बुलंद-आहंगियों ने फाड़ डाले कान के पर्दे
हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता
हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता
हवाएँ ले उड़ी हैं सिलसिले को मेरे नग़्मों के
मैं इन बिखरी हुई कड़ियों को अपनी चुन नहीं सकता
ग़ुरूर-ए-ख़ुश-नवाई बोझ सा है मेरी गर्दन पर
ज़माना वज्द में है और मैं सर धुन नहीं सकता
Read Fullमैं इन बिखरी हुई कड़ियों को अपनी चुन नहीं सकता
ग़ुरूर-ए-ख़ुश-नवाई बोझ सा है मेरी गर्दन पर
ज़माना वज्द में है और मैं सर धुन नहीं सकता
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दोस्ती कहाँ जाए?
उस की आस्तीनों से
Read Fullउस की आस्तीनों से
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आह! गंगा ये हसीं पैकर-ए-बिल्लोर तिरा
तेरी हर मौज-ए-रवाँ जलवा-ए-मग़रूर तिरा
तेरी हर मौज-ए-रवाँ जलवा-ए-मग़रूर तिरा
जौर-ए-मग़रिब से मगर दिल है बहुत चूर तिरा
झाँकता है तिरे गिर्दाब से नासूर तिरा
ज़ुल्म ढाए हैं सफ़ीनों ने सितमगारों के
ज़ख़्म अब तक तिरे सीने पे हैं पतवारों के
महव रहते थे सितारे तिरी मय पीने में
चाँद मुँह देखता था तेरे ही आईने में
ख़ल्वत-ए-महर दरख़्शाँ थी तिरे सीने में
तेरी ताबानियाँ आती न थीं तख़मीने में
आज रोती है मगर तेरी जवानी तुझ को
खा गया आ के यहाँ 'टेम्स' का पानी तुझ को
आह ऐ कोह-ए-हिमाला के ग़ुरूर-ए-सय्याल
तेरे दामन पे कभी बैठी न थी गर्द-ए-मलाल
मुँह तिरा पोंछता था चाँद का सीमीं रूमाल
ज़ख़्म सीने पे लिए आज हैं धारे तेरे
उफ़ कहाँ डूब गए चाँद सितारे तेरे
रेग-ए-दोज़ख़ को छुपाए है क़बा के अंदर
हौल-नाक आज है कितना ये दहकता मंज़र
शाम ही शाम नज़र आती है क्यूँ साहिल पर?
क्यूँ तिरी मौजों से छन्ते नहीं अनवार-ए-सहर?
रौशनी क्यूँ हुई जाती है गुरेज़ाँ तुझ से
क्यूँ अँधेरों के हैं लिपटे हुए तूफ़ाँ तुझ से
आज साहिल पे नज़र आती है जलती हुई आग
आदमिय्यत का सुलगता है हवाओं में सुहाग
आज है साज़-ए-सियासत का भयानक सा राग
फन उठाए हुए बल खाते हैं शोलों के नाग
आज इंसान को डसती हैं हवाएँ तेरी
ज़हरस कितनी हैं लबरेज़ फ़ज़ाएँ तेरी
आई है टेम्स से इक मौज-ए-रवाँ गाती हुई
तुझ को आज़ादी के पैग़ाम से बहलाती हुई
रूह मय-ख़ाना लिए शौक़ को बहकाती हुई
नाज़ करती हुई हँसती हुई इठलाती हुई
लाख उलझा करें ज़ुल्फ़ों में उलझने वाले
इस के इश्वों को समझते हैं समझने वाले
लेकिन ऐ बिन्त-ए-हिमाला तिरी अज़्मत की क़सम
सैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़सम
तेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़सम
तेरी मौजों से उभरती हुई हिम्मत की क़सम
अब तिरी आँखों को नमनाक न होने देंगे
दामन-ए-नाज़ तिरा चाक न होने देंगे
Read Fullझाँकता है तिरे गिर्दाब से नासूर तिरा
ज़ुल्म ढाए हैं सफ़ीनों ने सितमगारों के
ज़ख़्म अब तक तिरे सीने पे हैं पतवारों के
महव रहते थे सितारे तिरी मय पीने में
चाँद मुँह देखता था तेरे ही आईने में
ख़ल्वत-ए-महर दरख़्शाँ थी तिरे सीने में
तेरी ताबानियाँ आती न थीं तख़मीने में
आज रोती है मगर तेरी जवानी तुझ को
खा गया आ के यहाँ 'टेम्स' का पानी तुझ को
आह ऐ कोह-ए-हिमाला के ग़ुरूर-ए-सय्याल
तेरे दामन पे कभी बैठी न थी गर्द-ए-मलाल
मुँह तिरा पोंछता था चाँद का सीमीं रूमाल
ज़ख़्म सीने पे लिए आज हैं धारे तेरे
उफ़ कहाँ डूब गए चाँद सितारे तेरे
रेग-ए-दोज़ख़ को छुपाए है क़बा के अंदर
हौल-नाक आज है कितना ये दहकता मंज़र
शाम ही शाम नज़र आती है क्यूँ साहिल पर?
क्यूँ तिरी मौजों से छन्ते नहीं अनवार-ए-सहर?
रौशनी क्यूँ हुई जाती है गुरेज़ाँ तुझ से
क्यूँ अँधेरों के हैं लिपटे हुए तूफ़ाँ तुझ से
आज साहिल पे नज़र आती है जलती हुई आग
आदमिय्यत का सुलगता है हवाओं में सुहाग
आज है साज़-ए-सियासत का भयानक सा राग
फन उठाए हुए बल खाते हैं शोलों के नाग
आज इंसान को डसती हैं हवाएँ तेरी
ज़हरस कितनी हैं लबरेज़ फ़ज़ाएँ तेरी
आई है टेम्स से इक मौज-ए-रवाँ गाती हुई
तुझ को आज़ादी के पैग़ाम से बहलाती हुई
रूह मय-ख़ाना लिए शौक़ को बहकाती हुई
नाज़ करती हुई हँसती हुई इठलाती हुई
लाख उलझा करें ज़ुल्फ़ों में उलझने वाले
इस के इश्वों को समझते हैं समझने वाले
लेकिन ऐ बिन्त-ए-हिमाला तिरी अज़्मत की क़सम
सैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़सम
तेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़सम
तेरी मौजों से उभरती हुई हिम्मत की क़सम
अब तिरी आँखों को नमनाक न होने देंगे
दामन-ए-नाज़ तिरा चाक न होने देंगे
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कितने असनाम ना-तराशीदा
पत्थरों ही में कसमसाते हैं
पत्थरों ही में कसमसाते हैं
कितने ही ना-शगुफ़्ता लाला-ओ-गुल
ज़ेहन-ए-बुलबुल को गुदगुदाते हैं
कितने ही जल्वा-हा-ए-नादीदा
अभी पर्दे में मुस्कुराते हैं
ना-सराईदा कितने ही नग़्में
दिल के तारों से लिपटे जाते हैं
किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल
आज लम्हात गुनगुनाते हैं
किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल
आज लम्हात गुनगुनाते हैं
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कितने ही जल्वा-हा-ए-नादीदा
अभी पर्दे में मुस्कुराते हैं
ना-सराईदा कितने ही नग़्में
दिल के तारों से लिपटे जाते हैं
किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल
आज लम्हात गुनगुनाते हैं
किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल
आज लम्हात गुनगुनाते हैं
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उठने को इन की बज़्म में सब की नज़र उठी
इतना मगर कहूँगा कि मेरी नज़र के ब'अद
सब ज़ोर हो रहा है मिरी सर-कशी पे सर्फ़
क्या होगा हाल-ए-दार-ओ-रसन मेरे सर के ब'अद
कू-ए-सितम से गुज़रें तो शोरीदगान-ए-इश्क़
हँसने लगेंगे ज़ख़्म-ए-जिगर ज़ख़्म-ए-सर के ब'अद
बर्क़-ए-सितम को नज़्र करूँ भी तो क्या करूँ
अब क्या रहा है आग लगाने को घर के ब'अद
बे-ख़्वाब कर रहे हैं शब-ए-ग़म के मरहले
आँखें झपक न जाएँ तुलू-ए-सहर के ब'अद
होगा तवील और भी अफ़साना-ए-वफ़ा
अहल-ए-जफ़ा के तन्तना-ए-मुख़्तसर के ब'अद
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मौक़ा-ए-यास कभी तेरी नज़र ने न दिया
शर्त जीने की लगा दी मुझे मरने न दिया
शर्त जीने की लगा दी मुझे मरने न दिया
कम से कम मैं ग़म-ए-दुनिया को भुला सकता था
पर तिरी याद ने ये काम भी करने न दिया
तेरी ग़म-ख़्वार निगाहों के तसद्दुक़ कि मुझे
ग़म-ए-हस्ती की बुलंदी से उतरने न दिया
वो तिरी सुर्ख़ी-ए-आरिज़ कि क़रीब आ न सकी
रंग जिस फ़िक्र को भी ख़ून-ए-जिगर ने न दिया
हुस्न-ए-हम-दर्द तिरा हम-सफ़र-ए-शौक़ रहा
मुझ को तन्हा किसी मंज़िल से गुज़रने न दिया
कितनी ख़ुश-ज़ौक़ है तेरी निगह-ए-बादा-फ़रोश
ख़ाली रहने न दिया जाम को भरने न दिया
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ये दिल-सोज़ी-ए-दर्द-ए-आदमिय्यत क्या क़यामत है
किसी की आँख से आँसू बहें दामन हो तर मेरा
तसव्वुर मय-कदे का मुश्तरक हो किस तरह नासेह?
ख़िरद साग़र-शिकन तेरी जुनूँ पैमाना-गर मेरा
यही आलम रहा गर शौक़ की आईना-बंदी का!
तो गुम हो जाएगा जल्वों में शौक़-ए-ख़ुद-निगर मेरा
ख़ुदा-रा कुछ तो नाज़-ए-सर-बुलंदी रहम कर मुझ पर
तिरे बार-ए-गिराँ से अब झुका जाता है सर मेरा
उलझ कर रह गई थी अक़्ल तो पर्दे के तारों में
बड़ी मुश्किल से काम आया जुनून-ए-पर्दा-दर मेरा
नहीं 'परवेज़' कुछ अपने ही अश्कों की नमी इस में
बना है आस्तीन-ए-दोस्ताँ दामान-ए-तर मेरा
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माह ओ ख़ोर उगाने हैं कहकशाँ बनाना है
ऐ ज़मीं तुझी को अब आसमाँ बनाना है
गुल-फ़रोश था माली हो गया चमन ख़ाली
आज पत्ते पत्ते को बाग़बाँ बनाना है
अपने सुर्ख़ होंटों की मुस्कुराहटें दे दो
बिजलियों की यूरिश में आशियाँ बनाना है
बाँध कर कफ़न सर से यूँ खड़ा हूँ मक़्तल में
जैसे सरफ़रोशों का कारवाँ बनाना है
मेरी ज़िंदगी में तुम अपनी दिल-कशी भर दो
वक़्त जैसे ज़ालिम को मेहरबाँ बनाना है
आज उन की आँखों से झाँकती हैं तलवारें
दिल की आरज़ुओं को सख़्त-जाँ बनाना है
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वक़्त गुज़रा जो बे-ख़याली में
वो तिरे ही ख़याल में गुज़रा
कुछ कटा वक़्त रंज-ए-दूरी में
कुछ ख़याल-ए-विसाल में गुज़रा
हाए वो ज़ख़्म जिन का मौसम-ए-गुल
दहशत-ए-इंदिमाल में गुज़रा
फिर धड़कने लगा है दिल अपना
क्या कहूँ क्या ख़याल में गुज़रा
निगह-ए-दोस्त का भी मौसम-ए-लुत्फ़
दिल ही की देख-भाल में गुज़रा
एक लम्हे में कितने साल कटे
एक लम्हा भी साल में गुज़रा
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मंज़िल भी मिलेगी रस्ते में तुम राह-गुज़र की बात करो
आग़ाज़-ए-सफ़र से पहले क्यूँ अंजाम-ए-सफ़र की बात करो
आग़ाज़-ए-सफ़र से पहले क्यूँ अंजाम-ए-सफ़र की बात करो
ज़ालिम ने लिया है शर्मा कर फिर गोशा-ए-दामाँ चुटकी में
है वक़्त कि तुम बेबाकी से अब दीदा-ए-तर की बात करो
आया है चमन में मौसम-ए-गुल आई हैं हवाएँ ज़िंदाँ तक
दीवार की बातें हो लेंगी इस वक़्त तो दर की बात करो
है तेज़ हवा हिलता है क़फ़स ख़तरे में पड़ी है हर तीली
फ़रियाद-ए-असीरी बंद करो अब जुम्बिश-ए-पर की बात करो
क्यूँ दार-ओ-रसन के साए में मंसूर की बातें करते हो
रखना है जो ऊँचा सर अपना तो अपने ही सर की बात करो
क्यूँ अहल-ए-जुनूँ अर्बाब-ए-ख़िरद की महफ़िल में ख़ामोश रहें
वो अपने हुनर की बात करें तुम अपने हुनर की बात करो
क्या बरबत-ओ-दफ़ दम तोड़ चुके मौत आ गई क्या हर नग़्में को
तुम मुतरिब-ए-जाम-ओ-मीना हो क्यूँ तेग़ ओ सिपर की बात करो
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