ज़िंदगी के निगार-ख़ाने में
एक मैं और एक तू है बहुत
नासेह-ए-मोहतरम ख़ुदा-हाफ़िज़
आज इतनी ही गुफ़्तुगू है बहुत
गर्दिश-ए-वक़्त तुझ से लड़ने को
इन रगों में अभी लहू है बहुत
सारी दुनिया की बेटियाँ सुन लें
इस ग़रीबी में आबरू है बहुत
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छू लिया शो'ला-ए-रुख़्सार-ए-सनम देखो तो
कितने ना-आक़िबत-अँदेश हैं हम देखो तो
कितने ना-आक़िबत-अँदेश हैं हम देखो तो
कोई शिकवा है न फ़रियाद न ग़म देखो तो
जाने अब कौन सी मंज़िल पे हैं हम देखो तो
रंज-ओ-आलाम की जलती हुई दोपहरों में
तुम भी चल कर कभी दो-चार क़दम देखो तो
डूबी डूबी सी नज़र आती है क्यूँ नब्ज़-ए-हयात
आज क्या बात है क्यूँ दर्द है कम देखो तो
दीदा-ओ-दिल में लिए फिरते हैं हम आग ही आग
तुम को अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल की क़सम देखो तो
क्या किसी रिंद का दिल तोड़ दिया ज़ाहिद ने
क्यूँ लरज़ने लगी दीवार-ए-हरम देखो तो
हम से ता'मीर-ए-ज़माना है हमीं पर यारो
तोड़े जाते हैं ज़माने के सितम देखो तो
उन को एहसास है अक्सर मेरी बर्बादी का
किस बुलंदी पे है अब क़िस्मत-ए-ग़म देखो तो
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दिल मिरा जब भी शब-ए-तार से घबराता है
शम्अ''' सी आ के कोई दिल में जला जाता है
सोचता हूँ कि तिरा दर्द न खो जाए कहीं
अब तो हर ग़म मिरी तन्हाई से टकराता है
तुम नहीं वो भी नहीं वो भी नहीं वो भी नहीं
कौन है फिर जो ग़रीबों पे सितम ढाता है
धूप ही ठीक है इस छाँव से जो ग़म कर दे
कम से कम धूप में साया तो नज़र आता है
रात के बा'द ही आती है सहर ऐ यारो
ग़म जिसे मिलते हैं राहत भी वही पाता है
लोग कहते हैं कभी पी के तो देखो 'अख़्तर'
गर्मी-ए-मय से हर इक दर्द पिघल जाता है
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तिरी तलाश में जिस वक़्त हम निकलते हैं
क़दम भी चलते हैं नक़्श-ए-क़दम भी चलते हैं
क़दम भी चलते हैं नक़्श-ए-क़दम भी चलते हैं
जो तुंद-ओ-तेज़ हवाओं का रुख़ बदलते हैं
जहाँ में सिर्फ़ उन्हीं के चराग़ जलते हैं
इसी लिए मिरे अरमाँ नहीं निकलते हैं
कि तेज़ धूप में चलने से पाँव जलते हैं
सू-ए-हरम ही मुड़ें हम ये क्या ज़रूरी है
तिरी गली से कई रास्ते निकलते हैं
तुम्हारी साज़िश-ए-पैहम को मात दे दे कर
वो एक हम हैं जो हर बार बच निकलते हैं
हम उन को ढूँडने निकले हैं देखिए क्या हो
कि जो नुक़ूश-ए-कफ़-ए-पा मिटा के चलते हैं
उठा के दोष पे 'अख़्तर' मोहब्बतों की सलीब
हम आज हुस्न के बाज़ार में निकलते हैं
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कहीं जुगनू कहीं तारे कहीं मंज़र जागे
फिर सताने के लिए मुझ को सितमगर जागे
अपनी आँखों में बसा कर ग़म-ए-हिज्राँ की कसक
काश तू भी कभी मेरे लिए शब भर जागे
आग और ख़ून के दरिया को रवानी देने
ख़ूगर-ए-ज़ुल्म जफ़ा-कारों के लश्कर जागे
ख़ुशबुएँ झूम उठीं नूर की बरसात हुई
तेरे आने से बहारों के मुक़द्दर जागे
दिन की दहलीज़ हो या रात का आँगन लेकिन
दिल की धड़कन है कि हर-वक़्त बराबर जागे
कुछ तुम्हीं पर नहीं 'अख़्तर' शब-ए-फ़ुर्क़त का असर
हम भी आँखों में लिए अश्कों के कंकर जागे
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सोचना छोड़ दिया हम ने कि कल क्या होगा
इस से बेहतर ग़म-ए-दौराँ तिरा हल क्या होगा
इस से बेहतर ग़म-ए-दौराँ तिरा हल क्या होगा
तुम मुझे शहर-बदर कर तो रहे हो लेकिन
ये भी सोचा है कि अंजाम-ए-ग़ज़ल क्या होगा
मैं तो कर लूँ ब-खु़शी तुझ को गवारा लेकिन
ग़म-ए-तन्हाई तिरा दर्द-ए-अमल क्या होगा
जिस की ख़ुशबू से महकते हैं दर-ओ-बाम-ए-हयात
कुछ सही मौसम-ए-गुल इस का बदल क्या होगा
जगमगाता है जो हर ज़र्रे के दिल में अक्सर
हाए वो हुस्न-ए-सनम हुस्न-ए-अज़ल क्या होगा
ख़ुद मसीहा है यहाँ आह-ओ-फ़ुग़ाँ में मसरूफ़
इस से औरों की तकालीफ़ का हल क्या होगा
गेसू-ए-वक़्त उलझते ही चले जाते हैं
हर बशर सोच में डूबा है कि कल क्या होगा
ऐ मेरे भूलने वाले कभी ये भी सोचा
जगमगा उट्ठे जो यादों के कँवल क्या होगा
हर-नफ़स दार की मानिंद लगे है 'अख़्तर'
ज़िंदगी ये है तो फिर रंग-ए-अजल क्या होगा
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अल्लह अल्लाह जबीन-ए-रुख़-ए-जानाँ की तपिश
ऐसा लगता है कि अब शम्स-ओ-क़मर जलते हैं
क्या ग़ज़ब है कि तिरे शहर में ऐ जान-ए-ग़ज़ल
जिस्म-ओ-जाँ ज़ेहन-ओ-नज़र क़ल्ब-ओ-जिगर जलते हैं
जिस तरफ़ देखिए इक आग का दरिया है रवाँ
रास्ते ख़ून में डूबे हैं नगर जलते हैं
बुझ चुका हूँ मैं मगर अब भी मिरे नक़्श-ए-क़दम
देख लो जा के सर-ए-राहगुज़र जलते हैं
जिन के सीनों में फ़रोज़ाँ है वफ़ा की शमएँ
रोज़-ओ-शब जलते हैं वो शाम-ओ-सहर जलते हैं
आप जिस शहर को पुर-अम्न समझते हैं हुज़ूर
वाक़िआ''' ये है उसी शहर में घर जलते हैं
दफ़्अ'तन नींद से मैं चौंक उठा ऐ 'अख़्तर'
मैं ने जब ख़्वाब में देखा कि हुनर जलते हैं
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न अब जुनूँ की तमन्ना न है ख़िरद की तलब
ये किस मक़ाम पे आ कर हयात ठहरी है
न पूछ कैसे गुज़ारी है ज़िंदगी हम ने
क़दम क़दम पे अलमनाक रात ठहरी है
जहाँ में जब भी नज़र को कहीं सुकूँ न मिला
उम्मीद-दगाह-ए-नज़र तेरी ज़ात ठहरी है
बंधे हैं पेट पे पत्थर मगर ये शान तिरी
जहाँ भी तू ने कहा काएनात ठहरी है
तिरे तुफ़ैल में ये भी जहाँ ने देखा है
कई बरस के लिए एक रात ठहरी है
न जाने कौन सी हम से ख़ता हुई 'अख़्तर'
हमारे क़त्ल की हर सम्त बात ठहरी है
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वो जिस के हिस्से में दर्द-ए-जिगर नहीं आता
उस आदमी की दुआ में असर नहीं आता
उस आदमी की दुआ में असर नहीं आता
मैं आइना हूँ जो देखूँगा वो दिखाऊँगा
फ़रेब देने का मुझ को हुनर नहीं आता
ग़ुबार-ए-राह से बच बच के चलने वालों को
तमाम उम्र शुऊर-ए-सफ़र नहीं आता
दयार-ए-ज़ीस्त को क्या हो गया कि दूर तलक
उदासियों के सिवा कुछ नज़र नहीं आता
हुकूमतें मिरी उँगली पे रक़्स करती हैं
ये क्या कहा कि मुझे कुछ हुनर नहीं आता
ये वक़्त ऐसा परिंदा है जो कि ऐ 'अख़्तर'
जो उड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आता
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हम को रोना है तो बस आज का ही रोना है
लोग गुज़रे हुए हालात पे रो देते हैं
याद आता है किसी बात पे रोए थे कभी
अब ये आलम है कि हर बात पे रो देते हैं
हम तो ख़ुद मोड़ दिया करते हैं हालात का रुख़
हम नहीं वो कि जो हालात पे रो देते हैं
ये अदा देखी है हम ने तिरे दीवानों की
जिस पे हँसते हैं उसी बात पे रो देते हैं
आख़िरी बार कोई हम से मिला था आ कर
याद आती है तो उस रात पे रो देते हैं
कल जो रुख़ फेर लिया करते थे मुझ से 'अख़्तर'
आज वो भी मिरे हालात पे रो देते हैं
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