में मचाइयाँ हैं
बीमार हो ज़मीं से उठते नहीं असा बिन
नर्गिस को तुम ने शायद आँखें दिखाइयाँ हैं
देख उस को आइना भी हैरान हो गया है
चेहरे पे जान तेरे ऐसी सफ़ाइयाँ हैं
ख़ुर्शीद उस को कहिए तो जान है वो पीला
गर मह कहूँ तिरा मुँह तो उस पे झाइयाँ हैं
यूँ गर्म यार होना फिर बात भी न कहना
क्या बे-मुरव्वती है क्या बेवफ़ाइयाँ हैं
झमकी दिखा झिझक कर दिल ले के भाग जाना
क्या अचपलाइयाँ हैं क्या चंचलाइयाँ हैं
क़िस्मत में क्या है देखें जीते बचें कि मर जाएँ
क़ातिल से अब तो हम ने आँखें लड़ाइयाँ हैं
दिल आशिक़ों का ले कर फिर यार नहीं ये दिलबर
इन बे-मुरव्वतों की क्या आश्नाइयाँ हैं
फिर मेहरबाँ हुआ है 'ताबाँ' मिरा सितमगर
बातें तिरी किसी ने शायद सुनाइयाँ हैं
Read Fullबीमार हो ज़मीं से उठते नहीं असा बिन
नर्गिस को तुम ने शायद आँखें दिखाइयाँ हैं
देख उस को आइना भी हैरान हो गया है
चेहरे पे जान तेरे ऐसी सफ़ाइयाँ हैं
ख़ुर्शीद उस को कहिए तो जान है वो पीला
गर मह कहूँ तिरा मुँह तो उस पे झाइयाँ हैं
यूँ गर्म यार होना फिर बात भी न कहना
क्या बे-मुरव्वती है क्या बेवफ़ाइयाँ हैं
झमकी दिखा झिझक कर दिल ले के भाग जाना
क्या अचपलाइयाँ हैं क्या चंचलाइयाँ हैं
क़िस्मत में क्या है देखें जीते बचें कि मर जाएँ
क़ातिल से अब तो हम ने आँखें लड़ाइयाँ हैं
दिल आशिक़ों का ले कर फिर यार नहीं ये दिलबर
इन बे-मुरव्वतों की क्या आश्नाइयाँ हैं
फिर मेहरबाँ हुआ है 'ताबाँ' मिरा सितमगर
बातें तिरी किसी ने शायद सुनाइयाँ हैं
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नहीं होने का चंगा गर सुलैमानी लगे मरहम
हमारे दिल पे कारी ज़ख़्म उस नावक पलक का है
कई बारी बिना हो जिस की फिर कहते हैं टूटेगा
ये हुर्मत जिस की हो ऐ शैख़ क्या तेरा वो मक्का है
हर इक दिल के तईं ले कर वो चंचल भाग जाता है
सितमगर है जफ़ा-जू है शराबी है उचक्का है
न जा वाइज़ की बातों पर हमेशा मय को पी 'ताबाँ'
अबस डरता है तू दोज़ख़ से इक शरई दरक्का है
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या भरे अब के उस से दिल मेरा इश्क़ का नाम फिर न लूँ 'ताबाँ'
मुझ से बीमार है मिरा ज़ालिम
ये सितम किस तरह सहूँ 'ताबाँ'
आज आया है यार घर मेरे
ये ख़ुशी किस से मैं कहूँ 'ताबाँ'
मैं तो बेज़ार उस से हूँ लेकिन
दिल के हाथों से क्या करूँ 'ताबाँ'
वो तो सुनता नहीं किसी की बात
उस से मैं हाल क्या कहूँ 'ताबाँ'
ब'अद मुद्दत के माह-रू आया
क्यूँ न उस के गले लगूँ 'ताबाँ'
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देख उस को ख़्वाब में जब आँख खुल जाती है सुब्ह
क्या कहूँ मैं क्या क़यामत मुझ पे तब लाती है सुब्ह
क्या कहूँ मैं क्या क़यामत मुझ पे तब लाती है सुब्ह
शम्अ'' जब मज्लिस से महरुओं की लेती है उठा
क्या कहूँ क्या क्या सुनें उस वक़्त दिखलाती है सुब्ह
जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब
रौशनाई शम्अ' की फीकी नज़र आती है सुब्ह
पास तू सोता है चंचल पर गले लगता नहीं
मिन्नतें करते ही सारी रात हो जाती है सुब्ह
नींद से उठता है 'ताबाँ' जब मिरा ख़ुर्शीद-रू
देख उस के मुँह के तईं शरमा के छुप जाती है सुब्ह
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लटपटी चाल खुले बाल ख़ुमारी अँखियाँ
मैं तसद्दुक़ हूँ मिरी जान ये क्या आन है आज
कब तलक रहिए तिरे हिज्र में पाबंद-ए-लिबास
कीजिए तर्क-ए-त'अल्लुक़ ही ये अरमान है आज
आइने को तिरी सूरत से न हो क्यूँ कर हैरत
दर ओ दीवार तुझे देख के हैरान है आज
आशियाँ बाग़ में आबाद था कल बुलबुल का
हाए 'ताबाँ' ये सबब क्या है कि वीरान है आज
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बे-शुबह तिरी ज़ात ख़ुदावंद-ए-ख़लाइक़
आ'ला है तआ'ला है मुअ'ल्ला है मुक़द्दस
वो काम तू कर जिस से तिरी गोर हो गुलज़ार
क्या ख़ाना-ए-दीवार को करता है मुक़र्नस
मदफ़न के तईं आगे ही मुनइ'म न बिना रख
क्या जानिए वाँ दफ़्न हो या खाएगा कर्गस
है वस्ल तिरा जन्नत-ओ-दोज़ख़ ही जुदा है
जाने है कब इस बाब के तईं हर कस-ओ-ना-कस
तस्वीर तिरे पंजा-ए-सीमीं की तला से
दीवान में है मेरे लिखी जाए मुख़म्मस
कहने को मिरे दिल के सुन ऐ गुलशन-ए-ख़ूबी
गर है तो तिरे को है ये फ़िरदौस ये मुरदस
सुन सुन के तिरा शोर वो बेज़ार हुआ और
नाले का असर तेरे दिला देख लिया बस
इस जुब्बा-ओ-अम्मामा से रिंदों में न आओ
रुस्वा न करो शैख़-जी ये शक्ल-ए-मुक़द्दस
मानिंद-ए-कमाँ ख़म न करूँ क़द को तमअ' से
गर्दिश में रखे गो मुझे ये चर्ख़-ए-मुक़व्वस
हर रात है आशिक़ को तिरे रोज़-ए-क़यामत
हर रोज़ जुदाई में उसे हो है हुनद्दस
'ताबाँ' ये ग़ज़ल अहल-ए-शुऊरों के लिए है
अहमक़ न कोई समझे तो जाने मिरा धंदस
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तू मिल उस से हो जिस से दिल तिरा ख़ुश
बला से तेरी मैं ना-ख़ुश हूँ या ख़ुश
बला से तेरी मैं ना-ख़ुश हूँ या ख़ुश
ख़ुशी तेरी जिसे हर-दम हो दरकार
कोई इस से नहीं होता है ना-ख़ुश
कोई अब के ज़माने में न होगा
इलाही आश्ना से आश्ना ख़ुश
फ़लक के हाथ से ऐ ख़ालिक़-ए-ख़ल्क़
कुइ नहीं आ के दुनिया में रहा ख़ुश
तिरा साया हो जिस पर उस को हरगिज़
न आवे साया-ए-बाल-ए-हुमा ख़ुश
क़फ़स में आह हद ईज़ा है हम को
न आती काश गुलशन की हवा ख़ुश
अगर लावे तू बू उस गुल-बदन की
तो हों तुझ से निहायत ऐ सबा ख़ुश
किया क़त्ल उन ने मुझ को ग़ैर से मिल
हुआ दुश्मन जुदा ख़ुश वो जुदा ख़ुश
नसीहत की थी उन ने मय-कशों को
बहुत मस्तों ने ज़ाहिद को किया ख़ुश
मू-ए-आतिश में जल परवाना ओ शम्अ''
मोहब्बत से मैं उन की हद हुआ ख़ुश
किया चाक ऐ जुनूँ तिरा भला हो
कभू मैं इस गरेबाँ से न था ख़ुश
गया था सैर को ले साक़ी ओ मय
न आई बाग़ की आब-ओ-हवा ख़ुश
किया क़ातिल ने बिस्मिल को मिरे देख
मुझे लगता है इस का लोटना ख़ुश
सुने क्यूँकर वो लब्बैक-ए-हरम को
जिसे नाक़ूस की आए सदा ख़ुश
सताना बे-दिलों के दिल को हर-दम
तुम्हें ऐ दिलबरो आता है क्या ख़ुश
सुमूद ओ क़ाक़ुम ओ संजाब है पश्म
मुझे आता है टूटा बोरिया ख़ुश
सनम के पास से क़ासिद फिरा है
ख़ुदा जाने कि मैं ना-ख़ुश हूँ या ख़ुश
कोई ख़ुश होवे ख़ूबाँ की वफ़ा से
मुझे तो उन की आती है जफ़ा ख़ुश
न छोड़ूँगा कभी मैं बुत-परस्ती
न हो गो मुझ से ऐ 'ताबाँ' ख़ुदा ख़ुश
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यार रूठा है मिरा उस को मनाऊँ किस तरह
मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह
मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह
जब तलक तुम को न देखूँ तब तलक बेचैन हूँ
मैं तुम्हारे पास हर साअत न आऊँ किस तरह
दिल धड़कता है मबादा उठ के देवे गालियाँ
यार सोता है मिरा उस को जगाऊँ किस तरह
बुलबुलों के हाल पर आता है मुज को रहम आज
दाम से सय्याद के उन को छुड़ाऊँ किस तरह
यार बाँका है मिरा छुट तेग़ नईं करता है बात
उस से ऐ 'ताबाँ' मैं अपना जी बचाऊँ किस तरह
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