बग़ैर उस के भी ज़िंदा हूँ और मज़े में हूँ
बिछड़ने वाले को ये इत्तिलाअ'' कर दूँ क्या
मुझे पसंद नहीं अज़दहाम लोगों का
ये मुन्कशिफ़ मैं सर-ए-इज्तिमाअ' कर दूँ क्या
मुझे तो तुम ने ही बर्बाद कर दिया लेकिन
तुम्हारे हक़ में तुम्हारी दिफ़ा कर दूँ क्या
तुम्हें पसंद नहीं है मिरा ये कार-ए-सुख़न
तमाम ग़ज़लें कहो नज़्र-ए-जाँ कर दूँ क्या
इसी सबब तो परेशान-हाल रहता हूँ
अना के ज़ो'म को 'आज़म' विदाअ'' कर दूँ क्या
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ख़ुद मैं ने ही रक्खा न ख़याल अपना कभी भी
ग़ैरों की कुछ अपनों की जफ़ाएँ भी बहुत थीं
सूरत पे उजाले थे अगर शम्स-ओ-क़मर के
ज़ुल्फ़ों की सियाही में घटाएँ भी बहुत थीं
थी अहद-ए-जवानी में मोहब्बत ही मोहब्बत
ना-कर्दा गुनाहों की सज़ाएँ भी बहुत थीं
मबहूत थे मसहूर थे सब देख के उस को
शफ़्फ़ाफ़ सरापा था अदाएँ भी बहुत थीं
हर वक़्त मिरे साथ थे असबाब-ए-तबाही
क़िस्मत थी ख़राब अपनी ख़ताएँ भी बहुत थीं
इक रोज़ क़ज़ा ले गई बीमार को 'आज़म'
थे जब कि मसीहा भी दवाएँ भी बहुत थीं
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उदास उदास हैं इंसाँ हर एक चेहरा फ़क़
ये शहर शहर है या दश्त है ये लक़-ओ-दक़
मैं दिल की बात कहूँ यूँ कि दिल तलक पहुँचे
न हों किनाए ही मुबहम न इस्तिआ'रे अदक़
चलो समेट के ऑफ़िस को अपने घर की तरफ़
उफ़ुक़ के पार वो देखो उतर रही है शफ़क़
ज़रा सा इल्म-ओ-हुनर पा गए तो कुछ कम-ज़र्फ़
समझ रहे हैं सभी को ही अहक़र-ओ-अहमक़
फिर एहतिजाज के रस्ते पे क्यूँ चलेंगे हम
हमें जो मिलता रहे आप से हमारा हक़
तअ'ल्लुक़ात में क़ाएम रखें भरोसे को
कि शक हमेशा ही करता रहा है रिश्ते शक़
किसी किताब में मिलता नहीं है ज़िक्र 'आज़म'
हमें सिखाए हैं इस ज़िंदगी ने ऐसे सबक़
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मेरी मिट्टी में जब न था पत्थर
कैसे कह दूँ कि है ख़ुदा पत्थर
कैसे कह दूँ कि है ख़ुदा पत्थर
शो'ला-ए-इश्क़ का असर तौबा
मोम जैसा पिघल गया पत्थर
जब भी बज़्म-ए-ख़िरद में आया मैं
अक़्ल पर मेरी पड़ गया पत्थर
गुल बिछाऊँ मैं तेरे क़दमों में
मेरी राहों में तू बिछा पत्थर
राह-ए-हक़ में यक़ीन था हम पर
सिर्फ़ बरसेंगे ईंट या पत्थर
लद गया जब शजर फलों से कोई
उस पे सब ने उठा दिया पत्थर
लोग तोड़ेंगे बार बार उसे
शीशा-ए-दिल को तू बना पत्थर
नर्म रस्सी से घिस न जाए जो
मुझ को ऐसा नहीं मिला पत्थर
दोस्तों के हदफ़ पे है 'आज़म'
अब वो बरसाएँ फूल या पत्थर
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झुर्रियों की क़तार देखो तो
उम्र से अपनी हार देखो तो
उम्र से अपनी हार देखो तो
हूक बे-इख़्तियार उठती है
अपने जब इख़्तियार देखो तो
झील कहते हो तुम जिन आँखों को
उन में हैं आबशार देखो तो
जाने क्या क्या नज़र वो आता है
जब उसे बार बार देखो तो
ग़ैर-मुमकिन है इत्तिहाद मियाँ
क़ौम में इंतिशार देखो तो
वस्ल से आप ही गुरेज़ाँ हों
लज़्ज़त-ए-इंतिज़ार देखो तो
दो ही मिसरों में है मुकम्मल नज़्म
वुसअ'त-ए-इख़्तियार देखो तो
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हर शख़्स में कुछ लोग कमी ढूँड रहे हैं
नादान हैं मुसबत में नफ़ी ढूँड रहे हैं
नादान हैं मुसबत में नफ़ी ढूँड रहे हैं
गुल ढूँड रहे हैं न कली ढूँड रहे हैं
गुलशन में बस इक शाख़ हरी ढूँड रहे हैं
इस युग में कहाँ हम भी वली ढूँड रहे हैं
इंसाँ में सिफ़ात-ए-बशरी ढूँड रहे हैं
बादल की सियाही में किरन जैसी चमकती
हर ग़म में छिपी हम भी ख़ुशी ढूँड रहे हैं
इक शे'र जो मौज़ूँ नहीं कर पाए हैं अब तक
'ग़ालिब' की ग़ज़ल में भी कमी ढूँड रहे हैं
मुद्दत से तक़ाज़ा है कि लौटा दो मिरा दिल
मुद्दत से बहाना है अभी ढूँड रहे हैं
तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को ख़ुलूस और वफ़ा को
'आज़म' ही नहीं आज सभी ढूँड रहे हैं
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अश्क पर ज़ोर कुछ चला ही नहीं
मैं ने रोका बहुत रुका ही नहीं
मैं ने रोका बहुत रुका ही नहीं
आतिश ज़ेर-ए-पा सबब वर्ना
ख़ाक सहरा की छानता ही नहीं
या तो सब का ख़ुदा ही सच्चा है
या तो सच्चा कोई ख़ुदा ही नहीं
ज़ेहन कहता है सर झुका ले तू
दिल मगर है कि मानता ही नहीं
बाल-ओ-पर हों क़वी तो क्या हासिल
जब उड़ानों का हौसला ही नहीं
हाए मैं ने पस-ए-ग़लत-फ़हमी
वो सुना मैं ने जो कहा ही नहीं
मौत का डर इसे दिखाएँ क्या
ज़िंदा रहना जो चाहता ही नहीं
सिर्फ़ एहसास-ए-कमतरी है तुझे
और तू है कि मानता ही नहीं
मैं ही मैं बज़्म में रहा मौजूद
और मैं बज़्म में गया ही नहीं
मेरी ग़ीबत में वो भी हैं शामिल
आज तक जिन से मैं मिला ही नहीं
जो कि पहचान हो मिरी 'आज़म'
शे'र ऐसा कोई हुआ ही नहीं
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घरों में साथ बैठे हैं सर-ए-बाज़ार बैठे हैं
नक़ाब अपनों का ओढ़े आज-कल अग़्यार बैठे हैं
मोहब्बत की नज़र में जीत ली है हम ने वो बाज़ी
ज़माने की नज़र में हम कि जिस को हार बैठे हैं
ख़ता हो जाए हम से जो कोई तो दर-गुज़र करना
तुम्हारी बज़्म में हम आज पहली बार बैठे हैं
ज़मीं से या फ़लक से या कि अपनों से कि ग़ैरों से
बताएँ किस तरह किस किस से हम बेज़ार बैठे हैं
यही जम्हूरियत का नक़्स है जो तख्त-ए-शाही पर
कभी मक्कार बैठे हैं कभी ग़द्दार बैठे हैं
अदब की महफ़िलों में अब कहाँ जम्म-ए-ग़फ़ीर 'आज़म'
यहाँ दो-चार बैठे हैं वहाँ दो-चार बैठे हैं
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है निगाहों में कोह-ए-तूर मियाँ
मैं नहीं हूँ ख़ुदा से दूर मियाँ
मैं नहीं हूँ ख़ुदा से दूर मियाँ
वो भी तक़रीर कर रहे हैं जिन्हें
बोलने का नहीं शुऊ'र मियाँ
ले न डूबे तिरी इबादत को
ज़ोहद-ओ-तक़्वा का ये ग़ुरूर मियाँ
मेरे मुँह में नहीं ज़बाँ ऐसी
बोलती जो है जी-हुज़ूर मियाँ
रह के दिल्ली में भी ये लगता है
अब भी दिल्ली बहुत है दूर मियाँ
एक मक़्तल थी महफ़िल-ए-याराँ
हम ही ज़ुल्मत को समझे नूर मियाँ
ख़ूब हैं सज्दा-रेज़ियाँ तेरी
नफ़्स पर भी तो हो उबूर मियाँ
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बिकेगी उस की ही दस्तार तय है
कि जिस की क़ीमत-ए-किरदार तय है
कि जिस की क़ीमत-ए-किरदार तय है
हुआ था हादिसा कुछ और लेकिन
लिखेगा और कुछ अख़बार तय है
बड़े आँगन पे इतराओ न इतना
उठेगी उस में भी दीवार तय है
है नालायक़ मगर सरदार का है
बनेगा बेटा ही सरदार तय है
है मुंसिफ़ ही गिरफ़्तार-ए-तअ'स्सुब
अदालत में हमारी हार तय है
न ले जा हम को उस महफ़िल में ऐ दिल
जहाँ होना ज़लील-ओ-ख़्वार तय है
हुनर है ऐसे रिश्तों को निभाना
जहाँ हर बात पर तकरार तय है
सदा सच बोलते हो तुम भी 'आज़म'
तुम्हारे वास्ते भी दार तय है
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