मिज़ाज-ए-नग़्मा-ओ-शे'र-ओ-शराब पैदा कर
हयात-ए-इश्क़ में कुछ आब-ओ-ताब पैदा कर
हयात-ए-इश्क़ में कुछ आब-ओ-ताब पैदा कर
नज़र को ख़ीरगी-ए-शौक़ बे-पनाह मिले
हर एक ज़र्रे से वो आफ़्ताब पैदा कर
शिकस्त-ए-ख़्वाब के बा-वस्फ़ बंद हैं आँखें
फिर एक बार तमाशा-ए-ख़्वाब पैदा कर
ये बे-नियाज़ी-ए-तज़ईन-ए-आइना कब तक
कभी कभी तो ख़ुद अपना जवाब पैदा कर
हर एक ज़र्रा है मामूरा-ए-जमाल-ए-हबीब
दिल-ए-हज़ीं निगह-ए-कामयाब पैदा कर
दिल-ओ-निगाह को धोके भी रास आए हैं
वुफ़ूर-ए-तिश्ना-लबी में सराब पैदा कर
न कर शिकायत-ए-दौराँ न बन हरीफ़-ए-ज़माँ
मुसीबतों का कोई सद्द-ए-बाब पैदा कर
पहुँच बुलंद-ए-मक़ामात-ए-शे'र-ओ-नग़्मा तक
अदब में एक दिल-आवेज़ बाब पैदा कर
ग़रज़ तो ये है तिरा मरकज़-ए-निगाह रहूँ
सुकून-ए-दिल न सही इज़्तिराब पैदा कर
'रईस' तुझ को तो मरने की भी नहीं फ़ुर्सत
कहा था किस ने कि ऐसे अज़ाब पैदा कर
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जो कल तक खेल समझे थे हमें बर्बाद कर देना
अब उन मग़रूर नज़रों की पशेमानी नहीं जाती
हमीं पर लुत्फ़ की बारिश है लेकिन वाए-नादानी
हमीं से वो निगाह-ए-लुत्फ़ पहचानी नहीं जाती
वतन क्या जुरअत-ए-अहल-ए-जुनूँ से हो गया ख़ाली
ख़िरद की क़ुव्वत-ए-तज्दीद-ए-वीरानी नहीं जाती
बहार आई खिले ग़ुंचे मगर ऐ नाज़िम-ए-गुलशन
हमारे आशियाँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती
मिरी सहबा की अज़्मत सिर्फ़ अहल-ए-दिल समझते हैं
पिए जाता हूँ लेकिन पाक-दामानी नहीं जाती
ये किस काफ़िर-अदा का जल्वा-ए-मासूम देखा है
'रईस' अब तक मिरी नज़रों की हैरानी नहीं जाती
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रौनक-ए-बादा-कशी जुरअत-ए-रिंदाना सही
ख़ार होना है तो मय-ख़ाना-ब-मय-ख़ाना सही
इश्क़ इक क़तरे में दरिया को समो देता है
अक़्ल को दीवाना समझती है तो दीवाना सही
मेरे दिल में भी तजल्ली के ख़ज़ीने हैं निहाँ
माह-ओ-ख़ुरशीद में अक्स-ए-रुख़-ए-जानाना सही
फ़ुर्सत-ए-शौक़ ग़नीमत है उठा भी साग़र
ज़िंदगी एक छलकता हुआ पैमाना सही
क्या ख़बर थी कि मय-ए-नाब में इतना है सुरूर
अब जो पी ली है तो इक और भी पैमाना सही
मेरी वारफ़्ता-निगाही की भी कुछ क़ीमत है
बज़्म की बज़्म रुख़-ए-यार का परवाना सही
फिक्र-ओ-एहसास में पोशीदा हैं असरार-ए-हयात
बाल-ओ-पर क़ुव्वत-ए-पर्वाज़ से बेगाना सही
यही क्या कम है कि बर्बाद-ए-मोहब्बत है 'रईस'
तेरे अल्ताफ़-ओ-इनायात से बेगाना सही
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बे-ख़बर काँटों से था अहल-ए-मोहब्बत का शुऊ'र
पाँव रखने थे ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ देख कर
अल्लाह अल्लाह जज़्बा-ए-उल्फ़त की मोजिज़-कारियाँ
वो परेशाँ हो गए मुझ को परेशाँ देख कर
याद आया फिर मुझे अफ़साना-ए-तूर-ओ-कलीम
इक तजल्ली सी तिरे आरिज़ पे रक़्साँ देख कर
चारा-गर अब मुझ से मेरी लज़्ज़त-ए-ईज़ा न पूछ
ख़ंदा-ज़न होते हैं ज़ख़्म-ए-दिल नमकदाँ देख कर
है मोहब्बत का अगर दोनों तरफ़ यकसाँ असर
वो परेशाँ क्यूँ नहीं मुझ को परेशाँ देख कर
इस में मुज़्मर हैं बहुत नग़्में हयात-ए-इश्क़ के
छेड़ मिज़राब-ए-जुनूँ साज़-ए-रग-ए-जाँ देख कर
इस जुनूँ का चारा-गर अब और ही कुछ कर इलाज
और वहशत बढ़ चली है कुंज-ए-ज़िंदाँ देख कर
वा नहीं होता लब-ए-शिकवा सर-ए-महशर 'रईस'
अपने सर पर ख़ंजर-ए-क़ातिल का एहसाँ देख कर
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ये भूल जा कि हैं तेरे भी ग़म-गुसार बहुत
बनाना काग़ज़ी फूलों के ख़ुश्क हार बहुत
बनाना काग़ज़ी फूलों के ख़ुश्क हार बहुत
जो चश्म-ए-यार है होश-ओ-ख़िरद शिकार बहुत
दिल-ओ-नज़र पे हमें भी है इख़्तियार बहुत
हम अपने वक़्त की तस्वीर-ए-मस्ख़-सूरत हैं
दिखाए हम को न आईना रोज़गार बहुत
ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि आज़माइश हो
तअ'ल्लुक़ात तुम्हीं से हैं उस्तुवार बहुत
किसी भी शाख़ पे जब मेरा आशियाँ न मिला
चमन में आज फिरी बर्क़ बे-क़रार बहुत
दिल-ए-तबाह की नैरंगियों का हाल न पूछ
गहे क़रार बहुत गाह बे-क़रार बहुत
हयात नाज़िश-ए-कौनैन हो तो क्या ग़म है
वो चार दिन की सही उम्र-ए-मुस्तआ'र बहुत
हमें तो अपनी वफ़ाओं का मिल रहा है सिला
जफ़ा-ओ-जौर पे वो क्यूँ हैं शर्मसार बहुत
बहुत दिनों से अब अपनी तलाश में गुम हैं
'रईस' छान चुके ख़ाक-ए-कू-ए-यार बहुत
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बर्क़ क्यूँ बे-क़रार है इतना
अब तो गुलशन में आशियाँ भी नहीं
हो नज़र में अगर हक़ीक़त-ए-हुस्न
ज़िंदगी सादा दास्ताँ भी नहीं
वो जफ़ाओं पे शर्मसार न हों
अब ये मंज़िल मुझे गराँ भी नहीं
यार की जुस्तुजू को क्या कहिए
राएगाँ भी है राएगाँ भी नहीं
दिल तक आए तो वजह-ए-तस्कीं हो
वो नज़र इतनी मेहरबाँ भी नहीं
अल्लाह अल्लाह सुरूर-ए-याद-ए-हबीब
अब मुझे हिज्र का गुमाँ भी नहीं
लब तक आ जाए तो क़यामत है
आशिक़ी कार-ए-बे-फ़ुग़ाँ भी नहीं
अज़्मत-ए-हुस्न इश्क़ से है 'रईस'
सर नहीं है तो आस्ताँ भी नहीं
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ख़ुद को तारीख़ किसी वक़्त जो दोहराती है
मेरे हालात पे दुनिया को हँसा जाती है
याद-ए-अय्याम-ए-बहाराँ भी नहीं वज्ह-ए-सुकूँ
अब तो तज़ईन-ए-क़फ़स ही मुझे बहलाती है
बर्क़ बन बन के गिरी है मिरे दिल पर अक्सर
वो तजल्ली जो सर-ए-तूर नज़र आती है
आज कुछ उन की तवज्जोह में कमी पाता हूँ
ज़िंदगी मौत से दो-चार हुई जाती है
दिल भर आता है मिरा देख के नम आँख कोई
अपने रोने पे तो अब मुझ को हँसी आती है
मैं वो इक नंग-ए-ज़माना हूँ अज़ल ही से 'रईस'
ज़िंदगी है कि मिरे नाम से शरमाती है
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हिजाबात-ए-तअय्युन उठ रहे हैं
निगाह-ए-शौक़ तेरा इम्तिहाँ है
मसर्रत भी बड़ी ने'मत है लेकिन
तिरे ग़म से मुझे फ़ुर्सत कहाँ है
न रहबर है न जादा है न मंज़िल
निगाहों में ग़ुबार-ए-कारवाँ है
तिरे नक़्श-ए-क़दम पर चल रहा हूँ
ख़ुदा जाने मिरी मंज़िल कहाँ है
मिरा ज़ौक़-ए-सियह-कारी न पूछो
तुम्हारे ही करम का इम्तिहाँ है
यही शायद है तकमील-ए-तसव्वुर
मुझे ख़ुद पर भी अब उन का गुमाँ है
तुम अपने ग़म की अज़्मत मुझ से पूछो
तुम्हारा ग़म हयात-ए-जाविदाँ है
ये दुनिया है 'रईस'-ए-सोख़्ता-जाँ
यहाँ हर गाम पर इक इम्तिहाँ है
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वो नज़र बहकी हुई फिरती है क्यूँ दिल के क़रीब
उस की मंज़िल भी है शायद मेरी मंज़िल के क़रीब
अज़्म-ए-ग़र्क़ाबी है तो मिन्नत-कश-ए-तूफ़ाँ न बन
कश्तियाँ लाखों हुई हैं ग़र्क़ साहिल के क़रीब
रहरव-ए-मंज़िल ने बन कर मर्कज़-ए-यास-ओ-उमीद
मंज़िलें लाखों बना लीं अपनी मंज़िल के क़रीब
डूबने वाले को तिनके का सहारा चाहिए
मौज भी साहिल नज़र आती है साहिल के क़रीब
जान दे कर मुतमइन है रहरव-ए-हिम्मत-शिकन
दूरी-ए-मंज़िल ने पहुँचाया है मंज़िल के क़रीब
दीदनी है उस की हसरत उस का अरमाँ उस का शौक़
जिस की कश्ती डूब जाए आ के साहिल के क़रीब
डगमगा जाते हैं पा-ए-शौक़ अक्सर ऐ 'रईस'
मंज़िलें ऐसी भी आ जाती हैं मंज़िल के क़रीब
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उम्र भर दुनिया को समझाता रहा
ख़ुद फ़रेब-ए-ज़िंदगी खाता रहा
ख़ुद फ़रेब-ए-ज़िंदगी खाता रहा
रौशनी आँखों में बाक़ी थी न थी
वो नज़र में था नज़र आता रहा
ज़िंदगी क्या थी तिरे जाने के बअ'द
साँस था आता रहा जाता रहा
इस तरह ढूँढोगे इक दिन तुम मुझे
जैसे कुछ खोया गया जाता रहा
अपनी सूरत ही न पहचानी गई
वक़्त आईना तो दिखलाता रहा
अपने ही टूटे खिलौनों से 'रईस'
ज़िंदगी भर दिल को बहलाता रहा
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