कहीं से भी सुख़न-ए-मो'तबर नहीं आता
नज़र हमें कोई अहल-ए-नज़र नहीं आता
नज़र हमें कोई अहल-ए-नज़र नहीं आता
हवा-ए-दश्त ये तासीर-ए-ख़ुद-फ़रामोशी
बहुत दिनों से तसव्वुर में घर नहीं आता
अजब शनावर-ए-बहर-ए-वजूद हैं हम भी
हमें ज़मान-ओ-मकाँ का सफ़र नहीं आता
लहू से लफ़्ज़ की तख़्लीक़ हम नहीं करते
जभी तो अपने बयाँ में असर नहीं आता
ये सोचते हैं कि मंज़िल-रसी से क्या हासिल
जब अपने साथ कोई हम-सफ़र नहीं आता
ये अर्सा-गाह-ए-तलब क़ुर्बतों की दुनिया है
यहाँ हम ऐसा कोई बे-हुनर नहीं आता
दरीचे रोज़ ही खुलते हैं बंद होते हैं
मगर वो चेहरा-ए-रंगीं नज़र नहीं आता
हिजाब कौन सा माने' है कुछ नहीं मा'लूम
मैं चाहता हूँ वो आए मगर नहीं आता
तिलिस्म-ए-तीरा-शबी 'लैस' किस तरह टूटे
कोई भी ले के पयाम-ए-सहर नहीं आता
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कभी काँटों की जराहत से भी आराम मिला
लाला-ओ-गुल भी कभी बाइस-ए-आज़ार हुए
आदमियत के ख़द-ओ-ख़ाल को ज़ीनत न मिली
सारे आईन फ़क़त नक़्श-ब-दीवार हुए
हाए वो हुस्न किसी ने भी न देखा जिस को
हाए वो राज़ जो रुस्वा सर-ए-बाज़ार हुए
कितने दुश्मन थे ज़माने में हमारे लेकिन
अपनी ही हस्ती से हम बरसर-ए-पैकार हुए
दोस्तो एक तुम्हारी भी रिया-कारी से
हम को होना था ख़बर-दार ख़बर-दार हुए
नौहा-ए-ज़ात का ये भी तो इक अंदाज़ हुआ
अश्क आँखों में नहीं आए तो अश'आर हुए
बात कुछ यूँ है कि हिम्मत ही न हारी हम ने
मेरे पिंदार-ए-ख़ुदी पर तो बहुत वार हुए
रंग-ओ-बू पाँव की ज़ंजीर हुए जाते हैं
जा नसीम-ए-सहरी हम तो गिरफ़्तार हुए
हम कि सर-गर्म-ए-सफ़र थे रहे सर-गर्म-ए-सफ़र
मरहले तो कभी आसाँ कभी दुश्वार हुए
अब तो ना-क़द्री-ए-अर्बाब-ए-हुनर है ऐ 'लैस'
आप क्या सोच के इस अहद में फ़नकार हुए
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वो रू-ब-रू हैं मिरे दिल मगर ये कहता है
ख़याल-ए-हुस्न को हुस्न-ए-ख़याल ही समझो
रफ़ाक़तों के क़रीने बदलते रहते हैं
सो कर्ब-ए-हिज्र को लुत्फ़-ए-विसाल ही समझो
तड़प रहे हैं जो यूँ हम सदा-ए-साज़ के साथ
उसे कुछ और नहीं वज्द-ओ-हाल ही समझो
मिरे हुनर को रहा बज़्म-ए-कम-नज़र से गुरेज़
उसे भी मेरे हुनर का कमाल ही समझो
हवा-ए-सुब्ह-ए-चमन और एक बार अगर
गुज़र गई तो हमें पाएमाल ही समझो
दिलों के ज़ख़्म छुपे हैं लहू की चादर में
तुम्हें ग़रज़ नहीं तुम इंदिमाल ही समझो
हुसूल-ए-कैफ़ को मय-ख़ाना-ए-हयात में 'लैस'
शिकस्त-ए-जाम से पहले मुहाल ही समझो
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मिज़ाज-ए-इश्क़ तो अपना है ए'तिदाल-पसंद
यही रविश है कभी कम नहीं ज़ियादा नहीं
ख़िज़ाँ में भी मिरा नश्शा उतर नहीं सकता
कि ये है जोश-ए-जुनूँ कोई जोश-ए-बादा नहीं
शुऊर-ओ-फ़िक्र में आज़ाद है मिज़ाज मिरा
मिरे बदन पे किसी और का लबादा नहीं
निगाह चाहिए तहरीर हो ख़फ़ी की जली
किताब-ए-ज़ीस्त का कोई वरक़ भी सादा नहीं
रह-ए-हयात में दानिस्ता मिस्ल-ए-शम्अ' जले
हमारी ज़ात का ईसार बे-इरादा नहीं
न ज़ाद-ए-राह की ख़्वाहिश न राहबर की तलब
हमारे वास्ते दुश्वार कोई जादा नहीं
पड़ा जो वक़्त तो ग़ैरों ने मेरा साथ दिया
मिरे शरीक मिरे अहल-ए-ख़ान
वा'दा नहीं
बिसात-ए-दहर पे क्या चाल कामयाब चले
तिरी नज़र में अगर अज़्मत-ए-पियादा नहीं
जहाँ में मिलने को मिलते हैं यूँ तो सब से 'लैस'
मगर किसी से भी मक़्सूद इस्तिफ़ादा नहीं
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इस साअ'त-ए-सईद को क्या नाम दीजिए
इंसाँ असीर-ए-वक़्त के ज़िंदाँ में जब हुआ
शोला-सिफ़त हैं रक़्स में अपने चमन के फूल
इस आलम-ए-बहार में ये क्या ग़ज़ब हुआ
शायद यही मज़ाक़-ए-तलब की है इंतिहा
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में भी दिल बे-तलब हुआ
मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई
गो फ़ैसला हुआ मगर इंसाफ़ कब हुआ
उस को नसीब हो न सका रिश्ता-ए-ख़ुलूस
जो क़ाइल-ए-क़ज़िया-ए-हसब-ओ-नसब हुआ
जारी है एक तीरगी-ओ-रौशनी की जंग
जब से शुऊर-ए-सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब हुआ
हद-ए-निगाह तक कहीं शो'ले कहीं धुआँ
ये ख़ाक-ओ-ख़ूँ का खेल गुलिस्ताँ में कब हुआ
इस हादसे पे आप का जो तब्सिरा भी हो
मैं आश्ना-ए-महफ़िल-ए-ऐश-ओ-तरब हुआ
कैसे हो तुम को लज़्ज़त-ए-आज़ाद जाँ-नसीब
दुश्वार मरहलों से गुज़रना ही कब हुआ
कितने अज़ीम लोग तह-ए-ख़ाक हो गए
तू भी हुआ जो 'लैस' तो फिर क्या अजब हुआ
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कल मुझ पे खुल गया तिरा हुस्न-ए-मुनाफ़िक़त
इस सानेहे के बा'द कोई सानेहा नहीं
मुफ़्लिस नहीं है ज़ेहन-ए-तही-दस्त हूँ तो क्या
दस्त-ए-तलब दराज़ कहीं भी किया नहीं
हर-गाम-ओ-हर-नफ़स रहे दरपेश मरहले
ज़ौक़-ए-सफ़र गवाह कि मैं भी रुका नहीं
ऐ मस्लहत-पसंद हमारा भी तेरे साथ
हर-चंद राब्ता है मगर राब्ता नहीं
दुनिया से चंद रोज़ में सब कुछ तो मिल गया
मिलना अब और क्या है जो अब तक मिला नहीं
मुमकिन नहीं कि आएँ अज़ाएम में लग़्ज़िशें
उफ़्तादा वक़्त ही तो है उफ़्ताद-पा नहीं
छोटा हूँ इस लिए मुझे एहसाँ हैं सब के याद
मोहसिन को भूल जाऊँ मैं इतना बड़ा नहीं
अहवाल वाक़ई तो है ख़ुद ही ज़बान-ए-जाँ
लेकिन सर-ए-ग़ुरूर कहीं भी झुका नहीं
मैं तुझ को याद आऊँ और आऊँ तमाम-उम्र
ऐ दोस्त मैं बुरा हूँ पर इतना बुरा नहीं
जौ बोने वाले बो के तो जौ चल दिए मगर
कहते हैं अब के फ़स्ल में गंदुम उगा नहीं
ख़्वाब-ए-बक़ा की बस यही ता'बीर है कि 'लैस'
दुनिया में सिर्फ़ एक फ़ना को फ़ना नहीं
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इतनी मुश्किल में भी अहबाब न डालें मुझ को
कि सँभलना भी न चाहूँ तो सँभालें मुझ को
कि सँभलना भी न चाहूँ तो सँभालें मुझ को
ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-जाँ एक हुए
डर रहा हूँ ये कहीं मार न डालें मुझ को
मुनफ़रिद मेरी तबीअत है ये हालात कहीं
रविश-ए-आम के साँचे में न ढालें मुझ को
मैं तो इस पर भी हूँ राज़ी कि तिरे शहर के लोग
मेरे बनते नहीं अपना ही बना लें मुझ को
आप मुझ से किसी ता'बीर की फिर बात करें
पहले इस ख़्वाब-ए-तमन्ना से जगा लें मुझ को
नहीं मा'लूम कि कल तक मैं रहूँ या न रहूँ
मेहरबाँ आज ही जी-भर के सता लें मुझ को
गर्दिशों के लिए अब तक न ये मुमकिन न हुआ
किसी सूरत मिरे मेहवर से हटा लें मुझ को
इन बुलंदी के मकीनों को मुयस्सर ही नहीं
'लैस' वो हाथ जो पस्ती से उठा लें मुझ को
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दिल मुज़्महिल है तेरी नवाज़िश के बावजूद
ये सर
ये सर
ज़मीं उदास है बारिश के बावजूद
ख़ीरा न कर सके निगह-ए-इम्तियाज़ को
झूटे नगीं नुमूद-ओ-नुमाइश के बावजूद
एक फूल भी चमन में न दिल खोल कर हँसा
शबनम के आँसुओं की गुज़ारिश के बावजूद
क्या क़हर है कि झूट में मिलती है आफ़ियत
सच बोलना मुहाल है ख़्वाहिश के बावजूद
मेरा वक़ार ज़ीस्त न मजरूह कर सके
दुश्मन हज़ार हीला-ओ-साज़िश के बावजूद
अपनी ग़लत रविश को न तब्दील कर सके
कुछ दोस्त बार बार गुज़ारिश के बावजूद
बरख़ुद ग़लत कभी न हुए ज़िंदगी में 'लैस'
दुनिया-ए-फ़न में दाद-ओ-सताइश के बावजूद
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झूटे नगीं नुमूद-ओ-नुमाइश के बावजूद
एक फूल भी चमन में न दिल खोल कर हँसा
शबनम के आँसुओं की गुज़ारिश के बावजूद
क्या क़हर है कि झूट में मिलती है आफ़ियत
सच बोलना मुहाल है ख़्वाहिश के बावजूद
मेरा वक़ार ज़ीस्त न मजरूह कर सके
दुश्मन हज़ार हीला-ओ-साज़िश के बावजूद
अपनी ग़लत रविश को न तब्दील कर सके
कुछ दोस्त बार बार गुज़ारिश के बावजूद
बरख़ुद ग़लत कभी न हुए ज़िंदगी में 'लैस'
दुनिया-ए-फ़न में दाद-ओ-सताइश के बावजूद
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ये दर्द-ए-दिल तो हासिल-ए-उम्र-दराज़ है
मैं इस को अपनी ज़ात से क्यूँ कर जुदा करूँ
दुनिया यही करेगी तो दुनिया से पेशतर
मजरूह क्यूँ न ख़ुद ही मैं अपनी अना करूँ
दुनिया में कौन है जो नहीं है मिरे ख़िलाफ़
इक तुम ही रह गए हो तुम्हें भी ख़फ़ा करूँ
हर ज़ाविए से ज़ीस्त ने रुस्वा किया मुझे
किस रुख़ से अपनी ज़ात का अब सामना करूँ
एहसान जो उठाए हैं औरों के वास्ते
औरों पे हैं वो क़र्ज़ मगर मैं अदा करूँ
आँखों को नींद की भी रिफ़ाक़त नहीं नसीब
मैं शम्अ'' तो नहीं कि सहर तक जला करूँ
हसरत ही रह गई कि बहारों के दरमियाँ
तेरे बग़ैर भी तो कभी ख़ुश रहा करूँ
बेगानगी को छोड़ के फ़ितरत भी हँस पड़े
आदम के नाम पर कोई ऐसी ख़ता करूँ
जब कर्ब-ए-आगही में हूँ ऐ 'लैस' आज-कल
इस कर्ब-ए-आगही से किसे आश्ना करूँ
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तुम ने भूले से कभी ये नहीं सोचा होगा
हम जो बिछड़ेंगे तो क्या हाल हमारा होगा
हम जो बिछड़ेंगे तो क्या हाल हमारा होगा
आ गए हो तो उजाला है मिरी दुनिया में
जाओगे तुम तो अँधेरा ही अँधेरा होगा
ये न कहिए कि मिरी आँख से टपका आँसू
छोड़िए भी कोई टूटा हुआ तारा होगा
क्या ख़बर थी की तिरे शहर से पहले ऐ दोस्त
रात आ जाएगी और राह में दरिया होगा
ख़्वाब लब ख़्वाब जबीं ख़्वाब अदा ख़्वाब हया
इतने ख़्वाबों में कोई ख़्वाब तो सच्चा होगा
दिल के आईने में कर अक्स-ए-तमन्ना न तलाश
तू मुक़ाबिल है तो हैरत के सिवा क्या होगा
पैकर-ए-इश्क़ तो फ़रहाद भी था मजनूँ भी
और वो शख़्स कि तू ने जिसे चाहा होगा
आज तो ख़ुश हूँ बहुत ख़ुश हूँ बहुत ही ख़ुश हूँ
इस तसव्वुर में मैं काँप उठता हूँ कल क्या होगा
एक वो हैं जिन्हें ख़ल्वत में भी लुत्फ़-ए-जल्वत
हाए वो शख़्स जो महफ़िल में भी तन्हा होगा
फ़िक्र अंजाम-ए-मोहब्बत की है तौहीन ऐ 'लैस'
वही होगा मिरी क़िस्मत में जो लिक्खा होगा
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