पलकों पे भी लहराओ कि कुछ रात कटे

    ज़िक्र-ए-गुलज़ार सही क़िस्सा-ए-दिल-दार सही
    ज़ख़्म के फूल ही महकाओ कि कुछ रात कटे

    एक एक दर्द के सीने में उतर कर देखो
    एक एक साँस में लहराओ कि कुछ रात कटे

    दिल की वादी में है तारीक घटाओं का हुजूम
    चाँदनी बन के निखर जाओ कि कुछ रात कटे

    क़ातिल-ए-शहरस बच कर मैं अभी आया हूँ
    मैं अकेला हूँ चले आओ कि कुछ रात कटे

    फ़र्श किरनों का बिछा देगी सहर आ के 'रईस'
    दिल के ज़ख़्मों को भी चमकाओ कि कुछ रात कटे
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    Raees Akhtar
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