हो उस के साथ ये बे-इल्तिफ़ाती-ए-गुल क्यूँ
जो अंदलीब के हो नाला-ए-सहर में असर
किसी का क़ौल है सच संग को करे है मोम
रक्खा है ख़ास ख़ुदा ने ये सीम ओ ज़र में असर
जो आह ने फ़लक-ए-पीर को हिला डाला
तो आप ही कहिए कि हैगा ये किस असर में असर
जो देख ले तो जहन्नम की फेरे बंध जाए
है मेरी आह के वो एक इक शरर में असर
बिगाड़ें चर्ख़ से हम 'ऐश' किस भरोसे पर
न आह में है न सोज़-ए-दिल-ओ-जिगर में असर
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सादा-रूई क़हर थी और उस पे अब आया है ख़त
देखिए अंजाम क्या होता है इस आग़ाज़ का
तीर होवे जिस की मिज़्गाँ और हो अबरू कमाँ
दिल न हो क़ुर्बान क्यूँ कर ऐसे तीर-अंदाज़ का
उस के शाहीन-ए-निगह को ताइर-ए-दिल के लिए
पंजा-ए-मिज़्गाँ नहीं गोया है चुंगुल-बाज़ का
'ऐश' मुझ को बे-पर-ओ-बाली पर-ए-परवाज़ है
मैं नहीं मोहताज कुछ बाल-ओ-पर-ए-परवाज़ का
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भूलना मत बुतों की यारी पर
हैं ये बद-केश अपने मतलब के
क़ैस ओ फ़रहाद चल बसे अफ़्सोस
थे वो कम-बख़्त अपने मशरब के
शैख़ियाँ शैख़ जी की देंगे दिखा
मिल गए वो अगर कहीं अब के
याद रखना कभी न बचिएगा
मिल गए आप वक़्त गर शब के
उस में ख़ुश होवें आप या ना-ख़ुश
यार तो हैं सुना उसी ढब के
यार बिन 'ऐश' मय-कशी तौबा
है ये अपने ख़िलाफ़ मज़हब के
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ज़ुल्फ़ के नीचे ख़त-ए-सब्ज़ तो देखा ही न था
ऐ लो एक और नया दाम तह-ए-दाम भी है
चारा-गर जाने दे तकलीफ़-ए-मुदावा है अबस
मरज़-ए-इश्क़ से होता कहीं आराम भी है
हो गया आज शब-ए-हिज्र में ये क़ौल ग़लत
था जो मशहूर कि आग़ाज़ को अंजाम भी है
काम-ए-जानाँ मेरा लब-ए-यार के बोसे से सिवा
ख़ू-गर-ए-चाशनी-ए-लज़्ज़त-ए-दुश्नाम भी है
शैख़ जी आप ही इंसाफ़ से फ़रमाएँ भला
और आलम में कोई ऐसा भी बदनाम भी है
ज़ुल्फ़ ओ रुख़ दैर ओ हरम शाम ओ सहर 'ऐश' इन में
ज़ुल्मत-ए-कुफ़्र भी है जल्वा-ए-इस्लाम भी है
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रश्क आवे क्यूँ न मुझ को देखना उस की तरफ़
टकटकी बाँधे हुए है रौज़न-ए-दीवार क्या
आह ने तो ख़ेमा-ए-गर्दूं को फूँका देखें अब
रंग लाते हैं हमारे दीदा-ए-ख़ूँ-बार क्या
मुर्ग़-ए-दिल के वास्ते ऐ हम-सफ़ीरो कम है क्यूँ
कुछ क़ज़ा के तीर से तीर-ए-निगाह-ए-यार क्या
चल के मय-ख़ाने ही में अब दिल को बहलाओ ज़रा
'ऐश' याँ बैठे हुए करते हो तुम बेगार क्या
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जो होता आह तिरी आह-ए-बे-असर में असर
तो कुछ तो होता दिल-ए-शोख़-ए-फ़ित्नागर में असर
तो कुछ तो होता दिल-ए-शोख़-ए-फ़ित्नागर में असर
बस इक निगाह में माशूक़ छीन लें हैं दिल
ख़ुदा ने उन की दिया है अजब नज़र में असर
न छोड़ी ग़म ने मिरे इक जिगर में ख़ून की बूँद
कहाँ से अश्क का हो कहिए चश्म-ए-तर में असर
हो उस के साथ ये बे-इल्तिफ़ाती-ए-गुल क्यूँ
जो अंदलीब के हो नाला-ए-सहर में असर
किसी का क़ौल है सच संग को करे है मोम
रक्खा है ख़ास ख़ुदा ने ये सीम-ओ-ज़र में असर
जो आह ने फ़लक-ए-पीर को हिला डाला
तो आप ही कहिए कि हैगा ये किस असर में असर
जो देख ले तो जहन्नम की फेरे बंध जाए
है मेरी आह के वो एक इक शरर में असर
बिगाड़ें चर्ख़ से हम 'ऐश' किस भरोसे पर
न आह में है न सोज़-ए-दिल-ओ-जिगर में असर
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फिरा किसी का इलाही किसी से यार न हो
कोई जहान में बरगश्ता-ए-रोज़गार न हो
कोई जहान में बरगश्ता-ए-रोज़गार न हो
हम उस की चश्म-ए-सियह-मस्त के हैं मस्ताने
ये वो नशे हैं कि जिस का कभी उतार न हो
जहान में कोई कहता नहीं ख़ुदा-लगती
वो क्या करे जिसे दिल पर भी इख़्तियार न हो
न फाड़े दामन-ए-सहरा को क्यूँ कि दस्त-ए-जुनूँ
रहा जब अपने गरेबाँ में एक तार न हो
न खेल जान पर अपनी तू ऐ दिल-ए-नादाँ
ख़ुदा को याद कर इतना तू बे-क़रार न हो
न भूल ज़ोहद पे लज़्ज़त से बख़्शिश-ए-हक़ की
वो बे-नसीब है जब तक गुनाहगार न हो
तुम्हारे सर की क़सम खा के दर्द दिल का कहूँ
जो मेरे लिखने का यूँ तुम को ए'तिबार न हो
जनाब-ए-शैख़ जी साहिब मैं एक अर्ज़ करूँ
अगर मिज़ाज-ए-मुक़द्दस पे नागवार न हो
जनाब रिंदों से मिलते तो हैं पे डर है मुझे
कि दुश्मनों का किसी दिन वहाँ अचार न हो
बहुत है ख़ेमा-ए-गर्दूं के फूँकने को तो 'ऐश'
इस आह-ए-तुफ़्ता जिगर में असर हज़ार न हो
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दोस्त जब दिल सा आश्ना ही नहीं
अब हमें ग़ैर का गिला ही नहीं
अब हमें ग़ैर का गिला ही नहीं
जिस का दिल दर्द-आश्ना ही नहीं
उस के जीने का कुछ मज़ा ही नहीं
एक दम हम से वो जुदा ही नहीं
गर जुदा हो तो वो ख़ुदा ही नहीं
आशनाई पे उस की मत जाना
ले के दिल फिर वो आश्ना ही नहीं
ख़ाक छानी जहान की लेकिन
दिल-ए-गुम-गश्ता का पता ही नहीं
लाख माशूक़ हैं जहाँ में मगर
आह वो नाज़ वो अदा ही नहीं
सई-ए-बे-फ़ाएदा है चारागरो
मरज़-ए-इश्क़ की दवा ही नहीं
दर्द-ए-दिल उन से हम कहा ही किए
पर उन्हों ने कभी सुना ही नहीं
सर फिराता है क्यूँ अबस नासेह
मेरा कहने में दिल रहा ही नहीं
अब वो आए तो आएँ क्या हासिल
ताक़त-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ ही नहीं
मैं तो क्या गोश-ए-चर्ख़ ने भी 'ऐश'
ऐसा बेदाद-गर सुना ही नहीं
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जिस दिल में तिरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं होता
वो दिल नहीं होता नहीं होता नहीं होता
वो दिल नहीं होता नहीं होता नहीं होता
आशिक़ जिसे कहते हैं वो पैदा नहीं होता
और होए भी बिल-फ़र्ज़ तो मुझ सा नहीं होता
जो कुश्ता-ए-तेग़-ए-निगह-ए-यार हैं उन पर
कुछ कार-गर एजाज़-ए-मसीहा नहीं होता
माना कि सितम करते हैं मा'शूक़ मगर आप
जो मुझ पे रवा रखते हैं ऐसा नहीं होता
जो मस्त है साक़ी निगह-ए-मस्त का वो तू
मिन्नत-कश-ए-जाम-ओ-मय-ओ-मीना नहीं होता
कहता है कोई शोला-ए-जव्वाला कोई बर्क़
इस दिल पे गुमाँ लोगों को क्या क्या नहीं होता
ज़ाहिद हो दो-चार-ए-निगाह-ए-मस्त तो देखें
आलूदा बा-मय क्यूँकि मुसल्ला नहीं होता
हाँ कुछ तो बयान-ए-हवस-ए-दिल में है लज़्ज़त
जो लब से जुदा हर्फ़-ए-तमन्ना नहीं होता
तस्कीन-ए-दिल-ए-सोख़्ता-ए-शम्अ' की ख़ातिर
किस शब पर-ए-परवाना से पंखा नहीं होता
दिल इश्क़ ने इतना भी न छोड़ा कि जो कहवें
तक़्सीम जुज़-ए-ला-यतजज्ज़ा नहीं होता
दे बैठे हो दिल 'ऐश' तुम उन लोगों को जिन की
बेदाद का वाँ भी कोई शुन्वा नहीं होता
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फूल अल्लाह ने बनाए हैं महकने के लिए
और बुलबुल को बनाया है चहकने के लिए
और बुलबुल को बनाया है चहकने के लिए
आतिश-ए-ग़म से बनाया है मिरे सीने में
दिल को अँगारे की मानिंद दहकने के लिए
बचे कम-बख़्त वो दिल क्यूँकि भला जिस दिल के
मुस्तइद हो निगह-ए-शोख़ उचकने के लिए
रिंद कहते हैं कि ख़ालिक़ ने किया है पैदा
रात दिन नासेह-ए-बेहूदा को बकने के लिए
रहम ऐ चश्म बनाया है कहीं क्या दिल को
क़तरा-ए-अश्क हो मिज़्गाँ से टपकने के लिए
शैख़ को रिंदों से कह दो कि नज़र में रक्खें
क्यूँकि अब ढूँडे है क़ाबू वो खिसकने के लिए
'ऐश' बतला तो बना है दिल-ए-हैराँ तेरा
मिस्ल-ए-आईना ये किस शक्ल के तकने के लिए
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